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मद्रास हाईकोर्ट ने जनरल कोटा पर केन्द्र को जारी किया नोटिस


DEEP KRISHAN SHUKLA 22/01/2019 08:44:13
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New Delhi. केन्द्र सरकार के सामान्य गरीबों को 10 फीसदी आरक्षण के कानून पर मद्रास हाई कोर्ट ने नोटिस भेजा है। डीएमके सचिव आरएस भराती की याचिका पर जारी इस नोटिस में कोर्ट ने सरकार को अपना जवाब देने के लिए 18 फरवरी तक का समय दिया है। 

madras high court ne janral kota par kendr ko jari kiya notis
बता दें कि डीएमके के संगठन सचिव आरएस भराती ने केन्द्र सरकार के इस नए कानून संसोधन को मद्रास हाई कोट में चुनौ​ती दी थी। केन्द्र की मोदी सरकार ने बीते दिनों लोकसभा में सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए शिक्षा और नौकरियों में 10% आरक्षण वाला विधेयक रखा जिसे लोकसभा के बाद राज्य सभा में भी पारित कर दिया गया। बाद इसके राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मंजूरी के साथ इस विधेयक ने कानून का रूप ले लिया। 124वें संविधान संशोधन विधेयक पारित होने के दौरान कई विपक्षी दलों ने चुनाव से पहले बिल पर सवाल जरूर उठाए था। 

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सामान्य वर्ग के लिए आरक्षण का यह प्रावधान अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों को मिलने वाले 50 फीसदी आरक्षण को प्रभावित नहीं करेगा। केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना में 124वें सविधान संशोधन को राष्ट्रपति की स्वीकृति की पुष्टि की है। संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में सेशोधन करते हुए प्रावधान जोड़ा गया है कि नागरिकों के आर्थिक रूप से कमजोर किसी भी वर्ग की तरक्की के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति देता है।

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इस प्रावधान से निजी व सरकारी शिक्षण संस्थाओं से जुड़े दाखिले का मामला जुड़े होगें। हालांकि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर यह प्रावधान प्रभावी नहीं होगा। खास बात यह है कि प्रावधान में स्पष्ट किया गया है कि यह आरक्षण व्यवस्था पूर्व से लागू आरक्षण से इतर होगी। प्रत्येक श्रेणी में कुल सीटों की अधिकतम 10 फीसदी सीटों पर यह आरक्षण निर्भर होगा। डीएमके के संगठन सचिव आरएस भराती की याचिका पर सुनवाई करते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार को नोटिस भेजते हुए 18 फरवरी तक अपना जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए है। 

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  सुप्रीम कोर्ट में भी दी गयी है विधेयक को चुनौती
सुप्रीम कोर्ट में भी 124वें संविधान संशोधन विधेयक को चुनौती दी गई है। एक गैरसरकारी संगठन यूथ फॉर इक्वैलिटी और कौशल कांत मिश्रा ने द्वारा दायर की गयी याचिकाओं में में इस विधेयक को निरस्त करने की मांग की गयी है। उनका तर्क है कि मात्र आर्थिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। साथ ही याचिका में विधेयक से संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन करने वाला बताया गया है। इसके अलावा 50 फीसदी आरक्षण की सीमा लांघ का भी हवाला दिया गया है। 

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