सावधान: धरती को निगल रहा प्लास्टिक


NP1550 25/11/2019 12:33:36
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-- शिव प्रसाद सिंह, वरिष्ठ पत्रकार 

सस्ता-मजबूत-टिकाऊ और मनचाहे आकार में ढालने में आसानी जैसी खासियतों की वजह से प्लास्टिक की मांग साल-दर-साल बढ़ती गई और उसी अनुपात में उसका उत्पादन और उसका कचरा भी बढ़ा। आज यह पूरे पर्यावरण के लिए चुनौती बन गया है। इससे उबरने के अब तक के सारे उपाय, नियम-कानून और जागरूकता के प्रयास नाकाफी साबित हुए हैं। पारिस्थितिकी असंतुलन के कारण पूरा विश्व जल संकट से जूझ रहा है, जंगल आग की भेंट चढ़ रहे हैं। इस असंतुलन के कारण पहाड़ तबाह हो रहे हैं। अपने भारत में भी जिस तरह उपभोक्तावादी संस्कृति गांव से लेकर शहरों तक को निगल रही है उसी अनुपात में प्लास्टिक का कचरा बढ़ता जा रहा है।

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जिधर देखिए प्लास्टिक के कचरे का अम्बार दिख जाएगा, चाहे वह पहाड़ हो या मैदान, नदी-नाले हों या ताल-तलैया। भारत में प्लास्टिक 60 के दशक में प्रभावी रूप से आया और अब इसके उत्पादन, खपत और कचरे ने इतना व्यापक आकार ले लिया है कि इसका आकलन मुश्किल है। इस बात का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दो से तीन साल पहले भारत में अकेले आटोमोबाइल क्षेत्र में इसका उपयोग पांच हजार टन वार्षिक था। इस इंडस्ट्री में मंदी से पहले इसके 22 हजार टन से ऊपर पहुंच जाने का अनुमान था। जबकि रीसाइकिल का हाल देखिए - रीसाइकिलिंग इकाइयों तक मात्र एक हजार टन प्लास्टिक कचरा प्रतिदिन पहुंचता है जिसके 75 फीसदी हिस्से से कम मूल्य की चप्पलें बनती हैं। आर्थिक उदारीकरण की वजह से प्लास्टिक उद्योग को अधिक बढ़ावा मिला।

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►दुनिया के 40 मुल्कों में प्रतिबंधित है प्लास्टिक

प्लास्टिक के इस्तेमाल पर भारत का रुख भले ही लचीला हो लेकिन उसके खतरे को देखते हुए दुनिया के 40 देशों में प्लास्टिक पर पूरी तरह प्रतिबंध है। अफ्रीकी देश केन्या ने तो हाल के वर्षों में पूर्ण प्रतिबंध लागू करने के साथ ही कड़े दण्ड का प्रावधान लागू किया था। प्लास्टिक को प्रतिबंधित करने वाले देशों में फ्रांस, इटली और रवांडा जैसे देश शामिल हैं। यूरोपीय आयोग का भी प्रस्ताव है कि हर साल प्लास्टिक का उपयोग कम किया जाए। प्लास्टिक का प्रयोग घटाने के लिए आयरलैंड ने प्लास्टिक के हर बैग पर 15 यूरोसेंट का टैक्स लगाया तब से वहां इसका इस्तेमाल काफी घट गया। इस टैक्स को पर्यावरण कोष में डाला जाता है। 

►उर्वरा शक्ति को भी नष्टï कर रहा प्लास्टिक 

प्लास्टिक के कचरे की रीसाइकिलिंग की पर्याप्त व्यवस्था न होने की वजह से यह धरती की उर्वरा शक्ति के लिए भी घातक सिद्ध हो रहा है। इसे जलाया जाए तो जहरीली गैस निकलती है। अगर यह मिट्टी में पहुंच जाए तो उसकी उर्वरा शक्ति नष्ट होती है। इसके अलावा मवेशियों के पेट में जाकर यह जानलेवा बन जाती है। 

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►प्लास्टिक की खोज 

प्लास्टिक का मौजूदा स्वरूप प्राप्त करने की कोशिश सदियों पहले शुरू हो गई थी। सबसे पहले प्लास्टिक जैसा पदार्थ प्राकृतिक सामग्रियों - प्राकृतिक रबर, निट्रोसेल्यूलोज, कोलेजन, गैलालाइट से बनाया गया। 1600 ईपू में मेसौमेरिकन्स यानी प्राकृतिक रबर का इस्तेमाल गेंद, बैंड और मूर्तियां बनाने के लिए किया जाता था। सन् 1855 में एलेक्जेंडर पाक्र्स ने सबसे पहले प्लास्टिक का अविष्कार किया। उसे पारकेसिन (निट्रोसेल्यूलोज) कहा जाता था। बाद में दो जर्मन रसायन शास्त्रियों - विल्हेलम फ्रिस्क तथा एडोल्फ स्पिट्लर ने ब्लैक बोर्ड बनाने के लिए स्लेट का विकल्प ढूंढऩे का प्रयास शुरू किया। वर्ष 1846 से 1940 तक के ढेरों प्रयासों और प्रयोगों के बाद कैसीन पर फार्मेल्डिहाइड की रासायनिक क्रिया में पशुओं की सींगों का इस्तेमाल कर प्लास्टिक जैसा पदार्थ तैयार किया गया जिसका कई प्रकार से इस्तेमाल किया जा सकता था। सन् 1900 में पूरी तरह से सिंथेटिक थर्मोसेट, फिनोल और फार्मएल्डिहाइड का प्रयोग कर प्लास्टिक बनाना शुरू किया। वर्ष 1900 में ही जर्मनी तथा फ्रांस में कैसीन से बने प्लास्टिक का व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो गया। इसके बाद बेल्जियम के अमेरिकी नागरिक डॉ. लियो बैकलैंड ने 1909 में फीनॉल तथा फार्मेल्डिहाइड की अभिक्रिया में कुछ परिवर्तन करके ऐसा प्लास्टिक तैयार किया जिसका उपयोग कई उद्योगों में किया जा सकता था। बेकलैंड के नाम पर ही इस नए प्लास्टिक का नामकरण बेकेलाइट किया गया। 

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►कैसे और क्यों बढ़ा प्लास्टिक का इस्तेमाल 

आज हम अपनी दिनचर्या में जितनी भी चीजों का इस्तेमाल करते हैं उनमें अधिकतर चीजें प्लास्टिक से बनी होती हैं, जैसे - बर्तन, कंघे, टेलीफोन, टेलीविजन, खिलौने, मशीनों के पुर्जे इत्यादि। जो चीजें पहले लोहे-लकड़ी आदि से बनाई जाती थीं, आज वे प्लास्टिक से बनाई जा रही हैं। वह अन्य पदार्थों की तुलना में कई कारणों से बेहतर भी है। प्लास्टिक की चीजें जल्दी से टूटती नहीं हैं। दूसरा, प्लास्टिक लकड़ी या कागज की तरह सड़ता नहीं है। न प्लास्टिक पर लोहे की तरह जंग लगता है और न ही उस पर किसी वातावरण का कोई प्रभाव पड़ता है। कुचालक होने की वजह से प्लास्टिक से विद्युत के उपकरण बनाए जाते हैं। प्लास्टिक की आयु बहुत लंबी होती है और प्लास्टिक से बनाई गईं वस्तुएं अन्य धातुओं के मुकाबले में सस्ती और लम्बे समय तक टिकने वाली होती हैं।  

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►प्लास्टिक की रीसाइक्लिंग

प्लास्टिक एक ऐसा पदार्थ है जो सदियों तक खत्म नहीं होता। इसे जलाने पर वातावरण में बहुत ज्यादा मात्रा में प्रदूषण होता है। इस वजह से इसकी रीसाइक्लिंग पर जोर दिया जा रहा है। रीसाइक्लिंग के बाद इससे अन्य सामान तैयार किए जा सकते हैं। जैसे प्लास्टिक की बोतलों को पिघला कर उन्हें प्लास्टिक की कुर्सियों-मेजों का आकार दिया जा सकता है। हालांकि प्लास्टिक रीसाइक्लिंग की औसत दर अन्य वस्तुओं जैसे अखबार (लगभग 80 प्रतिशत) और नालीदार फाइबर बोर्ड (लगभग 70 प्रतिशत की तुलना में बहुत कम है। प्लास्टिक की रीसाइक्लिंग के मामले में ताईवान ने काफी सफलता हासिल की है। हाल ही में एक आविष्कार हुआ है जो प्लास्टिक के कचरे को 3-डी प्रिंटर के फिलॉमेंट में बदल देता है।  

►शपथ लेकर भूल जाते हैं हम 

हम प्लास्टिक का इस्तेमाल न करने की शपथ तो लेते हैं लेकिन व्यवहार में भूल जाते हैं। किसी भी शादी, बर्थ-डे पार्टी में प्लास्टिक से बनीं चीजों का खूब इस्तेमाल करते हैं। पॉलीथीन के बैग हर हाथ में दिख जाएंगे। कोई भी आयोजन हो, हम प्लास्टिक की प्लेट, बोतल से लेकर चम्मच तक ले आते हैं। यह नहीं सोचते कि यह कितना खतरनाक साबित हो सकता है। इसमें मौजूद केमिकल कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी भी दे सकते हैं। अक्सर प्लास्टिक के ‘डिस्पोजेबल पॉट’ में गरम चीजों को खाते-पीते हैं, जिनमें मौजूद रासायनिक पदार्थ खाने-पीने की चीजों में मिलकर सेहत के लिए काफी नुकसानदेह हो जाते हैं। ‘डिस्पोजेबल कप’ के ऊपरी भाग में मोम की परत होती है, जो पिघलकर गरम चीजों में घुलकर हमारे शरीर में चली जाती है। इसके अलावा प्लास्टिक के गरम होने के बाद उसके जहरीले पदार्थ भी पिघलने लगते हैं। ये शरीर में पहुंचकर लीवर के रोग, किडनी में पथरी, कैंसर आदि जानलेवा बीमारियों का कारण बन सकते हैं।

►देखिये स्थिति कितनी भयावह

- इस ओर ध्यान खींचने की एक और कोशिश करते हुए भयावह स्थिति की याद दिलाने के लिए ये आंकड़े प्रस्तुत हैं- 

- 1950 के दशक की शुरुआत में जबसे प्लास्टिक का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू हुआ, तब से 2015 तक इस धरती पर कुल 8.3 अरब टन प्लास्टिक का बोझ धरती पर इकत्र हो गया है। अगर इसके बाद के तीन सालों के उत्पादन को जोड़ दिया जाए तो यह मात्रा दस अरब टन के करीब पहुंच जाएगी।  

- पिछले साल पूरी दुनिया में प्लास्टिक का उत्पादन 3.6 प्रतिशत बढक़र करीब 36 करोड़ टन तक पहुंच गया था। अगर 1990 के उत्पादन से तुलना की जाए तो यह तीन गुना बैठता है। 

- प्लास्टिक की सप्लाई के मामले में चीन 30 प्रतिशत भागीदारी के साथ सबसे आगे है। उसने 2018 में पिछले साल की तुलना में दोगुना प्लास्टिक का उत्पादन किया था। 

- अमेरिका में हर साल साढ़े तीन करोड़ टन से ज्यादा प्लास्टिक का उत्पादन होता है। एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में 4.32 खरब डालर का प्लास्टिक का कारोबार है। जबकि इसस करीब दस लाख लोगों को रोजगार प्राप्त है।      

- यूरोपीय समूह के देशों में हर साल आठ लाख टन के करीब प्लास्टिक बैग का उपयोग किया जाता है जिनका उपयोग सिर्फ एक बार किया जाता है। 

- भारत में हर साल करीब 56 लाख टन प्लास्टिक कचरा होता है।

- एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक समुद्र में मछलियों से अधिक प्लास्टिक होगा।

आयोजनों में इन चीजों का करें इस्तेमाल

- प्लास्टिक के अलावा कई ऐसी चीजें हैं जिनका इस्तेमाल कर खुद और अपने बच्चे के स्वास्थ्य को सही रख सकते हैं।
- आप प्लास्टिक की जगह पत्ते से बने पत्तल का इस्तेमाल करें। आप चाहे तो स्टील, चांदी, तांबा आदि के बर्तनों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। यह आपकी और बच्चे के सेहत के लिए काफी अच्छा होगा।

Web Title: Negative impacts of plastic pollution ( Hindi News From Newstimes)


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