यहां पर असुर भी मनातें हैं दिवाली, देवी-देवताओं से पहले करते हैं इनकी पूजा


NP1509 27/10/2019 11:11:16
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Lucknow. आज पूरे देश में बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक दीपावली का त्योहार मनाया जा रहा है। मान्यता है कि भगवान राम इस दिन (कार्तिक अमावस्या) को चौदह साल का वनवास और असुरी शक्तियों का विनाश करके अयोध्या वापस लौटे थे। इस खुशी में अयोध्या की जनता ने भगवान राम के स्वागत में दीप जलाकर इस उत्सव को मनाया था। जिसके बाद से ही दीपोत्सव की परंपरा चली आ रही है। 

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वैसे तो भारतवर्ष में लोग इस त्योहार को बड़े धूम-धाम से मनाते हैं, लेकिन एक ऐसी जगह भी है जहां पर असुर भी इस त्योहार को मनाते हैं। दरअसल, जशपुर जिले में असुर जनजाति के कुछ गांव हैं। यह लोग खुद को असुरराज महिषासुर का वंशज बताते हैं। ये आदिवासी दिवाली भी मनाते हैं और देवी-देवताओं की पूजा भी करते हैं, लेकिन देवी-देवताओं की पूजा से पहले घर के बुजुर्गों की पूजा करते हैं। मनोरा तहसील के बुजरुपाठ, कांटाबेल, कुलाडोर, लुखी, दोनापाठ गांवों में असुर जनजाति के करीब 300 परिवार निवास करते हैं।

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इस आदिवासी समाज के लोगों में आढ़ा-बूढ़ा नामक अनोखी और अति प्रेरक परंपरा कायम है। ये लोग सभी त्योहारों में देवी-देवताओं की पूजा से पहले घर के बुजुर्गों की पूजा कर आशीर्वाद लेते हैं। इनका मानना है कि घने जंगल में कहीं खो जाने पर वृद्धजनों का आशीर्वाद ही उनके जीवन की रक्षा कर उन्हें घर तक सुरक्षित वापस पहुंचने का रास्ता दिखाता है। इनके लिए धन-दौलत नहीं बल्कि वन्यजीवन ही अमूल्य निधि है।

Web Title: Diwali of asuras special story ( Hindi News From Newstimes)


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