इच्छानुसार खेल नहीं सीख सकते ग्रामीण स्कूलों के छात्र


LEKHRAM MAURYA 11/08/2019 11:55:13
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LUCKNOW. सरकार ने खेलों को बढ़ावा देने के लिए पहली बार प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों के लिए बजट जारी किया है, जिससे विद्यालयों ने खेल का सामान भी खरीद लिया है लेकिन इन बच्चों को खेलों की नियमित जानकारी देने के लिए सरकार ने कोई व्यवस्था नहीं की है। इसके साथ ही बेसिक शिक्षा विभाग में अलग से खेल अध्यापकों की नियुक्ति नहीं होती। इस वजह से स्कूलों में नियुक्त शिक्षक ही इनको खेल सिखाते हैं। इनमें से कई अध्यापक ऐसे भी होते हैं, जिनको खेलों के विषय में नियम और कायदे नहीं पता होते हैं।
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इसलिए वे केवल बच्चों का मनोरंजन ही करवाते हैं। इसके अलावा जिन स्कूलों में खेल के मैदान नहीं हैं वहां के बच्चे चाहकर भी हर खेल नहीं सीख सकते। इसलिए उन्हे स्कूल में मैदान होने या न होने के हिसाब से खेल का सामान खरीदकर दिया जाता है। जिससे ग्रामीण क्षेत्र के काफी बच्चे खेलों से वंचित रह जाते हैं। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्र में निजी स्तर पर भी खेलों के लिए स्टेडियम नहीं हैं, इस कारण उन छात्रों के अभिभावक अपने बच्चों को विद्यालय के अलावा खाली समय में खेलों की प्रेक्टिस करने के लिए कहीं किसी स्टेडियम में नहीं भेज सकते। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में किसी एक विभाग के पास खेल की व्यवस्था नहीं है। इसलिए भी ग्रामीण क्षेत्र की प्रतिभाओं को खेलों में भाग लेने का मौका कम मिलता है।

इनमें गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवार अधिक होते हैं। क्योंकि जिनकी माली हालत ठीक है या नौकरी पेशा हैं वह लोग इसीलिए अपने बच्चों को शहर के स्कूलों में पढ़।ते हैं जहां सभी प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध हैं। 100 से अधिक छात्र संख्या वाले उच्च प्राथमिक विद्यालयों में कुछ साल पहले अनुदेशकों की नियुक्ति कर दी गयी थी। जिसमें काफी संख्या में ऐसे थे जिनके पास खेल से सम्बंधित ​डिग्री या​ डिप्लोमा था।

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राजधानी में ऐसे अनुदेशकों की संख्या 70 के आस पास बताई जा रही है। बच्चों को खेल सिखाने के लिए अलग से शिक्षकों की कोई व्यवस्था नहीं है। जो अध्यापक स्कूलों में तैनात हैं वही अध्यापक बच्चों को कहीं न कहीं से जानकारी हासिल कर खेल सिखाते हैं। वित्तीय वर्ष 2019;2020 में प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय के लिए 5 हजार और उच्च प्राथमिक विद्यालय के लिए 10 हजार रू0 खेल सामग्री के लिए दिए गये थे। जिससे अध्यापकों ने विद्यालय में खेल के मैदान के हिसाब से सामग्री खरीद ली है।

जिन विद्यालयों के पास खेल का मैदान नहीं है उन्होने कैरम, लूडो आदि खरीद कर बच्चों को दिए हैं। जबकि जिनके पास मैदान है उन्होने क्रिकेट, वालीबाल, फुट बाल आदि सामान खरीदा है। इसके अलावा इस तरह का सामान उच्च प्राथमिक विद्यालयों में ही खरीदा गया है क्योंकि वही छात्र यह खेल आसानी से खेल सकते हैं।

इन स्कूलों में कबड्डी, खो-खो,ऊॅची कूद, लम्बी कूद, दौड़ 50,100,200,400 मीटर,रिले रेस, वालीबाल,तैराकी, क्रिकेट,लूडो, कैरम का खेल होता है। लेकिन यहां तैराकी के लिए स्वीमिंग पूल या क्रिकेट के मैदान न होने के कारण इन्हें सभी जगह के बच्चे आसानी से नहीं सीख या खेल सकते हैं। जिन गावों में खेल के मैदान मौजूद हैं या आसपास के किसी गांव में मैदान उपलब्ध होने पर बच्चे वहां जाकर खेलते हैं।

खण्ड शिखा अधिकारी मलिहाबाद संतोष कुमार मिश्रा कहते हैं कि जब से खेल का सामान स्कूलों में खरीदा गया है और बच्चों को खेलने के लिए मिलने लगा है तब से सरकारी विद्यालयों में बच्चों का स्कूल आने में मन लगने लगा है। बच्चों को एमडीएम भले देर से मिले लेकिन खेल का सामान मिल जाए तो बच्चे बहुत खुश रहते हैं। इससे स्कूलों में छात्र संख्या बढ़ाने में भी मदद मिल रही है।

विभागीय अ​धिकारियों के अनुसार स्कूलों में खेल सिखाने के बाद न्याय पंचायत स्तरीय खेलों का आयोजन अक्टूबर माह में शुरू होकर दिसम्बर तक चलता है। न्याय पंचायतों में विजयी खिलाड़ियों को ब्लाक स्तरीय खेलों में भाग ​लेने का मौका दिया जाता है। इसके बाद जिला स्तरीय खेलों का आयोजन किया जाता है। यहां से विजयी प्रतिभागियों को मंडल और उसके बाद प्रदेश स्तरीय खेलों में भाग लेने का मौका दिया जाता है। 

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अध्यापिका शिखा सिंह कहती हैं कि उच्च प्राथमिक विद्यालयों में खेल के अनुदेशक हैं लेकिन जो अनुदेशक या अध्यापक किसी स्कूल में तैनात भी हैं वे किसी अन्य स्कूल में कभी नहीं जाते हैं। खेलों का आयोजन होने से पहले इनमें से कोई न कोई अनुदेशक  या अध्यापक एक बार आकर विद्यालयों में बच्चों को बता देते हैं। उसके बाद बच्चों को स्वयं या अन्य अध्यापकों  की मदद से ही तैयारी करनी पड़ती है। उन्होने कहा कि एक ओर अध्यापकों की संख्या मानक के अनुरूप नहीं है।

दूसरी ओर अध्यापकों पर कितनी जिम्मेदारी है। उनके द्वारा पुस्तकालय की किताबें पढ़वानी हैं। खेल भी खिलाना है। समय से पाठ्क्रम भी पूरा करना है। बच्चों की संख्या बढ़ाना है। बच्चों की पढ़ाई गुणवत्तापरक होनी चाहिए। इतने कामों के बावजूद अन्य सरकारी कार्य भी यदा कदा करने पड़ते हैं। 

Web Title: Students of rural schools cannot learn sports at will ( Hindi News From Newstimes)


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