मप्र: सुनिये सरकार...नाम बदलना छोड़िये काम कीजिये ...काम..!


GAURAV SHUKLA 07/01/2019 11:18:05
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suniye sarkar naam badalna chodiye kaam kariye

कृष्णमोहन झा/

(लेखक IFWJ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और डिज़ियाना मीडिया समूह के राजनैतिक संपादक है)

मध्यप्रदेश में सपा, बसपा और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से बनी कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री कमलनाथ एक्शन मोड में आ चुके है। सत्ता की बागडौर अपने हाथों में लेने के तत्काल बाद ही उन्होंने कर्ज माफ़ी की घोषणा कर दी। उनके पिछले एक सप्ताह से लिए जा रहे निर्णयों से यह संकेत मिलने लगे है कि कमलनाथ सरकार पिछली भाजपा सरकार के सारे कार्यक्रमों का अंधानुकरण नहीं करेगी। वैसे मुख्यमंत्री कमलनाथ कह चुके है कि पिछली सरकार के जनकल्याणकारी कार्यक्रमों को जारी रखा जाएगा ,लेकिन उनकी सरकार ऐसे फैसले लेने से भी गुरेज नहीं करेगी जो पंद्रह साल तक राज करने वाली भाजपा को पसंद नहीं आएंगे। 

 

कमलनाथ के शपथ ग्रहण के बाद से ही ऐसे अनुमान लगाए जा रहे थे कि सरकार विवादस्पद फैसलों से परहेज करेगी और विपक्षी भाजपा को कोई ऐसा मुद्दा नहीं देगी, जिसका फायदा उन्हें आगामी लोकसभा चुनावों में मिलने की संभावना हो, परन्तु कमलनाथ सरकार फिलहाल ऐसा करते नजर नहीं आ रही है। कमलनाथ को तो इस बात की कोई परवाह नहीं है कि उनकी सरकार को न तो पिछली भाजपा सरकार की तरह प्रचंड बहुमत है और न ही इस बात की चिंता है कि उनके कुछ फैसले विवादों को जन्म दे सकते है। हालांकि कमलनाथ काम करने की नई कार्यसंस्कृति विकसित करने के लिए कृतसंकल्प नजर आ रहे है , लेकिन इस संस्कृति के बीच उनकी सरकार के कुछ निर्णयों ने विपक्षी भाजपा को जरूर मुखर कर दिया है। 

 

कमलनाथ सरकार ने हर माह की पहली तारीख को मंत्रालय प्रांगण में  होने वाले राष्ट्रगान वन्देमातरम पर रोक लगाने का एलान कर दिया ,जिसका भाजपा ने कड़ा विरोध किया। हालांकि सरकार ने बाद में इसे नए सिरे से प्रारम्भ करने की घोषणा भी कर दी है , लेकिन भाजपा को तो मुद्दा मिल ही गया। हालांकि बाद में कमलनाथ यह जरूर कहते रहे कि उन्हें देशभक्ति दिखाने के लिए किसी के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है, लेकिन भाजपा यह कहने का मौका जरूर मिल गया कि राष्ट्रभक्ति सदैव राजनीति से ऊपर होती है। चूंकि अब सरकार ने वन्देमातरम गान को पुलिस बेंड के साथ कराने की घोषणा कर दी है तो अब भाजपा को भी विरोध का रास्ता छोड़ इसका स्वागत करना चाहिए। 

 

खैर इन विवादों के बीच कमलनाथ सरकार ने निःसंदेह कुछ अच्छे फैसले भी लिए है, जिनकी सराहना की जानी चाहिए। उन्होंने गरीब कन्याओं के  विवाह में सरकार की और से दी जाने वाली राशि को बढ़ाकर 51 हजार कर दिया है। नए साल के पहले ही दिन पुलिसकर्मियों को साप्ताहिक अवकाश देने की शुरुआत कर दी है। जनसुनवाई में अधिकारियों के साथ विधायकों के बैठने की व्यवस्था को भी अच्छा फैसला माना जा सकता है। चूंकि विधायक जनता के प्रतिनिधि होते है इसलिए इस कदम के बाद वे भी क्षेत्र की जनता के मामलों को अधिकारियों के साथ मिलकर सुलझा सकेंगे। 

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मुख्यमंत्री कमलनाथ ने यह घोषणा भी की है कि अब सरकार मंत्री और अधिकारी मिलकर चलाएंगे वही शासकीय घोषणाएं मंत्री नहीं अधिकारी करेंगे। इसका फायदा यह मिल सकता है कि अधिकारी घोषणाओं को लेकर पूर्व से ही गंभीर रहेंगे एवं उसे पूरा करने के लिए प्रयास भी करेंगे। पूर्व में अक्सर देखा गया है कि मुख्यमंत्री किसी भी समारोह में घोषणा तो कर देते थे ,लेकिन उसके बाद उनकी घोषणा धरातल पर उतरती नहीं दिखती थी। मंत्री और अधिकारी मिलकर सरकार चलाएंगे तो उनके बीच परस्पर संवाद होने से कार्य में गति भी आएगी। गौरतलब है कि पूर्ववती शिवराज सरकार में कई ऐसे प्रसंग आ चुके है जब मंत्रियों ने अधिकारियों की कार्यशैली की शिकायतें मुख्यमंत्री से की थी । नए मुख्यमंत्री ने अधिकारों के विकेंद्रीकरण की दिशा में अच्छी पहल की है और निश्चित रूप से इससे सरकारी कामकाज में तेजी आएगी। गौरतलब है कि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने तो दस साल तक अपने पास कोई विभाग नहीं रखा था। कमलनाथ भी यदि उसी परंपरा को यदि आगे बढ़ाना चाहते है तो यह अच्छी बात ही होगी। मध्यप्रदेश के नवनियुक्त मुख्य सचिव एसआर मोहंती ने भी पदभार संभालते ही स्पष्ट कर दिया है कि वे मंत्रालय में बैठने वाले मुख्य सचिव नहीं बनेंगे। उनका मानना है कि जनता से जुडी 99 फीसदी समस्याएं तो जिला स्तर पर ही सुलझ जाना चाहिए।निःसंदेह जनहित की समस्याओं और उनसे जुडी फाइलों का निपटारा राजधानी में ही होने की जो परंपरा वर्षों से चली आ रही है । यदि वे जिला स्तर पर ही निपट जाए तो विलम्ब से होने वाले कामों में निश्चित रूप से कमी आएगी। 

 

कमलनाथ सरकार अब भाजपा के दिवंगत नेता दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर चलने वाली योजनाओं का नाम भी बदलने जा रही है। सरकार का मानना है कि इन योजनाओं के जरिए पूर्व भाजपा सरकार संघ का प्रचार कर रही थी, इसलिए या तो उन्हें बंद किया जाना चाहिए या नए सिरे से शुरू किया जाना चाहिए। यहां यह उल्लेख करना जरुरी है कि किसी योजना का नाम पूर्व सरकार के किसी दिवंगत नेता के नाम पर भले ही जुड़ा हो, लेकिन यदि उसका लाभ जनता तक पहुंच रहा है तो न उसे बंद किया जाना चाहिए और न ही उसका नाम परिवर्तन होना चाहिए। हालांकि यह परिपाटी हमेशा से चली आ रही है कि जब कोई दल सत्ता में आता है तो वह अपने दिवंगत नेताओं के नाम पर योजनाओं के नाम रखता है ,लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद दूसरा दल उसमे तुरंत परिवर्तन करने लगता है। हमारे राजनीतिक दल कभी यह बड़प्पन नहीं दिखाते कि वे सत्ता में आने बाद दूसरे दलों के नेताओं के नाम की योजनाओं में परिवर्तन न करे।  सत्ता परिवर्तन होने पर योजनाओं के नाम बदलने का सिलसिला तभी रुक सकता है जब सभी दल इस बारे में कोई अलिखित आचार संहिता का पालन करे। यदि ऐसा करने के लिए वे तैयार नहीं तो फिर इस परिपाटी पर विराम लगने की कोई उम्मीद बेमानी ही होगी।

 

Web Title: Suniye sarkar naam badalna chodiye kaam kariye ( Hindi News From Newstimes)


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