राजनीति के दिल की धड़कने हुई तेज


DEEP KRISHAN SHUKLA 13/03/2019 09:08:27
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Lucknow. दिल्ली को भले ही देश का दिल कहा जाता हो लेकिन देश की राजनीति का दिल उत्तर प्रदेश ही है। आगामी आम चुनाव के चलते इस दिल की धड़कने तेज हो गयी हैं। पिछले चुनाव को देखते हुए विपक्ष की बदली तस्वीर इस तेज धड़कन की खास वजह है। भाजपा को छोड़ प्रदेश में सक्रिय अन्य पार्टियों के हालात अलग अलग है। सपा बसपा जहां एक साथ नजर आ रही हैं तो वहीं दूसरी ओर शिवपाल सिंह अपनी प्रसपा के साथ चुनाव मैदान में हैं। कांग्रेस की प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश की कमान अपने हाथों में थाम रखी है। 

rajneeti ke dil ki dhadkne hui tez
सर्वाधिक 80 सीटों वाला उत्तर प्रदेश देश की राजनीति में अपनी अलग ही अहमियत रखता है। इस बार के चुनाव में यहां जो हालात है वह बेहद ही दिलचस्प है जिससे पूरे देश की निगाहे सूबे पर टिकी है। मालूम हो कि मोदी के सशक्त नेतृत्व वाली केन्द्र की सत्ता पर काबिज भाजपा को इस बार सूबे में योगी का मजबूत साथ भी है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही दलों के सवोच्च नेता उत्तर प्रदेश से ही चुनाव लड़कर देश की सत्ता कब्जाने के लिए रस्साकसी करेंगें।

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यूपी की बढ़ी धड़कनों के बीच किसी भी दल के लिए लोकसभा 2019 की डगर आसान नहीं नजर आ रही है। ऊंट किस करवट बैठता है तो भविष्य के गर्त में है लेकिन राजनीति के रंगों के पारखी भी इस बार यूपी की सियासत की तस्वीर को स्पष्ट नहीं पढ़ पा रहे हैं। फिलहाल सभी दल एक बार फिर अपने अपने अस्त्र शस्त्रों के साथ लोकसभा 2019 के चुनावी रण में उतरने को तैयार हैं। देश की राजनीति में अपनी अहमियत बताने के लिए उत्तर प्रदेश के मतदाता भी तैयार हैं।

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  प्रदर्शन बरकरार रखने की चुनौती
बीते लोकसभा चुनावों में भगवामय हुए यूपी में मोदी का ऐसा जादू चला था कि कुल 80 सीटों में 71 पर अकेले कब्जा जमाया था जबकि दो सीटे उसके सहयोगियों को मिली थी। अपने पिछले प्रदर्शन को बरकरार रखना भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। यूपी के सीएम योगी भले ही सभी सीटों पर भाजपा की जीत के दावें कर रहे हों लेकिन उप चुनाव उनकी खुद की गोखरपुर सीट नहीं बच पाई। फूलपुर सीट के उपचुनाव में भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। 

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  भाजपा की चुनौती ओबीसी वोट साधना
चुनाव प्रबंधन में अव्वल भाजपा बूथ स्तर पर सम्मेलन तो कर चुकी है लेकिन उसके लिए सबसे बड़ी चुनौत ओबीसी वोटों को बचाना है। बता दें कि 2014 के चुनाव में इसी वर्ग के वोटों के समीकरण ने भाजपा को बम्पर जीत दिलाई थी। इस बार हालात थोड़े बदले बदले नजर आ रहे है। भाजपा के सहयोगियों से इस बार संबंध पहले सरीखें नहीं हैं। इसके अलावा ओबीसी और दलित वोट बैंक वाले सपा और बसपा भी एक ही साथ हैं। 

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  गठबंधन की तिकड़ी को तालमेल के डोज की जरूरत
प्रदेश में भाजपा की घेराबंदी करने के लिए बनने गठबंधन के सामने आपसी तालमेल को बनाए रखना सबसे आवश्यक है। नेताओं के गठबंधन में वोटरों का कितना गठबंधन होता यह बड़ा सवाल होगा क्योंकि सपा बसपा के बीच लंबे समय तक खिंची रही दीवार में दोनों दलों के वोटरों को इतना दूर कर दिया है कि दलीय आस्था का चुबंक उन्हें खींच पाने में असहज नजर आ रहा है। शिवपाल सिंह की प्रसपा दिग्गज सपाईयों को अपनी ओर खींचने की प्रक्रिया भी तेज कर रही है। वहीं कांग्रेस ब्रांड चेहरे प्रियंका के साथ अलग ही ऊर्जा के साथ पूरे प्रदेश में झण्डा ऊंचा कर रही है। 

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  सिर्फ प्रियंका से नहीं चलेगा काम, दिखानी होगी आक्रामकता
सपा बसपा के तिरस्कार के बाद यूपी में कांग्रेस ने तुरूप का एक्का चलते हुए प्रियंका को यूपी की कमान सौंप दी है। कांग्रेसियों में ऊर्जा का संचार करने के नजरिए से तो यह ठीक है लेकिन प्रबंधन की बात करें तो कांग्रेस भाजपा से काफी पीछे है। यूपी में चुनौतियों को देखते हुए कांग्रेस की जो सक्रियता सूबे में दिखनी चाहिए थी वह अभी दिख नहीं रही है। सपा बसपा गठबंधन को मदद देने की जरूरत के अहसास के बावजूद बिना पूरी आक्रामकता के कांग्रेस की राह मुश्किल है। ऐसे में यह देखने वाला होगा कि मिशन यूपी फतह के लिए कांग्रेस क्या रणनीति अपनाने वाली है। 

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