जनआशीर्वाद के भरोसे शिवराज!


GAURAV SHUKLA 27/09/2018 12:08:17
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ashirvaad yatra ke jariye pradesh ke daure par cm shivraaj

कृष्णमोहन झा

(लेखक IFWJ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और डिज़ियाना मीडिया समूह के राजनैतिक संपादक है।)

 

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस समय अपनी जन आशीर्वाद यात्रा के रूप में सारे प्रदेश का दौरा कर रहे है। अपने कार्यकाल में उन्होंने समाज के हर वर्ग के लिए जो घोषणाओं का सिलसिला शुरू किया था, वह इस यात्रा के दौरान भी देखने को मिल रही है। मुख्यमंत्री की इस यात्रा पर विराम तभी लगेगा जब चुनाव आयोग विधानसभा चुनाव का कार्यक्रम घोषित कर देगा।  इस घोषणा के बाद जनता को लुभाने वाली योजनाओं का सिलसिला थम जाएगा फिर सत्तारूढ़ भाजपा अपने चुनावी अभियान में जुट जाएगी। मुख्यमंत्री अपनी इस यात्रा के माध्यम से अपने 14 वर्षों के काम के साथ जनता के बीच मे है। 

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इस जन आशीर्वाद यात्रा में एक बात उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री की इस यात्रा के संयोजक की जिम्मेदारी भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष प्रभात झा संभाल रहे है। प्रभात झा ने यह जिम्मेदारी सहर्ष स्वीकार करके निःसंदेह सबको आश्चर्यचकित कर दिया। प्रभात झा को मुख्यमंत्री ने यह जिम्मेदारी क्यों सौपी यह उससे भी अधिक उत्सुकता का विषय है। प्रभात झा को पिछले विधानसभा चुनाव के ठीक पहले हटाकर नरेंद्र सिंह तोमर को भाजपा अध्यक्ष बनाया गया, जिसका फैसला मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पहल पर ही भाजपा हाईकमान ने लिया था।  मुख्यमंत्री ने जो भरोसा 2013 में तोमर पर जताया था वही भरोसा आज प्रभात झा पर जता रहे है ,जो निश्चित रूप से कौतूहल का विषय तो है ही। प्रभात झा ने तब नेतृत्व परिवर्तन को पोखरन विस्फोट तक करार दिया था। जन आशीर्वाद यात्रा का संबंध निश्चित रूप से चुनाव से है और इस यात्रा का संयोजक बनने के लिए अगर प्रभात झा खुशी- खुशी राजी हो गए है तो यह मुख्यमंत्री के लिए भी हर्ष की बात है। अब इसे इस रूप मे भी व्यक्त किया जा सकता है कि आगामी  चुनाव में रणनीति तैयार करने में प्रभात झा भी अहम भूमिका में होंगे।

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भाजपा प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह की नियुक्ति भी मुख्यमंत्री शिवराज की सहमति से ही हुई है। हालांकि पूर्व अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान को भी मुख्यमंत्री की ही सहमति से अध्यक्ष बनाया गया था, लेकिन ऐन चुनाव के बीच उन्हें हटाकर राकेश सिंह को जिम्मेदारी दी गई है। इससे यही संदेश गया है कि मुख्यमंत्री को नंदकुमार सिंह चौहान के चुनावी कौशल पर पूरा भरोसा नही था। यदि ऐसा नही था तो पार्टी प्रदेश में चुनाव लड़ने का फैसला उनके नेतृत्व में ठीक उसी तरह करती जैसा फैसला लोकसभा चुनाव के लिए राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बारे में किया गया है। यह भी उत्सुकता का विषय है कि भाजपा को प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कमलनाथ औऱ अपने पूर्व अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान के राजनीतिक कद में ऐसी असमानता दिखाई देने लगी थी ,जो कि उसकी चुनावी संभावनाओं को बलवती होने की राह में बाधक बन सकती थी। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक यह भी मानते है कि कमलनाथ एवं राकेश सिंह में भी समानता स्थापित नही की सकती है।  कमलनाथ अपनी रैलियों में जैसी भीड़ इकट्ठी कर रहे है, वैसी भीड़ राकेश सिंह की सभा मे नही आ रही है। दरअसल भाजपा अभी भी राकेश सिंह की सांगठनिक क्षमता एवं रणनीतिक कौशल पर भरोसा नही कर पा रही है कि उन्हें चुनावी अभियान में मुख्यमंत्री का जोड़ीदार मान लिया जाए। प्रदेश में भाजपा का सबसे लोकप्रिय चेहरा अभी भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ही है। राकेश सिंह उनके सहायक की भूमिका में ही दिखाई दे रहे है। इससे यह माना जाए कि मुख्यमंत्री के आभामंडल ने प्रदेश अध्यक्ष के आभामंडल को सीमित कर दिया है। इस दृष्टि से कांग्रेस लाभ में नजर आ रही है। कांग्रेसाध्यक्ष कमलनाथ एवं कांग्रेस के चुनाव प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया का अपना अपना आभामंडल है।

 मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को अब यह भी तय करना है कि प्रभात झा को किस रूप में भाजपा की जीत सुनिश्चित करने में भागीदार बनाया जाए। यदि मुख्यमंत्री अपनी यात्रा में उमड़ रही भीड़ को विधान सभा चुनाव में जीत का संकेत मान रहे है तो यह स्वभाविक भी है। भीड़ को हमेशा ही समर्थन का परिचायक माना जाता है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के रोड़ शो में भी उमड़ी भीड़ से यह अनुमान लगाना कठिन नही है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल निरन्तर बढ़ रहा है। कार्यकर्ताओं को अब आशा की एक किरण दिखाई देने लगी है कि चुनाव के बाद उनके अच्छे दिन आने वाले है। इधर कांग्रेस ने यह संकेत भी दे ही दिया है कि वह  चुनाव में व्यापमं औऱ ई टेंडरिंग में कथित घोटाले को चुनावी मुद्दा बनाएगी। इसके अलावा बढ़ती महिला हिंसा, किसानों का असंतोष, ईंधन के रोजाना बढ़ते दाम चुनाव में भाजपा को असहज कर सकते है।

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लगातार 15 वर्षों तक सत्ता सुख किसी भी पार्टी में यह अहंकार जगा सकता है कि वह अपराजेय है। कुछ ऐसा ही भाव शिवराज सरकार के अंदर भी आ गया है। मध्यप्रदेश की सड़कों को अमेरिका से अच्छी बताकर मुख्यमंत्री को जनता से वाहवाही मिलने की उम्मीद थी ,परंतु ऐसा हुआ नही। सबसे बड़ा सवाल तो ये ही है कि मुख्यमंत्री को यदि मध्य्प्रदेश में अमेरिका से ज्यादा खुशहाली नजर आ रही है तो अमेरिका की यात्राएं करने का औचित्य क्या है। मुख्यमंत्री की यह आत्ममुग्धता पार्टी के चुनावी अभियान के लिए तो ठीक नही कही जा सकती। इधर चुनावों को देखते हुए जनता को ढेरों सौगातों की बरसात करने वाले चौहान ने खजाने को दांव पर लगा दिया है।इन घोषणाओं पर अमल करने के लिए सरकार पर कर्ज लेने के अलावा कोई चारा नही है। इसे लेकर सरकार कांग्रेस के निशाने पर भी है। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहते है कि प्रदेश के हर मतदाता पर औसतन 22 हजार का कर्ज है। कांग्रेस पहले ही मांग कर चुकी है कि जन आशीर्वाद यात्रा का खर्च सरकार को करना चाहिए। कांग्रेस ने ओवर ड्राफ्ट के संबंध में सरकार और रिजर्व बैंक के बीच जो पत्राचार हुआ है उसे भी सार्वजनिक करने की मांग की है लेकिन सरकार इस पर पूरी तरह मौन है।

गौरतलब है कि भाजपा के 15 वर्षों के शासन में कभी भी ओवरड्राफ्ट के हालात नही बने। सरकार ने विगत मानसून सत्र में 11990 करोड़ का अनुपूरक बजट पारित कराया था। इसके लिए सरकार इसी वित्तीय वर्ष में तीन बार बाजार से कर्ज ले चुकी है। सरकार को लगता है कि इतनी लोकलुभावनी घोषणाओं के बाद चौथी बार उसका सत्ता में आना तय है औऱ सत्ता में आने के बाद आर्थिक हालातों पर नियंत्रण करने का कोई न कोई उपाय वह ढूंढ ही लेगी। अब सवाल यह है कि यदि भाजपा की बजाय कांग्रेस ने जनता का समर्थन जीत लिया तो क्या वह इस स्थिति पर नियंत्रण कर लेगी। अतः कहना होगा कि सत्ता में चाहे जो आए उसे प्रदेश की आर्थिक स्थिति से दो चार होना ही पड़ेगा।

 

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