भारतीय नववर्ष का प्रतीक है बैसाखी


Rajvinder kaur 14/04/2019 13:36:13
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Lucknow. प्रकृति का एक नियम है कि जब भी किसी जुल्म, अन्याय, अत्याचार की बात होती है, तो उसे हल करने अथवा उसके उपाय के लिए कोई भी कारण बन जाता है। इसी नियमाधीन जब मुगल शासक औरंगजेब द्वारा जुल्म, अन्याय व अत्याचार की हर सीमा लाँघकर, श्री गुरु तेग बहादुरजी को दिल्ली में चाँदनी चौक पर शहीद कर दिया गया, तभी गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने अनुयायियों को संगठित कर खालसा पंथ की स्थापना की जिसका लक्ष्य था धर्म व नेकी के आदर्श को अपनाना। 

Indian New Year
पुराने रीति-रिवाजों से पीड़ा, कमजोर व साहसहीन हो चुके लोग सदियों की राजनीतिक व मानसिक गुलामी के कारण कायर हो चुके थे। निम्न जाति के समझे जाने वाले लोगों को जिन्हें समाज तुच्छ समझता था, उन्हें दशमेश पिता ने अमृत छकाकर सिंह बना दिया। इस तरह 13 अप्रैल,1699 को श्री केसगढ़ साहिब आनंदपुर में दसवें गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना कर अत्याचार को समाप्त किया।

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उन्होंने सभी जातियों के लोगों को एक ही अमृत पात्र (बांटे) से अमृत छका पाँच प्यारे सजाए। ये पाँच प्यारे किसी एक जाति या स्थान के नहीं थे, अलग-अलग जाति, कुल व स्थानों के थे, जिन्हें खंडे बांटे का अमृत छकाकर इनके नाम के साथ सिंह शब्द लगा।

अज्ञानी ही घमंडी नहीं होते, 'ज्ञानी' को भी अक्सर घमंड हो जाता है। जो व्यवसाय करते हैं उन्हें ही घमंड हो ऐसा नहीं है, गैर एलियंस को भी कभी-कभी अपने 'त्याग' का घमंड हो जाता है।अहंकारी अत्यंत सूक्ष्म अहंकार के शिकार हो जाते हैं।

ज्ञानी, ध्यानी, गुरु, त्यागी या संन्यासी होने का अहंकार कहीं ज्यादा बलवान हो जाता है। यह बात गुरु गोविंद सिंह जी जानते थे। इसलिए उन्होंने न केवल अपने गुरुत्व को त्याग गुरु गद्दी गुरुग्रंथ साहिब को सौंपी बल्कि, व्यक्ति पूजा ही छोड़ दी।

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वैसाखी ,गुरू अमर दास द्वारा चुने गए तीन हिंदू त्योहारों में से एक है, जिन्हें सिख समुदाय अन्य महा शिवरात्रि और दीवाली द्वारा मनाया जाता है। प्रत्येक सिख वैसाखी त्योहार, सिख आदेश के जन्म का अनुस्मारक है, जो नौवे गुरु तेग बहादुर के बाद शुरू हुआ और जब उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता के लिए खड़े होकर इस्लाम में धर्मपरिवर्तन के लिए इनकार कर दिया था।

तब बाद में मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश के तहत उनका शिरच्छेद कर दिया गया। गुरु की शहीदी ने सिख धर्म के दसवें और अंतिम गुरु के राज तिलक और खालसा के संत-सिपाही समूह का गठन किया, दोनों वैसाखी के दिन पर शुरू हुए थे।

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वैसाखी परंपरागत रूप से सिख नव वर्ष रहा है। खालसा साथी के अनुसार, खालसा कैलेंडर का निर्माण खालसा -1 वैसाख 1756 विक्रमी (30 मार्च 1699) के दिन से शुरू होता है। यह पूरे पंजाब क्षेत्र में मनाया जाता है। 

खालसा पंथ की स्थापना गुरु गोबिन्द सिंह जी ने 13 अप्रैल 1699 को बैसाखी वाले दिन आनंदपुर साहिब में की। इस दिन उन्होंने सर्वप्रथम पाँच प्यारों को अमृतपान करवा कर खालसा बनाया और उन पाँच प्यारों के हाथों से स्वयं भी अमृतपान किया।

बैसाखी नाम वैशाख से बना है। पंजाब और हरियाणा के किसान सर्दियों की फसल काट लेने के बाद नए साल की खुशियाँ मनाते हैं। इसीलिए बैसाखी पंजाब और आसपास के प्रदेशों का सबसे बड़ा त्यौहार है। यह रबी की फ़सल के पकने की खुशी का प्रतीक है। सिख इस त्यौहार को सामूहिक जन्मदिवस के रूप में मनाते हैं।

बैसाखी पारम्परिक रूप से हर साल 13 या 14 अप्रैल को मनाया जाता है। यह त्यौहार सिख और हिन्दुओं दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। यह अन्य नव वर्ष के त्यौहारों के साथ मेल खाता है, जो भारतीय अन्य क्षेत्रों में, जैसे पोहेला बोशाख, बोहाग बिहू, विशु, पुथंडु और अन्य क्षेत्रों में वैशाख के पहले दिन मनाए जाते हैं। 

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इस दिन के अधिनियम
1.इस दिन पंजाब का परंपरागत नृत्य भांगड़ा और गिद्दा किया जाता है।
2.शाम को आग के आसपास इकट्ठे होकर लोग नई फसल की खुशियाँ मनाते हैं।
3.पूरे देश में श्रद्धालु गुरुद्वारों में अरदास के लिए इकट्ठे होते हैं। मुख्य समारोह आनंदपुर साहिब में होता है, जहाँ पंथ की नींव रखी गई थी।
4.सुबह 4 बजे गुरु ग्रंथ साहिब को समारोहपूर्वक कक्ष से बाहर लाया जाता है।
5.दूध और जल से प्रतीकात्मक स्नान करवाने के बाद गुरु ग्रंथ साहिब को तख्त पर बैठाया जाता है। इसके बाद पंच प्यारे 'पंचबानी' गाते हैं।
6.दिन में अरदास के बाद गुरु को कड़ा प्रसाद का भोग लगाया जाता है।
7.प्रसाद लेने के बाद सब लोग 'गुरु के लंगर' में शामिल होते हैं।
8.श्रद्धालु इस दिन कारसेवा करते हैं।
9.दिनभर गुरु गोविंदसिंह और पंच प्यारों के सम्मान में शब्द और कीर्तन किए जाते हैं। 

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नगर कीर्तन
सिख समुदाय नगर कीर्तन (शाब्दिक रूप से "शहर भजन गायन") नामक जुलूस का आयोजन करते हैं। पांच खालसा इसका नेतृत्व करते हैं, जो पंज-प्यारे के पहनावे में होते है और सड़कों पर जुलूस निकालते है।

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हिंदू धर्म
हिंदुओं के लिए यह त्योहार नववर्ष की शुरुआत है। हिंदू इसे स्नान, भोग लगाकर और पूजा करके मनाते हैं। ऐसा माना जाता है कि हजारों साल पहले देवी गंगा इसी दिन धरती पर उतरी थीं। उन्हीं के सम्मान में हिंदू धर्मावलंबी पारंपरिक पवित्र स्नान के लिए गंगा किनारे एकत्र होते हैं।

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Web Title: Indian New Year's symbol is Baisakhi ( Hindi News From Newstimes)


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