राफेल सौदा: आखिर सवालों व जवाबों में क्यो नहीं नजर आती साफगोई


DEEP KRISHAN SHUKLA 05/01/2019 13:36:15
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NEW DELHI. राफेल मामले में रक्षामंत्री द्वारा गोपनीयता का हवाला देते कुछ बातों की सफाई भले ही दी हो लेकिन कांग्रेस पार्टी इससे संतुष्ट होती नहीं दिख रही है। पार्टियों की राजनीति व रणनीति अपनी जगह है लेकिन जवाबों के साथ साथ सवालों में भी साफगोई दिखनी चाहिए ताकि स्पष्ट हो सके कि आखिर में घोटाला है क्या?

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मालूम हो कि लोकसभा में कई दिनों से राफेल डील को लेकर हंगामा चल रहा था। चर्चा में

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को केन्द्र सरकार से सवाल किया था कि जनता को बताया जाए कि 560 करोड़ रुपये कीमत वाला एक विमान की कीमत 1600 करोड़ रुपये क्यों दी गई? राहुल ने इसके बाद एक ट्वीट में अपने आरोपों को तीन सवालों के रूप से तीन सवालों के रूप में प्रस्तुत किया जिसमें पहला सवाल था कि 126 के बजाय 36 विमान क्यों? दूसरा सवाल था कि एचएएल का ठेका अम्बानी को? उनका सवाल है कि एचएएल का ठेका रद्द करके 'एए' यानि अनिल अम्बानी को क्यों दिया गया?Rafael sauda aakhir swalo v javabon me kyon nahi nazar aati saafgoi

जिस पर शुक्रवार को रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने जो जवाब दिए उसके बाद नई रार शुरू हो गयी है। रक्षामंत्री ने राफेल मुद्दे पर बिंदुवार जवाब देने के साथ विपक्ष पर गुमराह करने का आरोप भी लगाया। रक्षा मंत्री ने बताया चीन ने 2004 से 2014 के दौरान 400 विमान बेड़े में शामिल किए। जबकि पाकिस्तान ने विमानों की संख्या में दो गुना बढ़ोतरी की है। हमारे पास 42 स्क्वॉड्रन थे जो घटकर मात्र 33 रह गए। सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार 18 विमान फ्लाईवे स्थिति में खरीद रही थी जबकि शेष विमान 11 साल में बनते। तत्काल जरूरत को पूरा करने में इतना समय क्यों?

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रक्षामंत्री ने कांग्रेस के आरोपों को मुद्दे से भटकाने वाला बताते हुए कहा कि सरकार में रहते हुए 10 वर्षों तक राफेल खरीदने एवं राष्ट्रीय सुरक्षा की मंशा कांग्रेस की नहीं थी। यूपीए के समय जो सौदा हो रहा था उसमें 108 विमान 11 साल में बनाए जाने थे। लेकिन सरकार 18 विमान भी नहीं ले पाई। रक्षामंत्री के जवाब से अंतुष्ट कांग्रेस सांसदों ने सदन से वाकआउट कर दिया था जिसके बाद राहुल गांधी ने आरोप लगाते हुआ कहा था रक्षामंत्री जवाब देने के बजाए सवालों से भाग रही हैं।

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  तस्वीर साफ करने से ज्यादा टांग खींचने में दिलचस्पी

दोनों ही पार्टियां जिस तरह से एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रही है उससे इतना तो स्पष्ट है कि उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अहम मुद्दे पर गंभीरता बरतने के बजाए एक दूसरे की टांग खींचने में ज्यादा दिलचस्पी है। राफेल सौदे को लेकर देश के दोनों बड़े राजनीतिक दलों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने अपने सवालों को लेकर जितने संदेह है वह तो स्पष्ट करें ही साथ ही यह स्पष्टता उनके जवाबों में भी परिलिक्षित होनी चाहिए।

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  गोपनीयता जरूरी पर विवरण तो देना ही पड़ेगा

माना कि राफेल डील देश की सुरक्षा से संबंधित मसौदा है लिहाजा इसका गोपनीय होना लाजमी है। लेकिन इसके ये मायने कतई नहीं कि सरकार के किसी भी अंग के पास इसकी जानकारी न हो। जानकारों की माने पर हर खरीद का लेखा-जोखा रखने की जिम्मेदारी सीएजी की है। सूचनाएं संवेदनशील हों तो उन्हें मास्क करके भी विवरण देश के सामने रखे जाते हैं। लिहाजा राफेल डील का भी विवरण एक न एक दिन तो देना ही होगा।

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  दोनों रास्ते फिलहाल बंद

जहां तक रही बात रही बात सौदे की तस्वीर साफ होने की तो वह हाल फिलहाल होती नहीं दिख रही है। क्योकि इसके दो रास्ते थे पहला सीएजी की रिपोर्ट व दूसरा उच्चतम न्यायालय की संस्थागत पड़ताल। लेकिन एक जगह चुनाव तो दूसरी जगह पर शीतकालीन अवकाश ने अभी तक मामले में पर्दा डाल रखा है। पहले उम्मीद थी कि शीत कालीन सत्र में सीएजी की रिपोर्ट पेश होगी लेकिन कहा जा रहा है कि चुनाव तक यह संभव न होगा। वहीं दूसरी ओर 14 दिसम्बर को कोर्ट ने विमान खरीद की निर्णय-प्रक्रिया, मूल्य-निर्धारण व ऑफसेट-पार्टनर तीनों मसलों पर फैसला तो सुनाया लेकिन उसकी शब्दावली के कारण कुछ संशय बरकरार है। इस संशय को दूर करने के लिए कोर्ट ही एक सहारा है जहां शीत कालीन अवकाश चल रहा है।

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  आखिर कब खत्म होगी रक्षा तकनीकि पर विदेशी निर्भरता

इस राफेल खरीददारी विवाद ने यह बात और देश के सामने उजागर कर दी है कि हम भले ही तकनीकी रूप में दक्षता का दंभ भर रहे हो लेकिन हमारे देश के रक्षा उद्योग का अपेक्षाकृत विकास अभी तक नहीं हो पाया है। हमारा देश आज भी सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों में आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है। देश में 60 फीसदी से ज्यादा रक्षा-तकनीक विदेशी है जिन्हें अन्य मुल्कों से मोटी रकम देकर खरीदा जाता है। देश में आखिर इस तरह की तकनीकी इजाद करने वाले क्यों तैयार नहीं किए जाते यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है। जिस पर इस सवाल का जवाब तलाश लिया गया तो शायद इसके बाद राफेल और बोफोर्स जैसे विवादों का जन्म ही नहीं होगा।

 

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