जयंती विशेष: वीरांगना झलकारी बाई रानी लक्ष्मी बाई के वेश में शत्रुओं से करती थींं युद्ध


NP1591 22/11/2019 15:17:38
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Lucknow: वीरांगना झलकारी बाई की जयंती आज 22 नवम्बर, 2019 को बड़े धूम धाम से मनाई जा रही है। वीरांगना झालकारी वाई रानी लक्ष्मी बाई की महिला शाखा दुर्गा दल की सेनापति थीं। झलकारी बाई को रानी लक्ष्मी बाई की हम शक्ल माना जाता था। इस कारण शत्रु को धोखा देने के लिए वे रानी लक्ष्मी बाई के वेश में भी शत्रुओं  से युद्ध करती थीं। अपने अंतिम समय में भी वे रानी के वेश में युद्ध करते हुए अंग्रेजों के हाथों पकड़ी गयीं और रानी लक्ष्मी बाई को किले से भाग निकलने का अवसर मिल गया।

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झलकारी बाई प्रथम स्वाधीनता संग्राम में झांसी की रानी के साथ ब्रिटिश सेना के खिलाफ लड़ते हुए ब्रिटिश सेना के कई हमलों को विफल किया था। झलकारी बाई की गाथा आज भी बुंदेलखंड की लोकगाथाओं और लोकगीतों में सुनी जा सकती है। भारत सरकार ने 22 जुलाई 2001 में झलकारी बाई के सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया है। इतिहासकारों के मुताबिक 23 मार्च 1858 को जनरल रोज ने अपनी विशाल सेना के साथ झांसी पर आक्रमण कर दिया था। ये 1857 के विद्रोह का दौर था। रानी लक्ष्मीबाई ने वीरतापूर्वक अपने 5000 सैनिकों के दल के साथ उस विशाल सेना का सामना किया। 

जीवन परिचय और प्रारम्भिक शिक्षा

झलकारी बाई का जन्म 22 नवम्बर 1830 को बुंदेलखंड में झांसी के पास के भोजला नामक गांव में एक निर्धन कोली परिवार में हुआ था। झलकारी बाई के पिता का नाम सदोवर सिंह और माता का नाम जमुना देवी था। जब झलकारी बाई बहुत छोटी थीं तभी उनके सिर से मां का साया उठ गया और उसके बाद उनके पिता ने उनका पालन पोषण एक लड़के की। बचपन से ही झलकारी घर के काम के अलावा पशुओं की देखरेख और जंगल से लकड़ी इकट्ठा करने का काम भी करती थी। एक बार जंगल में झलकारी मुठभेड़ एक बाघ से हो गई थी और उन्होंने अपनी कुल्हाड़ी से उस जानवर को मार डाला था। वह एक वीर साहसी महिला थी। 

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झलकारी बाई ने घुड़सवारी करने और हथियार चलाने का भी प्रशिक्षित किया था। उन दिनों की सामाजिक परिस्थितियों के कारण उन्हें कोई औपचारिक शिक्षा तो प्राप्त नहीं हो पाई, लेकिन उन्होनें खुद को एक अच्छे योद्धा के रूप में अपने आप को ढाला था। झलकारी बचपन से ही बहुत साहसी और दृढ़ प्रतिज्ञ बालिका थी। एक बार डकैतों के एक गिरोह ने गांव के एक व्यवसायी पर हमला किया तब झलकारी ने अपनी बहादुरी से उन्हें पीछे हटने को मजबूर कर दिया था। उनकी इस बहादुरी से खुश होकर गांव वालों ने उनका विवाह रानी लक्ष्मीबाई की सेना के एक सैनिक पूरन कोरी से करवा दिया, पूरन भी बहुत बहादुर था और पूरी सेना उसकी बहादुरी का लोहा मानती थी।

एक बार गौरी पूजा के अवसर पर झलकारी गांव की अन्य महिलाओं के साथ महारानी को सम्मान देने झांसी के किले में गयीं, वहां रानी लक्ष्मीबाई उन्हें देख कर अवाक रह गयी क्योंकि झलकारी बिल्कुल रानी लक्ष्मीबाई की तरह दिखतीं थीं (दोनो के रूप में आलौकिक समानता थी)। अन्य औरतों से झलकारी की बहादुरी के किस्से सुनकर रानी लक्ष्मीबाई बहुत प्रभावित हुईं। रानी ने झलकारी को दुर्गा सेना में शामिल करने का आदेश दिया। झलकारी ने यहां अन्य महिलाओं के साथ बंदूक चलाना, तोप चलाना और तलवारबाजी की प्रशिक्षण लिया। यह वह समय था जब झांसी की सेना को किसी भी ब्रिटिश दुस्साहस का सामना करने के लिए मजबूत बनाया जा रहा था।

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साहित्य व उपन्यासों में लक्ष्मीबाई की तरह है जिक्र 

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की तरह ही झलकारीबाई का भी साहित्य, उपन्यासों और कविताओं में जिक्र किया गया है। 1951 में बीएल वर्मा द्वारा रचित उपन्यास ‘झांसी की रानी’ में झलकारी बाई को विशेष स्थान दिया गया है। रामचंद्र हेरन के उपन्यास माटी में झलकारीबाई को उदात्त और वीर शहीद कहा गया है। भवानी शंकर विशारद ने 1964 में झलकारीबाई का पहला आत्मचरित्र लिखा था। इसका बाद कई साहित्यकारों और लेखकों ने झलकारीबाई की बहादुरी की तुलना रानी लक्ष्मीबाई से की है।  

Web Title: Jayanti Special: Veerangana Jhalkari Bai used to fight against enemies in disguise of Rani Laxmi Bai ( Hindi News From Newstimes)


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