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अनोखी परंपरा: यहां पर लोग जिंदा रहते खुद को बना लेते हैं ममी


ABHIMANYU VERMA 21/10/2018 16:21:55
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Lucknow. दुनिया में कई ऐसे देश हैं जो अपने अजीबो-गरीब रीति-रिवाजों के लिए जाने जाते हैं। कुछ देशों की परंपरा तो ऐसी है, जिनको जानकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे। आज हम आपको एक ऐसी ही परंपरा के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसको जानकर आप अपने दातों तले उंगलियाँ दबाने पर मजबूर हो जाएंगे। दरअसल दुनिया में एक ऐसी जगह है, जहां इंसान खुद अपनी ममी बनाता है। इस भयानक परंपरा में इंसान को जिंदा रहने के दौरान कीड़ों-मकोड़ों का भोजन बनना होता है। यह परंपरा किसी और देश में नहीं बल्कि जापान में प्रचलित है।  

Buddhist monks tradition of making mummies

   खुद को ममी बनाने वाले की होती है पूजा

उत्तरी जापान में जिंदा इंसान को ममी बनाने की परंपरा प्रचलित है। इसे यहां पर रहने वाले बौद्ध भिक्षु निभाते हैं। देश के उत्तरी भाग में कई ऐसे मठ हैं जहां ये परंपरा निभाई जाती है। यह परंपरा इस समुदाय के लोग सैकड़ों वर्षों ने निभाते आए हैं और कई भिक्षु जिंदा रहने के दौरान खुद को ममी बना चुके हैं। बताया जाता है कि ऐसा करने में सफल होने वाले भिक्षुओं को भगवान के बराबर दर्जा दिया जाता है और उसकी पूजा की जाती है।

Buddhist monks tradition of making mummies

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   कूकाई नाम के पुजारी ने शुरू की थी ये खौफनाक परंपरा

जिंदा रहते खुद को ममी बनाने की बात सोचकर ही हर किसी के रोंगटे खड़े हो जायेंगे। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये है कि इस परंपरा की शुरुआत किसने की? बताया जाता है कि इसकी शुरुआत आज से लगभग 1000 साल पहले कूकाई नाम के एक पुजारी ने वाकायामा प्रांत के माउंट कोया स्थित मंदिर से शुरू की थी। साथ ही कूकाई ने इस दौरान बौद्ध धर्म में शिंगोन नाम से एक पंथ की स्थापना भी की थी। जिसके बाद से ही ये परंपरा आज तक चलती आयी है। वक्त के साथ पंथ को मानने वाले बौद्ध भिक्षुओं में इस परंपरा का चलन बढ़ता ही गया और एक के बाद एक सैंकड़ों जिंदा भिक्षु ममी बनते गए।

Buddhist monks tradition of making mummies

  ममी बनने के लिए करनी पड़ती है विशेष तैयारी 

किसी जिंदा इंसान का खुद को ममी बनाने की बात मुंह से कहना जितना आसान है, उसे करना उससे कई गुना मुश्किल है। इसके लिए कई सालों की साधना करनी पड़ती है। बताया जाता है कि जिस भी बौद्ध भिक्षु को ममी बनना होता है, उसे पहले ही इसकी घोषणा करनी पड़ती है। इसके बाद उसे अगले 1000 दिनों तक विशेष प्रकार के खानपान के जरिये जिंदा रहना होता है जिसमें उसे खाने के लिए फली के बीज और अन्य कई तरह के बीज दिए जाते हैं। 

Buddhist monks tradition of making mummies

जो भिक्षु इस कठोर आहार नियम का सही से पालन करते हैं, उनके शरीर की सारी चर्बी निकल जाती है। इसके बाद अगले 1000 दिनों तक उस भिक्षु को ऊरूषी नाम से वृक्ष से बनी जहरीली चाय पिलाई जाती है। इस दौरान उस भिक्षु को जबरदस्त उल्टियां होती है तथा शरीर का सारा पानी, खून और तरल पदार्थ सूख जाता है और बचती है तो केवल चमड़ी और हडि्डयां।

Buddhist monks tradition of making mummies

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  हडि्डयों के ढांचे से बनाई जाती है ममी

इसके बाद हडि्डयों के ढ़ांचे बन चुके भिक्षु में फिर भी प्राण होते हैं। शुरू होती है खुद को ममी बनाने की असली प्रक्रिया। इस अंतिम प्रक्रिया के बाद भिक्षु को पत्थर से बनी एक छोटी सी समाधि में हवा का एक सुराख बनाकर एक ही मुद्रा में बैठाकर बंद कर दिया जाता है और उसे दूसरी दुनिया का इंसान मान लिया जाता है। फिर वो भिक्षु जब तक प्राण रहते हैं। तब तक रोज घंटी बजाकर यह बताता है कि वो अभी जिंदा है। जिस दिन घंटी बजना बंद हो जाती है उस दिन समाधि में हवा के सुराख को भी बंद कर अगले 1000 दिन तक फिर सील कर दिया जाता है। 

Buddhist monks tradition of making mummies

यह समय गुजरने पर उस भिक्षु को फिर से वापस निकाला जाता है और उसका ममी बनने का समय पूरा होना मान लिया जाता है। उसे दर्शनों के लिए मंदिर में ले जाकर रख दिया जाता है और पूजा की जाती है। हालांकि आपको बता दें कि जापान की सरकार ने अब इस परंपरा अब रोक लगा दी है।

Buddhist monks tradition of making mummies

Web Title: Buddhist monks tradition of making mummies ( Hindi News From Newstimes)


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