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... तो क्या निगमों में स्मार्ट सिटी का काम आने से अभी तक नगर आयुक्त का पद संभाल रहे पीसीएस अफसर नाकाबिल हो गए ?


GAURAV SHUKLA 11/01/2019 13:32 PM
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Lucknow : स्वच्छता मिशन को लेकर चर्चा में रहने वाला नगर विकास विभाग अब सूबे के 10 नगर निगमों में कमिश्नर स्तर के अफसरों की तैनाती के प्रपोजल को लेकर चर्चा में है. उत्तर प्रदेश का नगर विकास विभाग भारी भरकम बजट वाले स्वच्छता मिशन को लेकर सुर्ख़ियों में है तो अब उसके इस प्रपोजल को स्मार्ट सिटी के भारी भरकम बजट को लेकर की गयी कवायद के तौर पर देखा जा रहा है. ऐसे में नगर विकास विभाग का यह प्रपोजल इस चुनावी वर्ष में सरकार के लिए हितकारी नहीं दिख रहा है. नगर विकास विभाग का यह प्रपोजल नई चर्चा को जन्म दे रहा है जिसमें निगमों में आईएएस अफसरों की तैनाती की बात की जा रही है. यूपी के नगर विकास विभाग ने 10 शहरों में कमिश्नर स्तर के आईएएस आफसरों को नगर आयुक्त बनाने का एक प्रपोजल बनाकर सरकार को भेजा है.

to kya nigamo ke kaam karne vale pcs nagar ayukt nakabil ho gae

नगर विकास द्वारा प्रस्तावित यह 10 नगर निगम अलीगढ,मेरठ,आगरा,कानपुर,प्रयागराज,वाराणसी,मुरादाबाद,बरेली,लखनऊ और गाजियाबाद में कमिशनर स्तर के आईएएस अफसरों को नगर आयुक्त बनाने का प्रस्ताव भेजा है. नगर विकास विभाग द्वारा भेजे गए इसी प्रस्ताव को लेकर पीसीएस संवर्ग के अफसरों में काफी नाराजगी है. पीसीएस अफसरों का कहना है कि नगर विकास विभाग के इस प्रपोजल के क्या मायने हैं, क्या यह माना जाए कि निगमों में स्मार्ट सिटी का काम आने से अभी तक नगर आयुक्त का पद संभाल रहे पीसीएस अफसर नाकाबिल हो गए जो उस कुर्सी पर सीनियर आईएएस अफसरों को बैठाने की कवायद शुरू की जा रही है.

अफसरशाही पर करीबी नजर रखने वाले जानकारों का मानना है कि यदि यह प्रपोजल सरकार द्वारा स्वीकार किया जाता है तो करोड़ों के बजट वाली स्मार्ट सिटी योजना पूरी तरह आईएएस संवर्ग के अफसर के हाथ में होगी. अभी तक स्मार्ट सिटी का चेयरमैन उस मंडल का कमिश्नर होता है ऐसे में यदि अगर सरकार नगर विकास विभाग का यह प्रपोजल पास करती है तो नगर आयुक्त के रूप में सीईओ भी आईएएस ही होगा. जिसका सीधा मतलब यह है कि अभी तक पीसीएस संवर्ग वाला नगर आयुक्त निगम को और करोड़ों के बजट वाले स्मार्ट सिटी योजना के क्रियान्वयन में फेल साबित हुआ है. जानकारों का कहना है कि 90 के दशक में म्युन्सिपल कार्पोरेशंस में कमिश्नर के पद पर सीधी भर्ती के आईएएस तैनात होते थे लेकिन बढ़ते कामों के बोझ और जनप्रतिनिधियों के दखल के चलते इस संवर्ग ने खुद को इससे किनारे कर लिया. आज जब स्मार्ट सिटी योजना का भारी भरकम बजट निगमों में आ आ गया है तो फिर से इनके द्वारा इस तरह की कवायद को जन्म दिया जा रहा है.    

इस विषय पर बातचीत में पीसीएस संघ के सचिव पवन गंगवार का कहना है कि सूबे में आईएएस संवर्ग की स्ट्रैंथ ही पूरी नहीं है और जितने आईएएस हैं उनके पद वेतनमान के अनुसार चिन्हित हैं. ऐसे में आईएएस कैडर के चिन्हित पदों को पहले भरा जाना चाहिए. इसके बाद यदि आईएएस अफसरों के सरप्लस की स्थिति में इस तरह की कवायद की जाती तो एक बार माना जा सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है इसमें सीधा-सीधा पीसीएस अफसरों को निशाना बनाया जा रहा है और उनकी अनदेखी की जा रही है. IASअथवा किसी भी अन्य संवर्ग के अधिकारियों को उस संवर्ग के अधिकारियों की तैनाती हेतु नोटीफाइड पदों से भिन्न पदों पर तैनाती हेतु विचार किये जाने से वो संवर्ग प्रभावित व हतोत्साहित होता है जिसके लिए वे पद पूर्व से चिन्हित होते हैं. पीसीएस एसोसिएशन अपेक्षा करता है कि आईएएस संवर्ग तथा पीसीएस संवर्ग के कैडर रिव्यु पर एसोसिएशन को विश्वास में लेकर कार्यवाही की जाएगी अन्यथा यदि कोई निर्णय पीसीएस अधिकारियों के विपरीत लिया जाता है तो विरोध करते हुए अग्रिम रणनीति पर निर्णय लिया जाना बाध्यता होगी.

उनका कहना है कि वैसे तो यह सरकार का निर्णय होता है कि वह किसको कहाँ तैनात करे लेकिन अगर ऐसा होता है तो पीसीएस संघ मांग करेगा की कैडर के आधार पर पदों को चिन्हित करने की व्यवस्था खत्म करते हुए अफसरों की योग्यता के आधार पर उनको तैनाती दी जाए और  पीसीएस अफसर को भी डीएम और कमिश्नर जैसे पदों पर तैनाती दी जाय. प्रमोटी आईएएस अफसरों और डायरेक्ट आईएएस अफसरों के जिलों की तुलना करके उनके परफॉर्मेस को देखा जा सकता है. पवन गंगवार का कहना है सचिव लेवल पर इन आईएएस अधिकारों को बैठने में दिक्कत आ रही है क्योंकि इनके दिमाग में कलेक्टर बनने की चाहत रहती है. जो डायरेक्ट अफसर कमिश्नरी में बैठे हैं उनकी तो ठीक है बाकी का सोचना होता है कि प्रमुख सचिव या फिर कमिश्नर जब बनेंगे तब बनेंगे, इस बीच में कोई ऐसा पद ढूंढो जहां पर कि अपना रुतबा बना रहे. इस सम्बन्ध में उन्होंने पीसीएस संघ के पूर्व अध्यक्ष बाबा हरदेव सिंह के कथन को कोट किया कि अगर आईएएस अफसर हमारे संवर्ग के पदों पर अतिक्रमण करेंगे तो हम बुलडोजर चला देंगे.

नगर विकास द्वारा भेजे गए इस प्रपोजल ने एक नई चर्चा को जन्म दे दिया है. लोगों का कहना है कि पहले आईएएस अफसर नगर निगम में बैठना नहीं चाहते थे, लेकिन आज नगर निगम आईएएस अफसरों की पसंद बनते जा रहे हैं. आईएएस अफसरों की इस पसंद के पीछे कहीं स्मार्ट सिटी तो नहीं जिसका करोड़ों का बजट होता है. स्मार्ट सिटी का चेयरमैन होता है कमिश्नर जो कि आईएएस होता है वही नगर निगम में बैठने वाला नगर आयुक्त उसका सीईओ  आईएएस अफसर होगा. यानी कि निगम के साथ ही साथ स्मार्ट सिटी का पूरा काम आईएस के हाथों में ही रहेगा जोकि पीसीएस अफसरों की कार्य क्षमता पर प्रश्नचिन्ह खड़े करने वाला होगा. अब सरकार इस विषय पर क्या फैसला लेती है यह तो आगे देखा जाएगा लेकिन अभी का यह कदम किसी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता. इससे आपसी खींचतान को और बढ़ावा मिलेगा जोकि शासन और जनहित में किसी तरह से लाभकारी नहीं होने जा रहा है. वहीँ अगर स्वच्छता मिशन और स्मार्ट सिटी योजना में अव्वल स्थान पाने वाले मध्य प्रदेश की अफसरशाही पर नजर डालें तो वहां निगमों में आयुक्तों के पद पर तैनाती पीसीएस संवर्ग के अफसरों की है.   

19 मार्च 2017 को उत्तर प्रदेश में भाजपा की योगी सरकार आने के बाद से ही सूबे की अफसरशाही का आपसी अंतर कलह अक्सर चर्चा में रहां है. अफसरों की यह आपसी अंतर्कलह कई बार सरकार की किरकिरी भी करा चुकी है. कभी आईएएस और पीसीएस के बीच निगमों में तैनाती को लेकर विवाद खड़ा हुआ तो कभी प्रमोटी आईएएस अफसरों को रैगिंग किए जाने की खबरें सुर्खियों में रहीं. आईपीएस अफसरों के आपसी झगड़े तक सार्वजनिक हुए. सूबे की अफसरशाही का ताजा मामला जो सुर्खियों में रहा वह आईपीएस अफसरों के तबादले जिसमें डीआईजी रैंक के अफसरों को जिले की कप्तानी दे दी गई थी. अब नगर विकास विभाग के इस प्रपोजल को लेकर सूबे की अफसरशाही चर्चा में है. 

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