गठबंधन संकट: मायावती करेंगी दावा, अखिलेश को देनी पड़ सकती है ये सबसे बड़ी कुर्बानी!


SHUBHENDU SHUKLA 18/06/2018 01:37:06
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Lucknow. लोकसभा चुनाव 2019 को लेकर सभी पार्टियों ने कमर कसनी शुरू कर दी है। वरिष्ठ नेताओं के बीच घमासान भी छिड़ गया है। जुबानी जंग का सफर राजनीति को सियासी रंग देने लगा है। उपचुनाव में बीजेपी की करारी हार के बाद सपा-बसपा गठबंधन की चर्चा तेज हो गई थी। जनता ने भी उपचुनाव में इस जोड़ी को लेकर संकेत दे दिए हैं। लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों पार्टियों में खींचातानी बढ़ गई है। हालांकि, अखिलेश यादव इस बात का ऐलान भी कर चुके हैं कि सीटों को लेकर  कोई भी कुर्बानी देनी पड़ेगी तो भी वह गठबंधन करेंगे। लेकिन बसपा सुप्रीमो किसी भी तरह से अपने हितों के साथ समझौता नहीं करना चाहती हैं। आजमगढ़ की संसदीय सीट पर मायावती अपना प्रत्याशी उतारना चाहती हैं। 

Sapa aur Basapa Gathabandhan Sankat

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  आजमगढ़ संसदीय सीट

खबरों के मुताबिक बसपा सुप्रीमो मायावती चाहती हैं कि आजमगढ़ संसदीय सीट उनके खेमे में आए। इसके पीछे की वजह और तर्क यह है कि इस सीट से बसपा का हमेशा से बेहतर प्रदर्शन रहा है। लेकिन भले ही अखिलेश ने दो चार सीटों के कुर्बानी देने का ऐलान कर दिया हो। आजमगढ़ का संसदीय सीट उनके लिए बेहद ही मायने रखता है। यहां से मुलायम सिंह यादव सांसद हैं। उनका लगाव इस सीट से हमेशा से जुड़ा रहा है। या यूं कहें कि यह सीट मुलायम सिंह की धड़कन है। 

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  दोनों ही पार्टियों का गढ़

बताते चलें कि आजमगढ़ पूर्व के विधानसभा चुनावों में दोनों ही पार्टियों का गढ़ रहा है। यहां से दोनों पार्टियों के बीच चुनावी समर में कड़ी टक्कर देखने को मिलती रही है। 2014 में मोदी लहर के बावजूद सपा ने आजमगढ़ सीट पर विजय पताका फहराया था। वहीं, 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा को  5 और बसपा को 4 सीटें मिली थी। ऐसे में आजमगढ़ की सीटों को लेकर दोनों पार्टियों के वर्चस्व का अंदाजा लगाया जा सकता है। 

Sapa aur Basapa Gathabandhan Sankat

  आजमगढ़ की सीटों का गणित

बता दें कि सपा, बसपा और भाजपा तीनों की आजमगढ़ सीटों पर जीत की बात की जाए तो सपा ही पहले पायदान पर रही है। 1989 में मायावती और कांशीराम जैसे बड़े राजनीतिक दिग्गज हार गए थे। उस दौरान रामकृष्ण यादव ने बसपा की तरफ से झंडा गाड़ा था। यहां की सीट से समाजवादी पार्टी के रमाकांत यादव दो बार जीत अपने नाम कर चुके हैं। वर्तमान में यहां से मुलायम सिंह यादव सांसद हैं। वहीं, बीजेपी की बात करें तो 2009 में रमाकांत यादव टिकट लेकर चुनाव लड़े थे और जीत दर्ज की थी। 

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  अब बसपा भारी

खबरों के मुताबिक मायावती लालगंज सीट पर पहले ही प्रत्याशी की घोषणा कर चुकी हैं। वर्तमान स्थिति को देखा जाए तो बसपा इस समय सपा पर भारी है। ऐसे में बसपा सुप्रीमो चाहती हैं कि आजमगढ़ी सीट भी उनके खेमे में आ जाए। यहां से मायावती बसपा की जड़ों को मजबूत करना चाहती हैं। 

Sapa aur Basapa Gathabandhan Sankat

  इनको उतारने की तैयारी

खबर यह भी है कि आजमगढ़ सीट से मायावती मुख्तार अंसारी को प्रत्याशी के तौर पर उतारने की सोच में हैं। इनके इस रणनीति से बसपा को दोहरा फायदा होगा। एक तो आजमगढ़ में बसपा की पकड़ मजबूत होगी और दूसरी कि मुस्लिम वोटरों को भविष्य के लिए अपने पक्ष में लाया जा सकेगा। बसपा सुप्रीमो को इस बात का भी आभास है कि गठबंधन का भविष्य लंबे समय तक नहीं है। यदि वह अपने मकसद में सफल होंगी तो उनका वोट बैंक और भी मजबूत हो जाएगा। इसके बाद बसपा अकेले दम पर चुनाव लड़कर भी बेहतर परफॉर्म करेगी। 

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  सपा के अस्तित्व पर खतरा

वहीं, सपा के लिए यह शर्त मुसीबत बन सकती है और अखिलेश ऐसा कभी नहीं चाहेंगे। चूंकि एक तो मुलायम सिंह का यहां से बेहद लगाव है। दूसरा यह कि दोनों ही सीटें बसपा के खेमे में जाने पर सपा का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा। फिलहाल ये वहज स्पष्ट संकेत करती है कि गठबंधन पर ग्रहण लग जाएगा। अखिलेश यादव कितनी भी सीटें छोड़ने को तैयार हो जाएं, लेकिन यह सीट वह कुर्बान करना नहीं चाहेंगें फिलहाल चुनावी राजनीति की दिशा दशा ही कुछ अलग होती है। यदि अखिलेश और मायावती में किसी भी बात को लकर सहमति बन जाती है, तो इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि गठबंधन में कोई रुकावट आएगी। वैसे भी बीजेपी को हराना ही सभी पार्टियों का लक्ष्य है। ऐसे में सीटों के बंटवारे को लेकर बीजेपी इसका फायदा उठाए यह भी बसपा सुप्रीमो और अखिलेश यादव नहीं चाहेंगे।  

Web Title: Sapa aur Basapa Gathabandhan Sankat ( Hindi News From Newstimes)


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