#Rajnitik_Incidents : कैसे लोहिया ने आजादी के बाद किया कांग्रेस का विरोध, 15 साल के मुलायम गये जेल 


GAURAV SHUKLA 15/07/2018 10:45:31
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आजादी के बाद रातोरात कांग्रेस के कंधों पर देश की बागडोर संभालने का दायित्व आ गया। हालांकि उस समय कांग्रेस पर अपनी वही क्रांतिकारी भावना बोझ बन रही थी जिसने लंबे समय तक उसे जीवित रखा था। इस बोझ बनती भावना के बीच रातोंरात गांधी जी द्वारा कांग्रेस को भंग करने की मांग की। लेकिन सरकार में बैठे लोगों ने इसका जमकर विरोध किया। उस समय का जिक्र करते हुए लुई फिशर लिखते हैं, ''कांग्रेस मशीन और सरकार में बैठे इस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने गांधी को मात दे दी और खासकर 1947 का अंत आते आते गांधी को पार्टी नेतृत्व में हांशिये पर डाल दिया गया।'' वहीं जनवरी 1948 में गांधी जी की हत्या के बाद मधु लिमये लिखते हैं कि, ''कांग्रेस के संविधान में संशोधन कर इसे एक मंडली में परिवर्तित करने का प्रयास किया गया। इसने सोशलिस्ट पार्टी को बाध्य कर दिया और वह मार्च 1948 में कांग्रेस से अलग हो गयी।''

Rajnitik Incident Lohiya Or mulayam ke andune kisse
मार्च 1948 के बाद सोशलिस्ट पार्टी ने अपना अलग ही रास्ता अख्तियार कर लिया। इसके कारण उनके कम्युनिस्टों से गहरे मतभेद थे। जे पी सिंह और सोशलिस्ट पार्टी में मौजूद उनके सहयोगियों का मानना था कि पार्टियों को जब तक मतांतर हो तब तक वह महज कांग्रेस को हराने के मुद्दे पर एक साथ काम नहीं कर सकती। लेकिन देश के पहले चुनाव में ही समाजवादियों को गहरा झटका लगा और वह रणनीति पर पुनर्विचार करने को बाध्य हो गये। भले ही समाजवादियों को दस फीसदी से ज्यादा वोट मिले लेकिन वह ज्यादा सीटें नहीं जीत पाए। उस दौरान कुछ लोगों ने कांग्रेस के साथ जाने की बात कही लेकिन लोहिया इसके खिलाफ थे। लोहिया ने उन्हीं दिनों समाजवाद के सिद्धांतो की नए आर्थों में व्याख्या की। 1952 में लोहिया ने पंचवटी में समाजवाद पर अपने विचार रखें। इसी के साथ उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि समाजवाद उधार की सांसों पर जिंदा नहीं रह सकता। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि मार्क्सवादी विचारधारा का अंधा अनुसरण करने के बजाए स्वतंत्र विचार अपनाने पर जोर दिया जाए। वह विचार जो भारतीय संस्कृति और परिस्थितियों से मेल खाते हों।

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किसान मजदूर प्रजा पार्टी(केएमपीपी)


इसी बीच जे बी कृपलानी , पीसी जोशी और टी प्रकाशम ने नई पार्टी किसान मजदूर प्रजा पार्टी(केएमपीपी) का गठन किया और इसे के झंडे तले 1952 में चुनाव लड़ा। एक बार फिर समाजवादियों को हार का मुंह देखना पड़ा। दोनों पार्टियों को हार के बाद एक ही विचारधारा पर एकजुट होना श्रेयकर लगा। 24-25 सितंबर 1952 को हुई सोशलिस्ट पार्टी की बैठक में विलय के पक्ष में फैसला लिया गया। जिसके बाद नई प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का जन्म हुआ। इस पार्टी ने नेहरू की चिंताएं बढ़ाई जिसके बाद नेहरु ने सहयोग की मांग की। हालांकि पार्टी में अंदर ही अंदर काफी कश्मकश के बाद केएमपीपी की जड़े कमजोर होने लगी। दरअसल अशोक मेहता नेहरु के प्रस्ताव पर सकारात्मक जवाब देने के पक्ष में थें। जबकि लोहिया इसके सख्त खिलाफ थे। अंत में नेहरू कामयाब हुए और पार्टी के भीतर फूट हो गयी।

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जब 15 साल की उम्र में गिरफ्तार हुए मुलायम

पार्टी में फूट के बाद लोहिया जनता के बीच गये। अगस्त 1953 में उन्होंने आजमगढ़ में सरकार के विरुद्ध सत्याग्रह का आंदोलन कर रहे किसानों का नेतृत्व कर मोर्चा संभाला। उन्होंने गाजीपुर में पुलिस की ज्यातियों और लखनऊ में छात्रों पर पुलिस की फायरिंग के खिलाफ आवाज उठाई। इसी बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में सिंचाई शुल्क में आसमान्य वृद्धि ने किसानों में कुठाराघात कर दिया। लोहिया जानते थे सरकार के इस फैसले का नुकसान क्या होगा। उन्होंने तत्काल 13 राज्यों में नाफरमानी आंदोलन शुरू किया जिसे लोग नहर रेट आंदोलन के नाम से जानते हैं। लोहिया के आह्वान पर बड़ी संख्या में लोगों ने गिरफ्तारी दी। इसी समय 15 साल की उम्र में मुलायम सिंह की भी गिरफ्तारी हुई। दरअसल यह साबित करता है कि समाजवाद की दीक्षा उन पर थोपी नहीं गयी बल्कि उन्होंने सहर्ष इसे स्वीकार किया है।

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Web Title: Rajnitik Incident Lohiya Or mulayam ke andune kisse ( Hindi News From Newstimes)


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