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त्रिपुरा में गायब हुआ लाल, खूबा उड़ा केसरिया गुलाल


PRANAY VIKRAM SINGH 03/03/2018 15:31:07
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प्रधानमंत्री मोदी के प्रति देशव्यापी विश्वास, अमित शाह की कुशल रणनीति, योगी आदित्यनाथ के करिश्मे और सुनील देवधर के भागीरथी प्रयासों ने त्रिपुरा में लाल किले को ढहा दिया है। पूर्ण राज्य का दर्जा पाने के 45 वर्षों में से 35 वर्षों तक त्रिपुरा में काबिज रही माकपा का लाल किला आज ढह गया और केसरियामय हुईं पूर्वोत्तर की फिजाएं। त्रिपुरा के हाथ से निकलने के बाद तो वामपंथियों के पास सिर्फ केरल ही बचा है। कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देती रही भाजपा इस बार वाम मुक्तत्रिपुरा की उपलब्धि हासिल करने में सफल रही। सवाल है कि आखिर त्रिपुरा में 35 वर्षों से कायम वाम का तिलस्मि टूटा कैसे? क्या पश्चिम बंगाल में वाम राजनीति की परिणिति की पुनरावृत्ति है त्रिपुरा चुनाव परिणाम। या मोदी के साथ-साथ योगी आदित्यनाथ के अखिल भारतीय करिश्में का प्राकट्य है त्रिपुरा में वाम का ढहा हुआ लाल किला। या आरएसएस के प्रचारक रहे सुनील देवधर की लगभग तीन वर्षों की प्रचंड धरातलीय साधना का प्रतिफल है त्रिपुरा के जनमानस का भाजपा के प्रति विश्वास। 
 

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त्रिपुरा विजय के शिल्पकार सुनील देवधर
त्रिपुरा में 35 सालों की वाम सरकार से सत्ता छीन लेने का सेहरा एक ऐसे व्यक्ति के सिर बंधता है जो जन्म से मराठी मानुष है लेकिन बंगाली ठीक से बोल लेता है। जब तीन साल पहले भाजपा की ओर से उन्हें नॉर्थ ईस्ट की जिम्मेदारी दी गयी थी तो यहां रहते हुए उन्होंने स्थानीय भाषाएं सीख लीं। बताया जाता है कि जब वो मेघालय, त्रिपुरा, नागालैंड में खासी और गारो जैसी जनजाति के लोगों से मिलते हैं तो उनसे उन्हीं की भाषा में बातचीत करते हैं। वो कोई और नहीं संघ के पूर्व प्रचारक रहे सुनील देवधर हैं। सुनील देवधर पूर्वोत्तर भारत में भारतीय जनता पार्टी का वो चेहरा हैं जिसने खुद न 
तो कभी यहां चुनाव लड़ा और ना ही खुद को समाचारों में ही रखा। दीगर है कि सुनील देवधर को तीन साल पहले जब त्रिपुरा भेजा गया तो वहां पार्टी का कोई भी जनाधार नहीं थी लेकिन देवधर की रणनीति से बीजेपी इस प्रदेश में कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए लोगों की पसंद बनने लगी। सुनील देवधर का सबसे मजबूत पक्ष रहा निचले स्तर पर कार्यकर्ताओं को ढूंढना और उन्हें पार्टी में अहमियत देना। 
 
दरअसल सुनील देवधर के अथक प्रयासों के चलते भाजपा ने माकपा के आदिवासी विरोधी छवि की कमजोरी को पकड़ा और इसे अपनी सबसे बड़ी ताकत बना ली। आदिवासियों के अन्तिम राजा का 71 साल बाद पहली बार पूरे त्रिपुरा में जन्मदिन मनाना हो या फिर अगरतला हवाईअड्डे का नाम अन्तिम राजा के नाम पर करने की। आदिवासियों से जुड़े मुद्दे उठा कर भाजपा उनके बीच पैठ बनाने में सफल रही। हालात यह हो गये कि आदिवासियों के लिए अलग राज्य की मांग करने वाली आइपीएफटी को अपनी मांग छोड़ कर भाजपा के साथ गठबंधन करने की घोषणा करनी पड़ी थी। त्रिपुरा में 20 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं, जबकि 20 अन्य सीटों पर उसके वोट निर्णायक साबित होते हैं। राज्य में गरीबी और बेरोजगारी को लेकर माकपा के मुखर विरोधी युवा वर्ग को भी भाजपा अपने साथ जोडऩे में सफल रही है। इसी तरह अभी तक चौथे वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप वेतन पाने वाले सरकारी कर्मचारियों से भाजपा ने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने का वादा किया। 25 लाख मतदाता वाले त्रिपुरा में सरकारी कर्मचारियों और पेंशनधारियों की संख्या 2.5 लाख है। 

 

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 तुरुप का इक्का साबित हुये योगी आदित्यनाथ:
सीपीएम की ढाई दशक पुरानी सरकार को उखाड़ फेंकने में भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तुरुप का पत्ता साबित हुये हैं। त्रिपुरा की कुल आबादी का एक तिहाई नाथ सम्प्रदाय से जुड़ा है। योगी आदित्यनाथ की एक अपील आसानी से उन्हें भाजपा की ओर खींचने में सफल रही है। अपने सम्प्रदाय के धर्मगुरु के उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के मुख्यमंत्री बनने से त्रिपुरा के नाथ सम्प्रदाय के लोग गर्व अनुभव करते हैं। त्रिपुरा में गोरक्षनाथ के दो मन्दिर हैं, एक अगरतला में और दूसरा धर्मनगर में। कुल 35 लाख की आबादी वाले इस राज्य में नाथ सम्प्रदाय से जुड़े लोगों की संख्या 12-13 लाख है। यानी एक तिहाई आबादी नाथ सम्प्रदाय को मानती है। सबसे बड़ी बात यह है कि योगी आदित्यनाथ पूरे देश में नाथ सम्प्रदाय के प्रमुख हैं। वैसे तो योगी आदित्यनाथ भाजपा के लिए गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में स्टार प्रचारकों में से एक रहे हैं। लेकिन सुदूर पूर्वोत्तर के छोटे से राज्य त्रिपुरा में भाजपा की जीत में उनकी अहम् भूमिका देखी जा सकती है।

 

 

 

Web Title: Kasaria Gulal vanished COMMUNIST, CPM disappeared in Tripura, ( Hindi News From Newstimes)


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