अयोध्या का उद्धार


NP1357 17/11/2019 14:45:12
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शिव रुचि सिंह

”होइहि सोई जो राम रचि राखा।“ तुलसीदास जी के द्वारा यह कथन श्रीरामचरित मानस में कहा गया है। आस्था कहती है कि भगवान श्रीराम की इच्छा के बिना एक पत्ता भी स्थानान्तरित नहीं हो सकता। यदि यह सत्य है तो भगवान श्रीराम की इच्छा मन्दिर निर्माण के पक्ष में अब तक क्यों नहीं हुई? श्रीराम के अपने जन्मस्थान अयोध्या में स्वयं श्रीराम के ही मन्दिर पर फ़ैसला आने में 491 वर्ष क्यों लग गए? क्या दयालु समझे जाने वाले राम इतने निष्ठुर और पत्थर दिल थे कि उनको अपने चाहने वालों के आँसू, उनकी करुण पुकार, यहाँ तक कि उनकी लाशें भी द्रवित नहीं कर सकीं? ऐसे बहुत से प्रश्न हैं जो करुणा के सागर व भक्त वत्सल कहे जाने वाले श्रीराम के स्वभाव पर प्रश्न चिह्न लगाते हैं।

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श्रीमद्भगवद्गीता भगवान् श्रीकृष्ण की अमृतवाणी है और इसमें भगवान अर्जुन को ज्ञान का उपदेश देते हुए कहते हैं, ”कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन“ (द्वितीय अध्याय, श्लोक-47) अर्थात् तुम्हारा अधिकार क्षेत्र केवल कर्म तक ही सीमित है। कर्मफल पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि फल देने का अधिकार स्वयं परमात्मा ने अपने पास सुरक्षित कर रखा है। वह निश्चित समय आने पर कर्मफल कर्ता को स्वयं देते हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि अयोध्या वासियों ने त्रेतायुग में ऐसा क्या अपराध कर डाला था, जिसका दण्ड उनको कलयुग में स्वयं के आराध्य श्रीराम के मन्दिर विध्वंस के रूप में मिला। यदि जगतपति राम न्यायप्रिय हैं तो उनके मन्दिर विध्वंस से किसको न्याय मिला?

अयोध्या मामले में सभी का ध्यान बाबर और मीर बाक़ी की ओर आकर्षित किया गया। सन् 1528 ईसवी में सेनापति मीर बाक़ी ने मन्दिर तोड़कर मस्जिद का निर्माण कराया। जिसको तत्कालीन शासक बाबर के नाम पर बाबरी मस्जिद का नाम दिया। तब से अब तक कई बार सत्ता परिवर्तन हुआ साथ ही सन् 1989,1990,1992 ईस्वी समेत कई वर्षों में क्रांतिकारी आन्दोलन भी हुए, यहाँ तक कि सन् 2010 ईसवी में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फ़ैसला भी आया पर विवादित स्थल पर मन्दिर निर्माण की चाह मात्र एक आशा ही बनी रही। प्रश्न अभी भी वही है कि आखि़र रामभक्तों से ऐसा कौन सा अपराध हुआ जिसके चलते असंख्य बलिदान देने पर भी उनको अपने आराध्य का मन्दिर नसीब नहीं हुआ।

मैं पाठकों का ध्यान बाबर के समय से कई सदी पूर्व त्रेता युग में ले जाना चाहता हूँ। यह समय भारत के इतिहास का सबसे सुखद समय माना जाता है। यह स्वर्णिम समय ‘रामराज्य‘ के रूप में अब तक प्रसिद्ध है। अयोध्या समेत सम्पूर्ण विश्व में शान्ति, सुख व समृद्धि का निवास था। लंका के राजा रावण का नाश कर श्रीराम अयोध्या वापस आ चुके थे। देश अपनी पहली दीपावली को धूमधाम से मना रहा था। कुछ समय ही बीता था कि अचानक प्रजा में एक विद्रोह की चिंगारी दिखी और यह चिंगारी थी माता सीता के पावन व निर्मल चरित्र पर मिथ्या आरोप। अयोध्या की प्रजा ने माता के पावन चरित्र पर लांछन लगाया। यह जानकर भी कि माता सीता अपने चरित्र की पवित्रता के प्रमाण स्वरूप अग्नि परीक्षा उत्तीर्ण कर चुकी हैं, अयोध्या के कुछ कुटिल मानसिकता वाले लोगों ने अपने आगे किसी की न सुनी। 

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परिणाम स्वरूप रघुनन्दन श्रीराम ने राजधर्म का पालन करते हुए माता सीता का परित्याग कर दिया। तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस इस बात का प्रमाण है कि माता सीता का अपमान एक बार नहीं, बल्कि समय-समय पर कई बार हुआ। अथर्ववेद के अनुसार ”यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते तत्र रमन्ते देवता“ अर्थात्- जहाँ नारी की पूजा अर्थात् सम्मान होता है वहाँ देवता निवास करते हैं। अतः यह स्पष्ट है कि जहाँ चरित्रवान स्त्री का अपमान हुआ हो वहाँ प्रभु श्रीराम किसी भी परिस्थिति में निवास नहीं करना चाहेंगे। अयोध्या में जो हुआ वह माता सीता के अपमान पर प्रभु श्रीराम का कोप ही कहा जाएगा। 

अन्यथा सम्पूर्ण भारतवर्ष में किसी भी मंदिर इत्यादि का मुक़दमा 134 वर्षों तक किसी न्यायालय में नहीं चला। हिन्दू बहुसंख्यक होते हुए भी 491 वर्षों तक अपने आराध्य श्रीराम का मंदिर नहीं बना सके। निश्चय ही यह स्वयं श्रीराम का क्रोध ही था। सदियों बाद अनगिनत बलिदानों के पश्चात् अब जाकर माता सीता के प्रति किए गए दुव्र्यवहार के श्राप से मुक्ति मिली है। अतः देशवासियों को चाहिए कि माता सीता के परम पवित्र व अनुकरणीय चरित्र का सम्मान करते हुए सर्वप्रथम माता सीता से क्षमा प्रार्थना करें और फिर भक्त शिरोमणि श्री हनुमान जी से आज्ञा प्राप्त कर उनकी सहायता से ही राम मन्दिर निर्माण करें।

न्यायालय में यह प्रमाणित हो चुका है कि राम एक कल्पना मात्र नहीं है और उनके वंशज आज भी भारतवर्ष में है। अतः मैं यही कहूंगा कि दिनांक 9 नवम्बर, 2019 को एक कहानी तो ख़त्म हो गई, लेकिन आज भी माता सीता की कई चरित्रवान बेटियाँ हमारे देश में दुर्व्यवहार का शिकार होती है। एक सीता के अपमान का प्रायश्चित् तो लगभग 500 वर्षों में पूरा हुआ और ना जाने कितनी जिन्दगियाँ बलिदान हुई। सोचिए आज की सीता के अपमान का प्रायश्चित् कब और कैसे पूरा होगा तथा उनके साथ किए जा रहे हैं दुष्कृत्यों का दुष्परिणाम कितना भयानक होगा?

 

Web Title: ayodhya ka hua udyar ( Hindi News From Newstimes)


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