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केजीएमयू में दो साल की बच्ची की बनायी नई तकनीक से आहारनाल


NP1484 07/08/2018 07:31:25
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लखनऊ। केजीएमयू के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के चिकित्सकों ने दो साल की बच्ची के शरीर में  आहारनाल बनाकर जान बचाई है। बच्ची को जन्म से ही आहारनाल विकसित न होने के कारण सीधे आमाशय में दूध व दाल का पानी पाइप के माध्यम से पहुंचाया जा रहा था। इस पाइप के माध्यम से ही बच्ची को पोषण मिल रहा था।

झांसी के गांव किसान मंडी निवासी दो साल की गुनगुन का जन्म से ही आहारनाल विकसित नहीं थी। जिसके कारण वह मां का दूध भी नहीं पी पा रही थी। मुंह में दुध जाते ही कुछ हिस्सा फेफड़े में और कुछ हिस्सा बाहर गिर जाता था। पोषण के नाम पर शरीर में कुछ भी नहीं जा पा रहा था। पिता अरविन्द यादव की माने तो बच्ची का जन्म अप्रैल 20016 में घर पर ही हुआ था। जन्म होने के तुरंत बाद दई ने बताया कि बच्ची के मुंह से गंदा पानी निकल रहा है। इतना ही नहीं जैसे ही बच्ची को मां का दूध पिलाया गया। दूध का कुछ हिस्सा अंदर गया और कुछ हिस्सा बाहर निकल गया। वहीं बच्ची का शरीर का रंग भी बदलने लगा। उसके बाद परिजन बच्ची को लेकर झांसी के ही एक अस्पताल में पहुंचे। वहां पर प्राथमिक उपचार देने के बाद डाक्टरों ने केजीएमयू रेफर कर दिया।


केजीएमयू के प्रो.जे.डी.रावत ने बताया कि बच्ची को 2016 महीने में हमारे पास आयी तो उसके खाने की आहार नली जन्मजात विकसित नही थी ।  बच्ची को जब दूध पिलाया गया तो वह फेफड़ो में जा रहा था । इस वजह से बच्ची को खासी भी आ रही थी । बच्ची को तुरन्त केजीएमयू के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग में भर्ती किया गया। जहां तीसरे दिन ही बच्ची का पहला आपरेशन कर  खाने की ऊपरी नली को गर्दन से निकाला गया ताकि थूक बाहर निकलता रहे । वही पेट से दूध देने की नली डाली गई ।उन्होंने बताया कि दो साल तक बच्ची को पेट में पड़ी नली के माध्यम से दूध पिलाया गया। जब बच्ची का वजन 10  किलोग्राम के लगभग हो गया। उसके बाद मार्च महीने में  बच्ची का दूसरा आपरेशन किया गया । जिसमें आमाश्य को काटकर आहार नली बनाई गई। डा.रावत के मुताबिक 26 जुलाई को उसका तीसरा आपरेशन किया गया। जिसमें मुहॅ के नली को आहार नली से सफ लता पूर्वक जोड़ा गया । इसके बाद अब बच्ची को मुहॅ से पहली बार दूध पिलाया गया । प्रो.रावत ने  बताया कि बच्ची अब ठीक है और उसे छुट्टी दे दी गयी है ।

10 हजार बच्चों में एक को होती है यह बीमारी

प्रो.जे.डी.रावत  के मुताबिक दस हजार बच्चों में एक बच्चे का जन्म से ही आहारनाल विकसित नहीं होता है। इस बीमारी को इसोफैगल एट्रेसिया कहा जाता है। उन्होंने बताया कि इस बिमारी में आहार नाल बनानी पड़ती है। कार्पोरेट अस्पताल में इस आपरेशन में लगभग एक लाख से डेढ़ लाख तक प्रति आपरेशन में खर्चा आता है । वहीं केजीएमयू के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग में तीनों आपरेशन का खर्च लगभग 30 तक आया है ।

प्रो.जे.डी.रावत अकेले इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाले पीडियाट्रिक सर्जन

उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में कुल 70 पीडियाट्रिक सर्जन हैं। जिसमें प्रो.जे.डी.रावत एक ऐसे पीडियाट्रिक सर्जन है। जो नई तकनीक का इस्तेमाल कर तीन बार में आहारनाल का निमार्ण करते हैं। इतना ही नहीं आमाश्य के ही एक  हिस्से से पूरे आहार नाल को बनाते है। जिससे रिसाव का मौका न के बराबर होता हैं और मरीज के बचने के 95 फीसदी मौका बढ़ जाता है। प्रो.जे.डी.रावत ने 2002 से इस तरह के लगभग 16 आपरेशन किये हैं । जिसमें से 15 बच्चे पूरी तरह से स्वस्थ बताये जा रहे हैं । जबकि  एक बच्चे का तीसरा आपरेशन करने के बाद हालत बिगड़ गयी थी और वेंटीलेटन न होने के कारण उसकी मौत हो गयी थी। आमतौर पर इस बीमारी में आईसीयू एवं वेन्टीलेटर की जरूर पड़ती है। इन सभी ऑपरेशनों में खास बात यह रही की बिना आईसीयू व वेंटीलेटर के  किये गये ऑपरेशन में 15 बच्चों को सफलता पूर्वक ऑपरेशन हुआ और वह स्वस्थ जिंदगी जी रहे हैं। प्रो.जे.डी.रावत की माने तो वयस्क लोगों में आहारनाल का कैंसर हो जाने पर यदि इस तकनीक का इस्तेमाल कर नयी आहारनाल बनायी जाये। तो मरीज का जीवन लंबा हो सकता है।

डाक्टरों की टीम
 प्रो.जे.डी. रावत, डा. सुधीर सिंह, डा. गुरमीत सिंह,
ओटी स्टाफ - सिस्टर वन्दना, संजय सिंह, सिस्टर पुश्पा
ऐनस्थीसिया- डा. सरिता सिंह एवं टीम

 

KGMU

Web Title: KGMU's two-year-old baby cooks made from new technology ( Hindi News From Newstimes)


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