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कैग ने किया बड़ा खुलासा,फंस गई मोदी सरकार,बीजेपी में मचा हड़कंप


RAGHVENDRA CHAURASIA 20/01/2019 17:44:21
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New Delhi. आम चुनाव से पहले मोदी सरकार फंस गई है। CAG ने मोदी सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर बड़ा खुलासा किया है। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र सरकार ने चार लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का खर्च और कर्ज यानी उधारी छिपाने का काम किया है। इस धनराशि का जिक्र बजट के किसी कागजों में नहीं है। सरकार ने सरकारी बजट का आंकड़ों को दुरूस्त रखने के लिए ऑफ बजट फाइनेंसिंग की विधि को अपनाया गया है। 

CAG Ne Kiya Bada Khulasa Fas Gai Modi Sarkar

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  सरकार ने अलग से पैसे ​का किया इतंजाम

कैग रिपोर्ट के मुता​बिक सरकार ने खाद्यान्न उर्वरकों पर ​सब्सिडी,सिंचाई,ऊंर्जा परियोजनाओं सहित अन्य तमाम पूंजीगत खर्चों को पूरा करने के लिए सरकार ने बजट से बाहर जाकर अलग से पैसों का इंतजाम किया है। इसके लिए उपभोक्ता,रेल,और ऊर्जा मंत्रालय में खासतौर से ऑफ बजट फाइनेंसिंग सिस्टम बनाया गया। कैग ने अपनी रिपोर्ट में इन चीजों को लेकर सरकार को जमकर लताड़ा है।

  कैग ने कहा कि हर चीज का जिक्र बजट में होना चाहिए

कैग ने अपने रिपोर्ट में कहा कि ऐसे सभी खर्चों और उधारियों का जिक्र कायदे से बजट में होना चाहिए। बताया गया ऑफ बजट फाइनेंसिंग से जुड़े खर्च संसद के नियंत्रण के बाहर होते हैं। जिस पर किसी तरह की कोई बात नहीं होती है। इसके साथ ही प्रत्येक वर्ष बढ़ने के कारण सरकार को अधिक ब्याज के रूप में ​सब्सिडी पर ज्यादा खर्च झेलना पड़ता है।

   सीएजी ने वर्ष 2016-17 के ऑडिट में चौंकाने वाले खुलासे

भारत में राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन(FRBM)अधिनियम, 2003 से लागू है। FRBM)अधिनियम का मतलब वित्तीस अनुशासन को संस्थागत करना,राजकोषीय घाटे को कम करने और आर्थिक प्रबंधन में सुधार करना है। सीएजी ने वर्ष 2016-17 के दौरान किये ऑडिट में चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। साल 2018 की 20 वीं रिपोर्ट को बीते 8 जनवरी को सीएजी ने संसद में पेश किया। कैग ने फाइनेंसिंग को लेकर रिपोर्ट में कुल 5 केस स्टडी पेश किये हैं।

केस -1 कैग ने भारतीय खाद्य निगम(एफसीआई)का उदाहरण किया है। एफसीआई न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खाद्यान्न खरीदकर उसका सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए वितरण सुनिश्चित करती है। इसके साथ ही सरकार खरीद और जनता के बीच वितरण के बीच के अंतर को सब्सिडी से मिटाने का काम होता है। कैग ने अपने रिपोर्ट में यह भी बताया कि जब उपभोक्ता मामले खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय का बजट एफसीआई द्धारा उठाई गई फूड सब्सिडी के भुगतान के लिए पर्याप्त नहीं हुआ तो बकाए को अगले वित्तीय वर्ष के लिए टाल दिया गया। सरकार ने 2014-15 में 91,995 करोड़ रुपये फूड सब्सिडी पर खर्च हुआ, सरकार ने इसमें से 58,654 रुपये का बकाया अगले साल के लिए टाल दिया. इसी तरह 2015-16 में 1,12000 करोड़ ररुपये सब्सिडी खर्च पर हुए तो 50,037 करोड़ रुपये का बकाया अगले वित्त वर्ष के लिए टाला गया. वहीं 2016-17 के लिए 78,335 करोड़ रुपये की सब्सिडी खर्च हुई, जिसका 81,303 करोड़ रुपये सरकार भर नहीं पाई तो इसे अगले साल के लटका दिया गया. कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि यह स्पष्ट है कि 2016-17 से पहले के पांच वर्षों में सब्सिडी बकाया राशि में लगभग 350 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

केस-2 कैग ने अपनीे रिपोर्ट में कहा कि रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ने जितना बजट जारी किया है वह उर्वरको पर दी गई ​सब्सि​डी के लिहाज से पर्याप्त नहीं रहा। मोदी सरकार ने बाकी बकाए को टालने के लिए ऑफ बजट फाइनेंसिंग तरकीब का इस्तेमाल किया और इसे अगले वित्तीय वर्ष के लिए टाल दिया गया। साल दर साल बकाया बढ़ता गया। वर्ष के 2016-17 में सरकार ने 70, 100 करोड़ रुपये की सब्सिडी उर्वरकों पर दी, जिस पर  39057 रुपये के बकाए को सरकार भुगतान नहीं कर पाई तो इसे अगले साल के लिए टाल दिया गया।

केस-3 सरकार ने किसानों को खुश करने के​ लिए त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम के तहत भी ऑफ बजट के तहत धनराशि खर्च हुई। इस कार्यक्रम के जरिए राज्यों की अधूरी सिंचाई परियोजनाओं को पूरा कराया जाना था. 2015-16 और 2016-17 में केंद्र सरकार ने क्रमशः 2549.01 और 999.86 करोड़ खर्च किए. नाबार्ड के फाइनेंशियल स्टेटमेंट की पड़ताल पर पता चला कि 9086 करोड़ के बॉन्ड 2016-17 में जारी हुए, ताकि दीर्घकालीन सिंचाई निधि( (LTIF) के लिए फंड जुटाया जा सके.  नाबार्ड ने 3,336.88 करोड़ रुपये का केंद्रांश नेशनल वाटर डेवलपमेंट एजेंसी (NWDA) को दीर्घकालीन सिंचाई निधि परियोजनाओं के लिए. जारी किए. इसके अलावा 2414.16 करोड़ के केद्रांश (NWDA)  को Polavaram Project के लिए और 3334.98 करोड़ रुपये स्टेट शेयर जारी किए. जबकि इससे पहले एआईबीपी योजनाओं के लिए खर्च बकायदा बजट के जरिए किया गया था. मगर मौजूदा केंद्र सरकार ने ऑफ बजट फाइनेंसिंग का इस्तेमा किया, जिससे वर्ष 2016-17 के बजट में यह दिखाई नहीं दिया।

CAG Ne Kiya Bada Khulasa Fas Gai Modi Sarkar

केस-4 कैग की जांच में खुलासा हुआ कि इंडियन रेलवे फाइनेंस कारपोरेशन(IRFC) पर 2016-17 में लॉन्ग टर्म उधारी 96,710.26 करोड़ और शॉर्ट टर्म 5769.35 करोड़ रुपये रहा। इसकी स्थापना 1986 में हुई, ताकि भारतीय रेलवे की परियोजनाओं की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। रेल मंत्रालय ने विदेशी ऋणदाताओं को लेटर ऑफ अंडरटेकिंग्स देकर कहा कि अगर (IRFC द्वारा बकाए को न चुकाने की स्थिति में रेल मंत्रालय इसकी जिम्मेदारी उठाएगा।

केस -5 पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड PFC )का वर्ष 2016-17 तक लॉन्ग टर्म लोन करीब 2,00187 करोड़ रहा तो शार्ट टर्म लोन 2401 करोड़  रुपये का रहा। पॉवर सेक्टर की वित्तीय संस्था के रूप में यह 1986 में अस्तित्व में आया। यह 1998 में नॉन बैकिंग फाइनेंस कंपनी(y (NBFC)  में रजिस्टर्ट हुआ। देश के ऊर्जा क्षेत्र की सभी परियोजनाओं की यह नोडल एजेंसी है। 31 मार्च 2017 तक भारत सरकार इसमें 66 प्रतिशत का हक रखती है। 

कैग ने इन पांच उदाहरणों के जरिए बताया कि सरकार अपनी वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ऑफ बजट वित्तीय व्यवस्था पर ज्यादा निर्भरता दिखा रही है, यह राजकोषीय संकेतकों के लिहाज से अच्छा नहीं है। बेहतर है कि सरकार ऑफ बजट फाइनेंसिंग को लेकर एक फुलप्रूफ पॉलिसी फ्रेमवर्क बनाए। ऑफ बजट फाइनेंसिंग के तहत सभी बकायों का लेखा-जोखा संसद में भी पेश किया जाए, जिससे ऐसे खर्चों पर संसद का नियंत्रण स्थापित हो सके। 

  क्या होता है ऑफ बजट फाइनेंसिंग ?

ऑफ बजट फाइनेंसिंग यह वह खर्च होता है, जिसका लेखा-जोखा बजट में नहीं किया जाता है। व्यावहारिक रूप में कहें तो बजट से बाहर की उधारी और खर्च ऑफ बजट फाइनेंसिंग है। सीएजी का मानना है कि चूंकि इस तरह की उधारी और खर्चों का असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है, इस नाते इसका जिक्र बजट में होना चाहिए। नहीं तो बजट से बाहर का मामला होने के कारण देश की संसद का ऐसी उधारियों और खर्च पर नियंत्रण नहीं होता। क्योंकि इसका हिसाब-किताब संसद में पेश नहीं होता। जानकार बताते हैं कि सरकार राजकोषीय घाटे बढ़ने पर आलोचनाओं से बचने के लिए ऑफ बजट फाइनेसिंग का दांव चलती है। जिससे खर्च और उधारियां बजट के दस्तावेज पर दिखती तो नहीं हैं, मगर उसकी कीमत अर्थव्यवस्था को चुकानी पड़ती है. बजट में जिक्र न होने से राजकोषीय घाटे के आंकड़ों पर इसका असर नहीं पड़ता. ऐसा नहीं है कि ऑफ बजट फाइनेसिंग नियम विरुद्ध है . दुनिया भर की सरकारें इसका इस्तेमाल करती है. राजकोषीय संकेतकों की गणना के समय खर्च, कर्ज, उधारी और ब्याज की गणना नहीं होती, जिससे यह चीजें छुप जाती हैं।

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