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आम नहीं है पुलिस की बगावत, पहले भी गिर चुकी है सरकारें


GAURAV SHUKLA 06/10/2018 17:16:17
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Lucknow. राजधानी में 29 सितंबर को हुए विवेक तिवारी हत्याकांड के बाद पुलिस प्रशासन में एकतरफा कार्रवाई के आरोप को लेकर विरोध के स्वर पूरी तरह से प्रखर हैं। जिसके चलते सिपाहियों में विरोध की चिंगारी भड़क रही है। इसके चलते जहां एक ओर पहले सिपाही सिर्फ सोशल मीडिया पर ही कैंपेन चलाकर विरोध दर्ज करवा रहे थे। वहीं अब खुले तौर पर भी इस्तीफे सामने आने लगे हैं। यह विरोध उस दौरान खुलेआम देखने को मिला जब 5 अक्टूबर को डीजीपी और आईजी एलओ के आदेश बावजूद सिपाहियों ने काली पट्टी बांध कर प्रदर्शन किया। 

Apradhnama AAM nahi police ki bagawat

राजधानी के मौजूद प्रकरण के अलावा सिपाहियों में इलाहाबाद की घटना को लेकर भी रोष है। इलाहाबाद पुलिस के सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह पर कचहरी में प्राणघातक हमला हुआ। पुलिसकर्मियों के अनुसार इस हमले में उनकी जान जाने की भी आशंका थी और उन पर हमला करने वाले नबी अहमद पर कम से कम आधा दर्जन मुकदमे दर्ज थे। खुद की जान को बचाने के लिए सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह ने गोली चला दी, जिसमें हमलावर नबी मौके पर ही मारा गया। यहां तक इस घटना के वायरल वीडियो में भी देखा जा सकता है कि नबी अहमद ने किस तरह शैलेन्द्र सिंह की पिटाई की। इसके बाद इलाहाबाद परिक्षेत्र की पुलिस ने सब इंस्पेक्टर को सलाखों के पीछे भेजने के लिए दिन रात एक ऐसी धाराएं लगा दी कि तीन साल में उन्हें एक पल की भी जमानत नहीं मिली। वहीं सब इंस्पेक्टर का परिवार आर्थिक रूप से तबाह हो गया औऱ उनका परिवार सड़क पर आ गया। वहीं इस शांत पड़े मामले ने तूल तब पकड़ा जब लखनऊ में दो पुलिसवालों ने आधी रात को लक्जरी कार में विवेक तिवारी को गोली मारी। इस घटना के अगले दिन ही घटना की प्रत्यक्षदर्शी सना और विवेक की पत्नी कल्पना तिवारी के आगे कैमरे और माइक की लाइन लग गयी, लेकिन आरोपी प्रशान्त की पत्नी की उनके विभाग ने भी नहीं सुनी। 

आपको बता दें कि मामले की सत्यता का परीक्षण सिर्फ सना के बयान पर किया गया और उसके बयान को ही सटीक औऱ प्रमाणिक माना गया। वहीं राखी के अनुसार उसकी गुहार को कप्तान तक ने सुनना उचित नहीं समझा। पुलिसकर्मियों का कहना है कि सब इंस्पेक्टर जेपी सिंह, सिपाही अंकित तोमर जैसे वीर बलिदानियों की आत्मा तक इस कार्यप्रणाली को देखकर कचोट गई होंगी जिन्होंने अपने जीवन को इस समाज के लिए समर्पित कर दिया। आतंकियों की बारी आने पर सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति तक के फैसले तक इंतजार करने वालो ने अचानक ही सिपाहियों को जांच अधिकारी की रिपोर्ट आने से पहले ही दोषी ठहरा दिया, जिसको उनके ही अधिकारी हां में हाँ मिलाते नजर आ रहे।

Apradhnama AAM nahi police ki bagawat

  पहले हो चुके हैं विद्रोह 

आपको बता दें कि पुलिस की ही नाराजगी का खामियाजा सरकारों को पहले भी भुगतना पड़ चुका है। साल 1973 में यूपी में कांग्रेस सरकार के दौरान घटिया खाने को लेकर पीएसी के जवानों ने रोष प्रकट किया था। उस दौरान शुरुआती विरोध को नकार दिया गया। उस दौरान अखबारों में सिंगल कॉलम में खबर छपी, जिसमें घटिया खाने का जिक्र किया गया। इसके बाद मई 1973 में पीएसी के जवानों में असंतोष फूटा और बगावती स्वर प्रखर हुए। इस घटना के बाद राज्य सरकार के हाथ पांव फूले और दिल्ली तक खलबली मच गयी थी। आनन फानन में आलम यह हुआ कि लखनऊ की सड़को पर सेना के वाहन दौड़ने लगे। सेना ने पुलिस लाइन को चारों ओर से घेर लिया। जिसके बाद पीएसी और सेना को आमने सामने देखा गया। कथिततौर पर उस दौरान हुई गोलीबारी में तकरीबन तीस विद्रोही जवान मारे गये। वहीं, सौ से अधिक जवानों को गिरफ्तार किया गया। सेना ने भले ही उस दौरान हालात पर काबू पा लिया हो लेकिन मुख्यमंत्री पं. कमलापति त्रिपाठी को उस दौरान कुर्सी गंवानी पड़ी थी। 12 जून 1973 को उन्होंने इस्तीफे की पेशकश कर दी इसके बाद यूपी में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा।

Web Title: Apradhnama AAM nahi police ki bagawat ( Hindi News From Newstimes)


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