Tulsi Vivah 2019: इस कथा के बिना अधूरा है विवाह


NP1591 08/11/2019 10:16:39
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Lucknow: तुलसी विवाह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि यानी देव प्रबोधनी एकादशी के दिन मनाया जाता है। इस बार तुलसी विवाह शुक्रवार यानि 8 नवम्बर को मनाया जा रहा है। तुलसी विवाह की  मान्यता है कि जो लोग कन्या सुख से वंचित होते हैं यदि वो इस दिन भगवान शालिग्राम से तुलसी जी का विवाह करें तो उन्हें कन्या दान के बराबर फल की प्राप्ति होती है। इस दिन से लोग सभी शुभ कामों की शुरुआत कर सकते हैं। तुलसी का भगवान विष्णु के साथ विवाह करके लग्न की शुरुआत होती है।  

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प्रबोधनी एकादशी पर शुक्रवार को भगवान को पूरे विधि-विधान से भक्त जगाएंगे। दिनभर श्रद्धालु उपवास में रहेंगे। भगवान को जगाने के लिए आंगन में ईखों का घर बनाया जाएगा। चार कोने पर ईंख और बीच में एक लकड़ी का पीढ़ा रखा जाएगा। आंगन में भगवान के स्वागत के लिए अरिपन (अल्पना) की जाएगी। शाम में इस पर शालिग्राम भगवान को रखकर पूजा की जाएगी। वेद मंत्रोच्चार के साथ कम से कम पांच श्रद्धालु मिलकर भगवान को जगाएंगे। इस कथा के बिना तुलसी विवाह अधूरा रहता है इस लिए लोग इस दिन अपने घर कथा पूजन पूरे विधिविधान से करते है। तो आइए जानते हैं तुलसी विवाह की कथा को बारे में ...

तुलसी विवाह की कथा-

हिंदू धर्म की पौणिक ग्रथों के अनुसार बहुत पुराने समय में जलंधर नाम का दुष्ट राक्षस रहता था, वृंदा नाम की एक लड़की से उसका विवाह हुआ। वृंदा भगवान विष्णु की भक्त थी और दिन भर उनकी पूजा अर्चना करती रहती थी। वह अपने पति से भी बेहद प्रेम करती थी और उनके प्रति भी समर्पित थी।

वृंदा की भक्ति भगवान के प्रति इतनी गहरी थी कि उसके पति जलंधर को यह वरदान प्राप्त था कि उसे कभी कोई हरा नहीं पाएगा। वह अजेय रहेगा। यही वजह है कि जलंधर काफी अहंकारी और अत्याचारी हो गया था। यहां तक कि वह अप्सराओं और देव कन्याओं को भी तंग करने लगा था। स्वर्ग के सभी देवी-देवताओं ने इससे तंग आकर भगवान विष्णु से मदद की गुहार लगाई।

देवताओं की अनुनय पर भगवान विष्णु ने जलंधर का झूठा रूप धारण कर भक्त वृंदा के पतिव्रत धर्म को तोड़ दिया। ऐसा होने से जलंधर काफी कमजोर हो गया और देवताओं के साथ युद्ध में उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन जब पति की मौत के शोक में व्याकुल वृंदा को जब भगवान विष्णु के इस छल का पता चला तब गुस्से में आकर उसने उन्हें शिलाखंड बन जाने का श्राप दे दिया।

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लेकिन देवी देवताओं ने वृंदा से विनती की कि वे अपना श्राप वापस ले लें। वृंदा ने अपना श्राप वापस ले लिया, लेकिन भगवान विष्णु ने अपनी भक्त वृंदा के श्राप का मान रखने के लिए एक पत्थर में अपना अंश प्रकट किया, इसे ही शालिग्राम कहा जाता है।

लेकिन पति वियोग से दुखी वृंदा का दुःख कम नहीं हुआ और श्राप देने और वापस लेने के बाद बाद भी वे अपने पति के शव के साथ सती हो गई। जहां वृंदा की चिता की राख थी, वहां पवित्र तुलसी का पौधा उत्पन्न हो गया। देवताओं ने पतिव्रता वृंदा का मान रखने के लिए तुलसी का विवाह भगवान विष्णु के ही दूसरे रूप शालिग्राम से करवाया। जिस दिन ऐसा हुआ उस दिन कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देव प्रबोधनी एकादशी थी। तभी से कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन तुलसी और शालिग्राम का विवाह कराने की परंपरा चली आ रही है।

तुलसी विवाह की पूजा विधि-

 तुलसी विवाह करते समय तुलसी का पौधा खुले में रखें। 
तुलसी विवाह के लिए मंडप को गन्न से सजाएं।
इसके बाद तुलसी जी पर सबसे पहले लाल चुनरी ओढ़ाएं। उन्हें श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें।
इसके बाद तुलसी के गमने पर भगवान विष्णु के दूसरे स्वरूप यानी शालिग्राम को रखें फिर उस पर तिल चढ़ाएं।
अब दूध और हल्दी तुलसी जी और शालिग्राम भगवान को अर्पित करें।
तुलसी विवाह के समय मंगलाष्टक का पाठ जरूर करें।
एक घी का दीपक तुलसी जी के समक्ष जलाएं और उन्हें भोग में दाल और गुड़ अर्पित करें।
तुलसी की कथा पढ़ें और भजन कीर्तन करें।
एक लाल कपड़े में लपेट कर नारियल तुलसी माता को अर्पित करें।
घर में किसी पुरुष को शालिग्राम जी को हाथ में उठाकर तुलसी जी की सात बार परिक्रमा करवानी चाहिए।
ध्यान रहे कि तुलसी जी को शालिग्राम भगवान के बाईं तरफ बिठाएं।
पूजा खत्‍म होने के बाद सारी सामग्री और तुलसी का पौधा मंदिर में दे आएं।

 

 

Web Title: Tulsi marriage: Tulsi marriage is incomplete without this legend ( Hindi News From Newstimes)


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