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Birthday Special : कैसे नेता विपक्ष बने मुलायम सिंह यादव और हर गलत निर्णय पर खोली सरकार की पोल 


GAURAV SHUKLA 22/11/2018 10:47 AM
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वर्ष 1985 गैर कांग्रेसी पार्टियों के लिए अस्तित्व की लड़ाई का वर्ष था जिसमें उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया। यह वह दौर था जब कर्नाटक में जनता पार्टी सत्ता में वापस आई थी और गुजरात एवं उड़ीसा में भी पार्टी का प्रदर्शन संतोषजनक था। यह वह दौर था जब एक ओर कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में बिहार में लोकदल मजबूत होकर उभर रहा था तो वहीं उत्तर प्रदेश में यह चुनाव मुलायम सिंह यादव नेतृत्व में लड़ा जाना था। इस चुनाव में लोकदल को 85 सीटें मिली जो कि 1980 के मुकाबले काफी बेहतर स्थिति थी। इस चुनाव में मुलायम सिंह ने भी जसवंत नगर से जीत दर्ज की। जबकि कांग्रेस उम्मीदवार शिवराज सिंह यादव को हार का सामना करना पड़ा। इस चुनाव में मुलायम को 49390 वोट मिले जबकि शिवराज को महज 23916 वोट ही मिल सके। 

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इस चुनाव के बाद मुलायम के प्रयासों से लोकदल को बहुत कुछ हासिल हुआ। इससे पार्टी कार्यकर्ताओं से लेकर पदाधिकारियों तक सभी ने मुलायम की काफी प्रशंसा की। इस चुनाव के बाद ही चरण सिंह न सिर्फ जीत से खुश हुए बल्कि उन्होंने मुलायम की पीठ थपथपाते हुए अन्य लोगों को भी सीख लेने की सलाह दी। इस जीत के बाद मुलायम का राज्य विधानसभा से नेता विपक्ष के लिए चुना जाना तय हो गया। मुलायम ने विपक्ष में रहते हुए सरकार की छोटी सी चूक को भी आड़े हाथों लिया। इस दौरान राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के के दौरान ही 18 मार्च 1985 को उन्होंने लोकसभा और विधानसभा चुनावों में हुई धांधली की चर्चा की। इसके बाद बजट 1985-86 में भाग लेते हुए सरकार की आर्थिक नीति का आलोचनात्मक विश्लेषण किया। इस बजट को बड़े लोगों का बजट करार देते हुए मुलायम ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह गलत आंकड़े पेश कर लोगों को भ्रमित करने का काम कर रही है। इसी के साथ सरकार के बेकार के खर्चों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा लंदन में प्रधानमंत्री के सरकारी आवास 10 डाउसिंग स्ट्रीट का उदाहरण देते हुए कहा कि इसमें 70 से अधिक प्रधानमंत्री रह चुके हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में 5 साल की अवधि में ही तीन मुख्यमंत्रियों ने अपने सरकारी आवास बदले हैं। इसी बीच मुलायम ने हमलावर होते हुए कहा कि, "यह हो सकता है कि दिन में सूर्य निकलने की बजाए रात में निकलने लगे, रात में चांद चमकता है तो दिन में चमकने लगे, हम सब पैर के बजाए सिर से चलने लगें, लेकिन कांग्रेस के रहते इस देश में समाजवाद के आने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है।" 
मुलायम अपनी जीत के साथ ही जहां एक ओर कांग्रेस की पोल खोल रहे थे वहीं दूसरी ओर वह जनांदोलनों का भी आयोजन कर रहे थे। इसका उद्देश्य था कि सरकार पर दबाव डाला जा सके। इसी कड़ी में लोकदल के रास्ता रोको आंदोलन से पूरी राज्य परिवहन प्रणाली 27 जनवरी 1986 को ठप हो गयी। इस बीच सरकार ने अपनी ओर से सभी स्कूलों और कॉलेजों को बंद करने का आदेश दे दिया जिससे की युवक मुलायम के इस आंदोलन में भाग न ले सकें। इतना ही नहीं आंदोलन को रोकने के लिए पुलिस को असीमित अधिकार दे दिये गये और निपेधाज्ञा तक लागू कर दी गयी। उस वक्त पुलिस ने कई स्थानों पर गुंडा कानून तथा असामाजिक गतिविधियों को रोकने संबंधी कानून का गलत उपयोग करते हुए कार्यकर्ताओं पर लाठियां भांजी। लेकिन मुलायम के नेतृत्व में मजबूत विपक्ष कांग्रेस के खात्मे के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो गया। इस गहमागहमी के दौर के बीच मुलायम के व्यक्तिगत मित्र और राजनैतिक स्तर पर कट्टर दुश्मन की पहचान रखने वाले वीर बहादुर सिंह को नारायण दत्त तिवारी की जगह नया मुख्यमंत्री बना दिया गया। वीर बहादुर सिंह की पहचान उन दिनों चतुर राजनीतिज्ञ के तौर पर थी।  इसके बाद जब भी सरकार से कोई गलती होती तो मुलायम कठोर रुख अपनाते और विधानसभा में प्रत्येक बहस पर सरकार पर हमलावर होते। 

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गिर गया अविश्वास प्रस्ताव लेकिन मुलायम को मिला मौका 
नेता विपक्ष रहते हुए मुलायम कोई भी घटना होने पर वहां जाने का ध्यान रखते फिर चाहे फतेहपुर का लीलावती कांड हो, कफल्टा का अत्याचार हो, शामली में पुलिस द्वारा निर्दोष सुभाष की हत्या हो या बलिया का नरसंहार मुलायम ने सभी जगहो पर सरकार को स्पष्ट रुख लेने और प्रभावितों को राहत दिलाने का सफल प्रयास किया। आम जनता में फैली असंतोष की भावना के बाद मुलायम ने 1986 में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। भले ही यह प्रस्ताव गिर गया लेकिन फिर भी उन्हें खुली बहस के जरिए सरकार के गलत कामों की पोल खोलने का मौका मिल गया। उन दिनों मुलायम के बढ़ते प्रभाव से कांग्रेस ही नहीं अन्य विपक्षी दल भी परेशान हो गये। 
नहीं मानी गयी बात और नेता विपक्ष के पद से हटवाए गये मुलायम 
इसी मुलायम का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि उन दिनों चरण सिंह गंभीर रूप से बीमार हो गये। चरण सिंह की बीमारी के साथ ही मतभेद बढ़ने लगे। उनके बेटे अजीत सिंह राजनैतिक परिदृश्य में उभरे। चरण सिंह जो परिवारवाद के घोर विरोधी थे उन दिनों उनकी पार्टी इसी बीमारी का शिकार हो गयी। जिसके बाद अजीत सिंह को पार्टी का महासचिव चुन लिया गया और बाद में वह राज्यसभा के लिए चुने गये। उन दिनों भी पार्टी के तीनों उम्मीदवारों अजीत सिंह, रशीद मसूद और शरद कुमार की जीत में मुलायम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन पार्टी का एक गुट असंतुष्ट रहा और पार्टी पर कब्जा जमाने की कोशिशों में लगा रहा। बीमार होने के बावजूद चरण सिंह को इस मतभेद की जानकारी थी। मुलायम जब एक बार उनसे मिलने पहुंचे तो वह काफी खुश हुए। आपको बता दें कि चरण सिंह ने जालौन की एक सभा में मुलायम को अपना बेटा बताया था और बस्ती में सभा के दौरान अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। फिर इस तरह पार्टी के भीतर चल रहे मतेभेदों  से वह काफी परेशान थे। राजनीतिक जानकार बताते है कि मुलायम खुद उन दिनों कहते थे कि जब वह चरण सिंह से मिलने पहुंचे तो चरण सिंह ने जोर देते हुए कहा कि पार्टी के सभी लोग इकट्ठा हो जाएं और इस मुद्दे पर चर्चा करें। बावजूद इसके अजीत सिंह ने कहा सब ठीक है और पिता से जब राय मांगी की उन्हें इस मुद्दे पर क्या करना चाहिए तो चरण सिंह ने कहा मुलायम के साथ रहो। मुलायम कहते है उन्हे उम्मीद थी कि इस आदेश का असर होगा और मतभेद काफी हद तक समाप्त हो जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। चरण सिंह की इच्छा के विपरीत उनके बेटे ने पार्टी पर आधिपत्य करने के लिए प्रयास जारी रखा और 10 फरवरी 1987 को यूपी विधानसभा में विपक्ष के नेता के पद से मुलायम को हटवा दिया।  

Web Title: birthday special mulayam singh yadav kaise neta vipaksh bane netaji ( Hindi News From Newstimes)


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