इन तीन राज्यों में वोटकटवा की भूमिका निभाएगी बसपा,बनाया ये खास प्लान, विरोधियों में मची खलबली


NAZO ALI SHEIKH 16/09/2019 12:41:48
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Lucknow. विधानसभा चुनाव का बिगुल फूंका जा चुका है। सभी पार्टियों के लिए सियासी बिसात बिछ चुकी है, यह देखना दिलचस्प होगा कि किसे मिलेगी शह और किसे मिलेगी मात। वहीं इस उपचुनाव में बसपा सुप्रीमों ने कुछ अलग ही रणनीति बना रखी है। बसपा सुप्रीमो एक बार फिर एकला चलो रे... को फॉलो  करती नजर आने वाली हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि उन्हें किसी का भी साथ रास नहीं आ रहा है।

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यूपी में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर चुनाव में हार मिलने के बाद मायावती ने गठबंधन खत्म कर लिया। अब उन्होंने यूपी में भी अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। बसपा की ओर से उपचुनाव में लड़ने वाले उम्मीदवारों की  लिस्ट भी जारी कर दी गई है। 

ऐसा नहीं है कि बसपा की कांग्रेस के साथ  गठबंधन की बात नहींं चली। हाल ही में दिल्ली में इस सिलसिले में एक मीटिंग भी हुई थी, लेकिन बसपा सप्रीमो ने कांग्रेस के साथ भी गठबंधन से साफ इंकार कर दिया है। वहीं ताजा खबरों के अनुसार मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी अब महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड तीनों ही राज्यों में अकेले दम पर चुनाव लड़ने जा  रही है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि बसपा सुप्रीमो के इस फैसले से किसी राजनीतिक पार्टी को अधिक फायदा हो सकता है। निश्चित तौर पर बीएसपी को या प्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस को या परोक्ष रूप से बीजेपी को? 

  घटता जनाधार

बसपा सुप्रीमो की सबसे बड़ी चिंता घटता जनाधार है। वहीं सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि बीएसपी के अपने गढ़ रह चुके उत्तर प्रदेश में ही हालत खराब हो चुकी है। राहत की बात यह रही की अखिलेश के साथ गठबंधन करके मायावती ने 2017 के मुकाबले 2019 में बसपा की हालत सुधार ली है।

लगातार मिल रही सिकस्त के कारण बीएसपी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खोने का डर सताने लगा है। बीएसपी के आलावा देश में फिलहाल बीजेपी, कांग्रेस TMC, CPI, CPM, NCP और नेशनल पीपल्स पार्टी ऑफ मेघालय को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला हुआ है।

किसी भी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा तब मिलता है जब उसके उम्मीदवार लोकसभा या विधानसभा चुनाव में चार या उससे अधिक राज्यों में कम से कम 6 प्रतिशत वोट हासिल किए हों। पार्टी के लिए लोकसभा में भी कम से कम चार सांसद होने जरूरी हैं। साथ ही, कुल लोकसभा सीटों की कम से कम दो प्रतिशत सीट होनी चाहिए। जाहिर है बीएसपी को भी इस बात की चिंता सता रही है। 

बता दें कि अब भी मायावती दलितों की राष्ट्रीय आवाज बनी हुई हैं। मायावती के अलावा रामविलास पासवान, रामदास अठावले और उदित राज भी दलित राजनीति करते आ रहे हैं, लेकिन उनका असर अपने इलाकों तक ही रहता है।

मायावती को युवा दलितों से थोड़ी चुनौती मिल चुकी है, लेकिन वे भी अब बिखरने लगे हैं। भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद रावण तो अब तक ठीक से खड़े भी नहीं हो पाए हैं। चंद्रशेखर से बेहतर स्थिति तो जिग्नेश मेवाणी की जरूर है लेकिन काफी दौड़-धूप के बाद भी गुजरात से बाहर उनकी आवाज उतनी ही देर गूंजती है जितनी देर वह टीवी पर नजर आते हैं। 

Web Title: BSP will play the role of vote cut in these three states ( Hindi News From Newstimes)


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