तेल का खेल और सरकार की चुनावी दरियादिली!


GAURAV SHUKLA 15/10/2018 11:38:30
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tel ka khel or chunav ki siyashi dariyadili

कृष्णमोहन झा

(लेखक IFWJ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और डिज़ियाना मीडिया समूह के राजनैतिक संपादक है)

केंद्र की मोदी सरकार ने आखिरकार पेट्रोल एवं डीजल के 52 दिनों से अनवरत रूप से बढ़ रहे दामों पर विराम लगाने का फैसला कर ही लिया, लेकिन सरकार इसके लिए तब तक जनता के धैर्य की परीक्षा लेती रही जब तक की पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव की तिथियां घोषित करने का समय एकदम नजदीक नहीं आ गया। इधर सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम घटाने के इंतजाम किए ओर उधर आयोग ने पांच राज्यों में चुनाव तिथियों की घोषणा कर दी। ऐस प्रतीत होता है कि चुनाव आयोग एवं केंद्र सरकार दोनों एक दूसरे का ही इंतजार कर रहे थे। अगर सरकार को यह अंदेशा होता कि चुनाव आयोग पांच राज्यों की विधानसभा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा करने में अभी और विलंब कर सकता है तो सरकार पेट्रोल और डीजल के दामों में कमी करने का फैसला कुछ और दिन टाल देती। 

 

सरकार अब भले ही ये कहे कि चुनाव से इसका कोई लेना देना नहीं है किन्तु हकीकत तो यही है वही ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसी राज्य की विधानसभा के चुनाव के पहले सरकार ने पेट्रोल डीजल के दामों में कमी करने का फैसला किया हों। इसके पहले 12 मई को कर्नाटक चुनाव के समय भी सरकार ने 19 दिनों तक पेट्रोल व डीजल के दामों में कोई वृद्धि नहीं की थी, किन्तु मतदान की तारीख बीतने के दो दिन बाद ही पेट्रोल डीजल की बढ़ोतरी का सिलसिला शुरू हो गया और अगले 18 दिनों में पेट्रोल व डीजल के दामों में चार रूपए की बढ़ोतरी हो गई। इसी तरह जब 9 से 14 दिसंबर के बीच गुजराज चुनाव होने थे तब भी 1 से 14 दिसंबर  की अवधि में मात्र 2 दिन पेट्रोल के दाम बढ़े परन्तु 14 दिसंबर के बाद फिर मूल्य वृद्धि का सिलसिला शुरू हो गया था। हालांकि चुनावों को देखते हुए ऐसे फैसले केवल मोदी सरकार ने ही नहीं बल्कि पूर्व मनमोहन सरकार ने भी चुनाव को देखते को देखते हुए इस तरह के फैसले लिए थे। 

 

आश्चर्य की बात यह है कि मोदी सरकार के मंत्रियों ने पिछले दिनों अपने बयानों से जनता की यह भरोसा दिलाने की कोई कसर नहीं छोड़ी कि इस विकट समस्या पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। सरकार के प्रभावशाली मंत्री बार -बार यह दावा कर रहे थे  कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में क्रूड आयल की बढ़ती कीमतों एवं उत्पादन में अनियमितता के कारण देश में लगातार पेट्रोल व् डीजल के दामों में वृद्धि हो रही है।  सरकार बार बार यह भी कहती रही कि तेल की कीमतों को तय करने का अधिकार तेल कंपनियों को है ,ऐसे में सरकार का उस पर नियंत्रण नहीं है। मोदी सरकार ने यह कहकर भी अपना बचाव कर लिया कि तेल कंपनियों को नियंत्रण मुक्त करने का फैसला पिछली यूपीए सरकार ने लिया था। 

 

पेट्रोल डीजल के दामों को नियंत्रित करने का सरकार के लिए एक उपाय है कि वे एक्साइज ड्यूटी में कमी कर दे ,लेकिन इस पर केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 18 जून को दो टूक कहा था कि सरकार यदि इसमें 1 रूपए की भी कमी करती है तो उसे 14 हजार करोड़ का नुकसान होगा। सरकार इस नुकसान को सहन नहीं कर सकती है, लेकिन जैसे से पांच राज्यों के चुनावों की तिथियां घोषित होने की घड़ियां नजदीक आई तो वित्त मंत्री ने सरकार खजाने की तनिक भी परवाह नहीं करते हुए एक्साइज ड्यूटी में डेढ़ रुपए की कमी कर दी। आश्चर्य की बात है कि जो वित्त मंत्री एक रुपए एक्साइज ड्यूटी घटाने पर 14 हजार करोड़ का भारी नुकसान होने की बात कर रहे थे ,उनके ही द्वारा अब इसमें डेढ़ रुपए की कमी को वे मामूली नुकसान बता रहे है। 

tel ka khel or chunav ki siyashi dariyadili

वित्त मंत्री ने कहा कि पेट्रोल डीजल पर सेन्ट्रल एक्साइज ड्यूटी में डेढ़ रूपए प्रति लीटर की कटौती से सरकार अपने राजस्व में जो सालाना 21 हजार करोड़ का नुकसान होगा वह कुल राजस्व का मात्र 0.05 फीसदी है। वित्त मंत्री इस सवाल का जवाब देने को तैयार नहीं है कि उन्होंने जनता की भलाई का यह जरुरी फैसला लेने में चुनाव तिथियों का इंतजार

क्यों किया ? वित्त मंत्री यह कह रहे है कि सभी राज्यों की जनता को राहत मिलनी चाहिए थी तो यह सवाल भी स्वाभाविक है कि जनता की तकलीफ को देखते हुए सरकार चुनाव के समय ही क्यों संवेदनशील हुई ? वैसे भी इस कमी के पहले रोजाना बढ़ रहे दामों से सरकार ने जनता से इतना पैसा वसूल लिया है कि डेढ़ रुपए प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी कम करने से उसके राजस्व पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। दरअसल सरकार ने अपने घाटे की भरपाई करने के बाद ही जनता को राहत दी है। 

 

केंद्र सरकार ने इसके साथ ही तेल कंपनियों से 1 रुपए प्रति लीटर दाम कम करने को कहा था ,वही भाजपा शासित 13 राज्यों की सरकारों ने भी वेट में ढाई रूपए की कमी कर दी। इस तरह इन 13 राज्यों में पेट्रोल व डीजल के दामों में 5 रूपए तक की कमी हो गई। सरकार भले ही यह कहे कि उसने जनता की तकलीफों को देखते हुए यह राहत दी है लेकिन जनता से अब यह वास्तविकता छिपी नहीं है कि सरकार की यह दरियादिली केवल चुनावों तक सीमित है। एक बार चुनाव संपन्न हुए नहीं कि फिर पेट्रोल व डीजल के दामों में उछाल जारी हो जाएगा। जनता को फिर अगली राहत के लिए  लोकसभा चुनाव तक का इंतजार करना पड़ेगा। अर्थात कहने का मतलब है कि अच्छे दिन पांच साल में कभी कभी ही आते है।

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