अगस्त क्रांति: दमन के आगे नहीं झुके आंदोलनकारी, ब्रिटिश हुकूमत की हिला दी थीं चूलें


RAJNISH KUMAR 09/08/2019 12:31:30
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रजनीश वर्मा

सन् 1857 में उठी स्वतंत्रता की ज्वाला द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान चरम पर थी। ब्रिटिश सरकार ने भारत की जनता को द्वितीय विश्वयुद्घ में झोंक दिया था। जनता की मर्जी के खिलाफ ब्रिटेन के इस कदम के खिलाफ भारतीयों में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ भारी असंतोष था। वहीं, ब्रिटेन को युद्ध में उलझा देख नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपनी आजाद हिंद फौज को 'दिल्ली चलो का आदेश दे दिया था। उधर, महात्मा गांधी ने भी स्वधीनता के लिए जनांदोलन का फैसला कर लिया था। कांग्रेस में इस पर मतभेद होने पर महात्मा गांधी ने चुनौती दे डाली कि - 'मैं देश की बालू से ही कांग्रेस से भी बड़ा आंदोलन खड़ा कर दूंगा। इसके बाद 8 अगस्त को कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में 'भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पास हुआ। महात्मा गांधी को इसके खिलाफ दमनात्मक कार्रवाई की आशंका थी, इसलिए उन्होंने अपने भाषण में 'करो या मरो का आह्वान किया और जनता पर खुद निर्णय करने और अपना नेतृत्व करने की जिम्मेदारी सौंप दी। तय कार्यक्रम के अनुसार, 9 अगस्त को अगस्त क्रांति का ऐलान किया गया, लेकिन इससे पहले ही ब्रिटिश हुकूमत ने कांग्रेस के सारे प्रमुख नेताओं को जेलों ठूंसना शुरू कर दिया। महात्मा गांधी को 9 अगस्त को तड़के गिरफ्तार कर आगा खां महल स्थित कैदखाने में बंद कर दिया गया। इसके बावजूद आंदोलन और उग्र हो गया और देशभर में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जनाक्रोश उमड़ पड़ा। 

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इसके साथ ही रेलवे स्टेशनों, दूरभाष कार्यालयों, सरकारी भवनों और अन्य स्थानों तथा उपनिवेश राज के संस्थानों पर आन्दोलनकारी टूट पड़े। इसमें तोडफ़ोड़ की ढेर सारी घटनाएं हुईं और सरकार ने इसके लिए गांधीजी को उत्तरदायी ठहराया और कहा कि यह कांग्रेस की तरफ से जानबूझकर किया गया कृत्य है। इस आधार पर सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और कांग्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। आंदोलन को दबाने के लिए जगह-जगह सेना लगा दी गई।

देशभर में हालात बिगड़ गए। अवध क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा। यहां के लोग सड़कों पर उतर आए। हर चौक और चौराहे पर प्रदर्शन होने लगे। सरकारी ठिकानों पर तिरंगा फहराया जाने लगा। जैसे-जैसे यहां आंदोलन बढ़ता गया, ब्रिटिश फौजों का दमन भी बढ़ा, लेकिन आंदोलनकारी डटे रहे। लखनऊ में कई हिंसक वारदातें हुईं। 'भारत छोड़ो आंदोलन की 7६वीं वर्षगांठ, स्वतंत्रता संग्राम में अवध की भूमिका को याद किए बिना पूरी नहीं हो सकती।

खूब जुल्म सहे अवध के आंदोलनकारियों ने

1857 में अवध में जली स्वतंत्रता संग्राम की लौ 'भारत छोड़ो आंदोलनÓ के समय अपने चरम पर थी। महात्मा गांधी के 'अंग्रेजों भारत छोड़ोÓ के ऐलान के बाद अवध के युवा, बुजुर्ग, बच्चे और महिलाएं सभी ने अपनी जान दांव पर लगाकर आंदोलन मेंं कूद पड़े। बड़े कांग्रेसी नेताओं की गिरफ्तारी के बाद नेतृत्व का संकट खड़ा होने पर अवध के लोगों ने खुद मोर्चा संभाला और आंदोलन को धार दी। उस समय अवध वालों के मन गजब का उत्साह था। जगह-जगह आंदोलन होने लगे। आंदोलनकारियों पर ब्रिटिश फौजों ने खूब जुल्म ढाए। हजारों लोगों को गिरफ्तार कर जेलों में ठूस दिया गया।

जेल के अन्दर के हालात बहुत बदतर थे। जेल के अन्दर बोरियां बिछी रहती थीं, लेकिन जब किसी आंदोलनकारी के पहुंचने पर हटा दी जाती थीं। अंग्रेज सिपाही आंदोलनकारियों के पैरों पर बेत से बेतहाशा पीटते थे, लेकिन हिन्दुस्तानी सिपाही कुछ सहानुभूति रखते थे। वे आंदोलनकारियों के लिए छुपाकर कर खाना लाते थे। पानी तक जेल में नहीं मिलता था। भारतीय सिपाही पानी की बोतलें अपनी वर्दी में छुपाकर लाते थे। अंग्रेज पुलिसकर्मी जेल में कैदियों के दुश्मन थे। यही नहीं, जेल में स्वातंत्रता सेनानियों को अंग्रेज डॉक्टर सादी वर्दी में आकर बेहोशी के इंजेक्शन लगा देते थे ताकि वे जेल तोड़ कर भाग न सकें।

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लखनऊ में सेनानियों ने अंग्रेजों के दांत खट्टे किए

इतिहास के पन्ने पलटने पर पाते हैं कि संयुक्त प्रान्त में 'भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 9 अगस्त, 1942 को लखनऊ में भोर होते-होते पुलिस ने नगर जिला और प्रान्तीय कांग्रेस कार्यालयों की तलाशी ली, पूरा रिकार्ड जब्त कर किया और कार्यालयों में ताले डालकर पहरा बिठा दिया। अमीनाबाद में घंटाघर और झण्डे वाले पार्क के चारों तरफ पुलिस का पहरा लगा दिया गया। इनमें कोई प्रवेश नहीं कर सकता था। नगर में हड़ताल थी।  अमीनाबाद की सड़कों पर लोग 'अंग्रेजों भारत छोड़ोÓ का नारा लगाकर कांग्रेस के नेताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। जिला मजिस्ट्रेट मिस्टर ल्यूइस लॉइड द्वारा लगाई गई दफा 144 को जनता ने एक झटके में ही तोड़ फेंका। इसके बाद नगर के प्रमुख कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और छात्रों ने झंडेवाले पार्क में कूदकर प्रवेश किया और सभा आयोजित की। इसका नेतृत्व उमानारायण वाजपेयी और छात्र-प्रतिनिधि जगदीश नारायण त्रिवेदी ने किया।

इस सभा में गांधीजी के विचारों को आजादी के जय घोष के बीच दोहराया। तभी वहां मौजूद डिप्टी एसपी ओंकार सिंह के आदेश पर पुलिस ने वाजपेयी और त्रिवेदी को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद विरोध की ज्वाला और भड़क उठी। छात्र-छात्राएं, महिलाएं-पुरुष सभी सड़कों पर उतर आए।  स्थिति को संभालना पुलिस बल के लिए मुश्किल हो गया। इस दौरान पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच खूब झड़पें हुईं। उसमें डिप्टी एसपी ओंकार सिंह के माथे पर एक पत्थर लगा और वह लहूलुहान हो गए। इसके पुलिस पुलिस ने डंडे बरसाने शुरू कर दिए। इसके बाद लखनऊ में क्रांति की ज्वाला धधक उठी और 'करो या मरोÓ के नारे लगने लगे। 

10 अगस्त, 1942 को लोगों ने आलमबाग रेलवे स्टेशन फूंक दिया। सिटी स्टेशन पर हमला बोल दिया। खिड़कियां और दरवाजों में आग लगा दी। रेलवे टिकट फाड़ कर फेंक दिए। सूरज ने गणेशगंज पोस्ट आफिस को आग के हवाले कर दिया। हीवेट रोड तथा कार्लटन होटल के डाकघरों में आग लगा दी। छात्रों ने महारानी विक्टोरिया का मरमरी स्टैच्यु तोड़ डाला।

इसके बाद 11 अगस्त को लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र जुलूस लेकर शहर की ओर बढ़े। मंकी ब्रिज पर पहुंचे ही थे कि पुलिस ने उन पर गोलियां बरसाईं। इसमें कई छात्र घायल हुए और कई छात्रों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। कान्य कुब्ज कॉलेज के देवी प्रसाद वर्मा सहित कई लोगों को डिफेंस आफ इण्डिया रूल्स की धारा 129 के तहत गिरफ्तार कर लिया। क्रांति की आग लखनऊ जिले की सभी तहसीलों में फैलते देर न लगी। इधर, तोडफ़ोड़ की घटनाएं भी खूब हुईं। उधर, पुलिस ने कठोरता से दमन करना शुरू कर दिया।

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अवध की युवतियां भी नहीं रहीं पीछे

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अवध की लड़कियां भी पीछे नहीं रहीं। अमीनाबाद गल्र्स कॉलेज की करीब एक हजार लड़कियां आजादी की इस जंग में कूद पड़ीं। अंग्रेज सरकार के पांव तले जमीन खिसक गयी। अंग्रेजों ने सभी लड़कियों को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन जल्द ही उनको रिहा करना पड़ा क्योंकि अंग्रेजों के पास इतनी बड़ी संख्या में लड़कियों को जेल में रखने के इंतजाम नहीं थे। इतिहासकार योगेश प्रवीण का कहना है कि महात्मा गांधी ने लखनऊ में भारत छोड़ो आंदोलन की अलख जगाने के लिए मोहनलाल सक्सेना को जिम्मेदारी सौंपी थी।

इस मौके पर अमीनाबाद गल्र्स कॉलेज की लड़कियों ने अमीनुद्दौला पार्क में झंडा फहराया था। इससे अंग्रेज बौखला गए थे और उन्होंने लड़कियों पर लाठीचार्ज कर दिया था। उस समय यहां के लोगों में मोहन के मुख से निकला 'स्वतंत्र भारत, स्वतंत्र भारत का गीत काफी लोकप्रिय था। इसके साथ ही धीरे-धीरे पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी आंदोलन ने प्रचंड रूप धारण कर लिया। इसने ब्रिटिश सरकार की चूलें हिलाकर रख दी।

60 हजार आंदोलनकारी जेल में ठूंस दिए गए

इतिहासकार विपिनचंद्र ने अपनी पुस्तक 'भारत का स्वतंत्रता संघर्ष में लिखा है कि विश्व युद्ध की आड़ में सरकार ने अपने को सख्त से सख्त कानूनों से लैस कर लिया था और शांतिपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों को भी प्रतिबंधित कर दिया था। पुस्तक के अनुसार आंदोलन की बागडोर अच्युत पटवर्धन, अरुणा आसफ अली, राममनोहर लोहिया, सुचेता कृपलानी, बीजू पटनायक, छोटूभाई पुराणिक, आरपी गोयनका और बाद में जेल से भागकर आए जयप्रकाश नारायण जैसे प्रमुख नेताओं ने संभाले रखी।

इस आंदोलन के समय एक सप्ताह के भीतर 250 रेलवे स्टेशन और 500 डाकघरों और 150 थानों पर हमले हुए और उन्हें क्षति पहुंचाई गई। जगह-जगह टेलीफोन के तार काट दिए गए और सरकारी दफ्तरों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया। 1942 के अंत तक 60,000 से ज्यादा लोंगों को बंद कर दिया गया, जिनमें 16,000 लोगों को सजा दी गई। 

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आखिरकार भारत को करना पड़ा आजाद

इसके बाद आंदोलनकारियों ने अहिंसा का मार्ग छोड़ दिया और हिंसा पर उतर आए। उन्होंने जबरदस्त तोड़-फोड़ मचाकर अंग्रेजी सरकार की चूलें हिला दीं। महात्मा गांधी की रिहाई के लिए पूरी दुनिया में मांग होने लगी। मगर, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल एक फकीर के आगे झुकने को तैयार नहीं थे। हालांकि ब्रिटिश हुकूमत ने आखिरकार 6 मई, 1944 को महात्मा गांधी को रिहा कर दिया। इसके बाद अन्य प्रमुख नेताओं की रिहाई हुई।

अंग्रेजों ने भारत छोड़ो आंदोलन को क्रूरता के साथ दबा दिया, लेकिन इस आंदोलन से एक बात तय हो गई कि भारतीयों को अब पूर्ण आजादी के सिवा कुछ और मंजूर नहीं था और आखिरकार अंग्रेजों को महायुद्ध में विजय हासिल करने के बावजूद भारत को आजाद करना पड़ा। भारत छोड़ो आंदोलन को हम भारतीय स्वाधीनता के लिए द्वितीय मुक्ति संग्राम कह सकते हैं। इसके फलस्वरूप 5 वर्ष बाद 1947 में हमें आजादी मिली।

 

 

 

Web Title: August kranti bharat chhodo aandolan ( Hindi News From Newstimes)


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