इस बार दीवाली पर पटाखे नहीं चलाएं, करें ये काम


NP1591 24/10/2019 15:17:41
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Lucknow: दीपावली मनाएं लेकिन पटाखों फोड़ कर प्रदूषण न फैलाएं, क्योंकि यह वातावरण को दूषित करने के साथ-साथ हमारे स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। दीपावली मतलब रोशनी का त्योहार न कि पटाखों का त्योहार। दीपावली शरद ऋतु में हर वर्ष मनाया जाने वाला एक प्राचीन त्योहार है। यह त्योहार आध्यात्मिक रूप से अंधकार पर प्रकाश की विजय को दर्शाता है। भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी त्यौहारों में दीपावली का सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। तमसो मां ज्योतिर्गमय अर्थात् अंधेरे से ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर जाइए।

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दीपावली दीपों का त्यौहार है, दीप जलाएं पूजा पाठ करिये और साथ ही साथ अपने आस-पास सफाई भी रखें। लेकिन घर की साफ-सफाई करके कूड़े को आपने आस-पास न फेंके। बल्कि उसे कूड़े दान में ही डालें। घर के बहार और घर के अंदर दीप जलना बहुत रमणीय लगता है, लेकिन दीपों के साथ-साथ लोग पटाखे भी जलाते हैं, जो हमारे स्वास्थ्य और वातावरण के लिए हानिकारक है, क्योंकि जो पटाखे हम छोड़ते है वह कहीं न कहीं हमारे पर्यावरण के साथ जनस्वास्थ्य के लिये वातावरण में जहर घोलता है।

पटाखों में मौजूद जहरीली गैस जैसे नाइट्रोजन डाई आक्‍साइड, सल्फर डाई आक्साइड आदि हमारे वातावरण और स्वास्थ्य दोनों के लिए हानिकारक हैं। ये जहरीली गैसें अस्थमा व ब्राेन्‍काइटिस जैसी सांसों से संबंधी बीमारियों को जन्म देती हैं। आतिशबाजी के कारण दिल के दौरे, रक्त चाप, दमा, एलर्जी, ब्रोंकाइटिस और निमोनिया जैसी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। 

इसलिए दमा एवं दिल के मरीजों को खास तौर पर पटाखों के प्रति सावधानियां बरतनी चाहिये। जहां तक सम्भव हो पटाखें न खरीद कर उन पैसाें से पेड़ खरीद कर लगाएं जो हमारे स्वास्थ्य और वातावरण दोनों के लिए लाभकारी होंगे। पिछले वर्ष दीपावली से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट ने पटाखे जलाने और बिक्री से संबंधित एक याचिका पर फैसले के दौरान ग्रीन पटाखों का जिक्र किया था। कोर्ट ने मशविरा दिया था कि त्योहारों पर कम प्रदूषण करने वाले ग्रीन पटाखे ही बेचे और जलाएं जाने चाहिए।

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भारत में बढ़ती आबादी से वैसे ही पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, लेकिन दिवाली की रात पटाखों से निकलने वाले धुएं से यह प्रदूषण कई गुना बढ़ जाता है। मगर कुछ पल की खुशी और पैसे के दिखावे के आगे लोग आंखें मूंदे रहते हैं। उन्हें शायद पता नहीं होता कि वे पटाखे जला कर वायुमंडल में कितना प्रदूषण घोल रहे हैं। यही वजह है कि दिल्ली में पिछले तीन−चार साल से बाकायदा अभियान चलाया जा रहा है। यहां हर साल कई स्कूली बच्चे पटाखे न चलाने की शपथ लेते हैं। हालांकि इस अभियान को पूरी सफलता मिलनी अभी बाकी है।

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दरअसल, इन पटाखों में जिन रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है, वह बेहद खतरनाक हैं। कॉपर, कैडियम, लेड, मैग्नेशियम, सोडियम, जिंक, नाइट्रेट और नाइट्राइट जैसे रसायन का मिश्रण पटाखों को घातक बना देते हैं। इससे 125 डेसिबल से ज्यादा ध्वनि होती है। अचानक इन पटाखों के फटने से आदमी कुछ पल के लिए बहरा हो जाता है। कई बार पीड़ित स्थायी रूप से भी बहरा हो जाता है। पटाखों से निकली चिंगारी से हर साल सैंकड़ों लोगों की आंखें और चेहरे जख्मी हो जाते हैं। सांस की बीमारी तो होती ही है। ऐसे समय में दमे के रोगी की परेशानी बढ़ जाती है।

ऐसा माना जाता है कि सबसे पहले पटाखे का प्रयोग चीन में हुआ। फिर धीरे-धीरे ये इटली, फ्रांस, से होता हुआ भारत में आ पहुंचा। चीन में पटाखों का प्रयोग जंगली जानवरों और बुरी आत्माओं को भागने के लिए प्रयोग किया जाता था। लेकिन धीरे-धीरे यह व्यापक रूप लेता गया।

लोग अब पटाखो का प्रयोग खुशियां मनाने, दीपावली, शादी-विवाह, खुशी के मौके नये साल के प्रवेश आदि पर भी इसका प्रयोग करने लगे। जो कही न कही हमारे वातावरण पर भी प्रभाव डाल रहा और हमें कई वीमारियों को जन्म दे रहा है। इस लिए हमें पटाखों के प्रयोग से बचना चाहिए।

Web Title: Deewali is a festival of light, do not spread pollution by burning firecrackers ( Hindi News From Newstimes)


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