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एससी/एसटी के वर्गों के लिए जज बनने के मापदंड में बदलाव जरुरी : सुप्रीम कोर्ट


RAGHVENDRA CHAURASIA 23/01/2019 19:03 PM
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New Delhi. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने निचली अदालतों में आरक्षित वर्ग से एक भी जज के चयन न होने पर चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति-जनजाति के वर्गों के लिए जज बनने के मापदंड में बदलाव किया जाएं, जिससे उनको भी मौका मिल सके। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति-अनुसूचित जाति वर्गों में बदलाव

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  तीन परीक्षार्थी ही इंटरव्यू तक पहुंच पाए थे

केरल हाईकोर्ट ने सुप्रीमकोर्ट को बताया कि प्रारंभिक परीक्षा में पास होने के लिए न्यूनतम 35 फीसदी अंक और मुख्य परीक्षा में पास होने के लिए 40 फीसदी अंक निर्धारित किए गए थे। सिर्फ तीन परीक्षार्थी इंटरव्यू तक पहुंच पाए। हाईकोर्ट ने कहा कि इन तीनों में से एक भी परीक्षार्थी न्यायिक अधिकारी के पद के योग्य नहीं पाया गया।

  45 पदों के लिए 2700 परीक्षार्थियों ने दी थी परीक्षा

केरल में न्यायिक अधिकारी के लिए 45 पदों के लिए 2700 से ज्यादा परीक्षार्थियों ने परीक्षा दी थी। इसमें से सवर्ण समुदाय के मात्र 31 उम्मीदवार चयन हो पाए थे। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश गोगोई और जस्टिस एलएन राव और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में हाईकोर्ट को पास होने के लिए न्यूनतम अंकों को कम कर देना चाहिए। शायद 35 फीसदी से 30 फीसदी, परिस्थिति के अनुसार। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह आश्चर्यजनक है कि केरल जैसे राज्य में न्यायिक अधिकारी के पद के लिए 45 उम्मीदवार नहीं मिल सके। 

 आरक्षित वर्ग के लिए न्यूनतम अंक कम करने चाहिए

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा कि न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व देने के लिए हाईकोर्ट आरक्षित वर्गों के लिए पास करने के न्यूनतम अंक को कम कर सकता है। नहीं तो आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार कभी परीक्षा पास ही नहीं कर पाएंगे और उनके लिए सुरक्षित रखे गए पद हमेशा खाली रह जाएंगे। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अन्य सेवाओं में भर्ती के लिए आरक्षित वर्गों के लिए न्यूनतम अंकों को कम किया जाता है और उचित कदम उठाने के लिए हाईकोर्ट उचित कदम उठाने के लिए इस पहलू की जांच कर सकता है। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति-अनुसूचित जाति वर्गों में बदलाव

आपको बता दें कि पिछले साल हाईकोर्ट से कानून मंत्रालय को मिले आंकड़ों से पता चलता है कि अधीनस्थ न्यायपालिका में अनुसूचित जातियों से 14 फीसदी से कम जज और अनुसूचित जनजाति से करीब 12 फीसदी जज हैं। 

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