पॉलिथीन ले रही बेजुबानों की जान, इस्तेमाल से बचें...


NP1509 25/11/2019 12:34:59
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डॉ. पीके त्रिपाठी, चिकित्सा विशेषज्ञ

उत्तर प्रदेश में पॉलिथीन पर प्रतिबंध लगाने का क्रम वैसे तो वर्ष 2000 से ही चल रहा है, जब एक गाय की मृत्यु के बाद पोस्टमॉर्टम करने पर उसका पूरा पेट पॉलिथीन से भरा पाया गया। 1 अप्रैल, 2000 को एक बेसहारा गौवंशीय पशु जो कई दिनों से खाना नहीं खा पा रहा था, उसे गोशाला में रखा गया था। कई दिन से उसका इलाज भी चल रहा था। बाद में उसके पेट का ऑपरेशन कर उसमें से पॉलिथीन निकाल कर उसकी जान बचाई गई। इस घटना का व्यापक प्रचार-प्रसार भी किया गया ताकि जनसामान्य पॉलिथीन में पैक कर कोई भी खाद्य पदार्थ न फेंके। यदि उसे पशु खा लेता है तो समस्या हो जाएगी और बेजुबान पशु की मृत्यु हो जाएगी।

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हालांकि इस समस्या के साथ ही एक और समस्या भी विकराल रूप धारण कर रही थी, और वह थी सडक़ की नालियां-नाले का कूड़े में फेंके गए पॉलिथीन के कारण जाम होना, नदियों-तालाबों में फेंके गए प्लास्टिक-पॉलिथीन के कारण प्रदूषण बढऩा, जिसकी वजह से मछलियों व जलीय जन्तुओं का मरना। माननीय न्यायालय द्वारा विभिन्न अवसरों पर दिए गए निर्देशों से 20 माइक्रॉन से नीचे के पॉलिथीन को प्रतिबंधित किया गया था। इसके लिए शासनादेश जारी हुआ, परन्तु कतिपय कारणों से इसके अनुपालन में कड़ाई नहीं हुई और स्थिति भयावह होती गई। 15 जुलाई, 2018 को योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा 50 माइक्रॉन से पतली पॉलिथीन पर पूरे प्रदेश में प्रतिबंध लगाया गया था। अब तो अंतरराष्‍ट्रीय स्तर पर भी एक बार इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक के प्रयोग को रोके जाने के लिए आवाज उठ रही है।

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प्लास्टिक के द्वारा होने वाले प्रदूषण का असर मानव जाति पर भी पड़ रहा है। माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार स्वतंत्रता दिवस पर आह्वान किया कि महात्मा गांधी की 150वीं जन्मतिथि पर सम्पूर्ण भारत में 2 अक्टूबर, 2019 से एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक पर पूर्ण रूप से रोक लगाई जाएगी। 11 सितम्बर, 2019 को पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय मथुरा से उन्होंने इसकी घोषणा भी कर दी है। अब प्रश्न उठता है कि प्लास्टिक और पॉलिथीन है क्या? यह पॉलीमेरिक या बहुभाजीय बहूलक कृत्रिम या अर्ध कृत्रिम कार्बनिक यौगिक है, जो पूर्णतया लचीला, नरम, खिंचने वाला होता है, जिसे प्लास्टिक कहते हैं। पॉलिथीन या पॉलीइथिलीन प्लास्टिक का एक सामान्य रूप है। इसका आविष्कार 1907 में न्यूयार्क में हुआ, जिसके आविष्कारक वैज्ञानिक लियो बैकलैंड ने इसका नाम प्लास्टिक रखा। इसमें हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, सल्फर, नाइट्रोजन आदि तत्व होते हैं। विश्व में लगभग 320 मिलियन टन से अधिक प्लास्टिक प्रतिवर्ष उत्पादित होता है। इसमें से लगभग 7 मिलियन टन प्लास्टिक प्रतिवर्ष समुद्र में फेंका जाता है। भारतवर्ष में 11 किग्रा प्लास्टिक की खपत प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष है। अपने देश में 1.70 करोड़ टन से अधिक सिंगिल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है। लगभग 25,940 टन प्लास्टिक प्रतिदिन कचरे में फेंका जाता है। इस कचरे के प्लास्टिक का 60 प्रतिशत ही रिसाइकिल हो रहा है। यह पाया गया है कि लगभग 6 लाख टन प्लास्टिक भारतीय समुद्रों में, नदियों नालों के माध्यम से जाकर प्रदूषण फैलाता है। भारत में 2.18 लाख टन से अधिक प्लास्टिक विदेशों से आयात होता है।

क्या है सिंगल यूज प्लास्टिक?

सिंगल यूज प्लास्टिक ऐसा प्लास्टिक है, जिसका उपयोग हम केवल एक बार करते हैं। एक बार इस्तेमाल करने के बाद उन्हेंफेंक दी जाने वाली प्लास्टिक ही सिंगल-यूज प्लास्टिक कहलाती है। हम लोग इसे डिस्पोजेबल प्लास्टिक भी कहते हैं। दरअसल, प्लास्टिक की 11 से अधिक किस्में होती है। इनमें पॉली एमाइड, पॉलीकार्बोनेट, पॉलीइस्टर, आदि हैं, लेकिन जो सामान्यत: सिंगल यूज प्लास्टिक है, उसमें पैकेजिंग मैटेरियल, डिस्पोजल पानी की बोतल, स्ट्रा, प्लेट, कप, थर्मोकोल, पॉलिथीन बैग, दूध के पैकेट आदि आते हैं। ये सस्ता पॉलिथीन के अंतर्गत हाईडेंसिटी पॉलिथीन, लो डेंसिटी पॉलिथीन, पॉलीथिलीन टेरिप्थेलेट,  पॉली प्रोप्लीन, पॉलीइस्ट्रीन आदि से बनते हैं। वेसे यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि प्लास्टिक से बनी वस्तुएं हमारे इर्द-गिर्द, दैनिक आवश्यकता में रच-बस गई हें। घर के पेंट से लेकर हवाई जहाज व राकेट में भी प्लास्टिक का इसके लाभकारी गुणों के कारण इस्तेमाल हो रहा है।

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क्या हैं नुकसान?

सिंगल यूज प्लास्टिक जिसे एक बार प्रयोग कर कचरे में फेंक दिया जाता है, वह निश्चित ही पर्यावरण के लिए, मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य, मिट्टी के स्वास्थ्य, पेड़-पौधों, जलीय जंतुओं आदि के लिए बहुत नुकसानदायक है। विश्व में मौसम परिवर्तन में प्रतिवर्ष 850 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन इसी पॉलिथीन कचरे का कारण हो है। पॉलिथीन से निकले बिस्फिनॉल ए, विषज तत्व के कारण मनुष्यों में हाइपोथाइराडिज्म, प्रजनन शक्ति की कमी, त्वचा के रोग, कैंसर आदि की आशंकाएं बढ़ जाती हैं। यूरोप, कनाडा, अमेरिका में अब बच्चों के खिलौनों में इस्तेमाल होने वाले डीईएचपीडाई, थैलेट और बी.जी.जेड.पी. (बेन्जिल ब्यूटाइल थैलेट) आदि प्लास्टिक पर रोक लगा दी गई है।


आमतौर पर पॉलिथीन के कचरे को गड्ढे आदि भरने के काम में लाया जाता है, परंतु इसके कारण भूमि में जल संग्रहण की क्षमता समाप्त होती है। इसके कारण जाइलीन, टालूइन, बेंजीन, इथाइल, ट्राइमिथाइल बेंजीन आदि तत्व निकल कर मृदा को खराब करते हैं और वायु में मिलकर उसे प्रदूषित करते हैं। इन तत्वों के साथ बिस्फिनॉल-ए भी भूमि के अंदर पानी के माध्यम से जाकर भूजल को भी प्रदूषित करता है। पॉलिथीन नॉन बायोडिबिल होने के कारण 500 से 1000 वर्षों में समाप्त होता है, परंतु इसके अतिन्यून कण विषज रसायनों के साथ पानी के माध्यम से जीव-जंतु, यहां तक कि पेड़-पौधों को भी प्रभावित करते हैं। जलीय जन्तुओं मछली आदि में इसके कणों की उपस्थिति यह दर्शाती है।

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यहां यह भी उल्लेख करना आवश्यक है कि भारत में इस उद्योग में तीव्र प्रगति हो रही है। इस उद्योग में लगभग एक करोड़ लोगों को रोजगार उपलब्ध है। इस उद्योग से डेढ़ लाख करोड़ रुपये प्रतिवर्ष आय हो रही है। भारत में 150 से अधिक बड़ी औद्योगिक इकाइयां और 20,000 से अधिक छोटी इकाइयां हैं। देश की जीडीपी में प्लास्टिक की 8 प्रतिशत से अधिक की भागीदारी है। ऐसी स्थिति में इस उद्योग पर प्रतिबंध न लगाते हुए वैकल्पिक व्यवस्था पर भी वैज्ञानिक ध्यान दें। जैसा भारत सरकार द्वारा निर्णय लिया गया कि सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध हो, वह निश्चय ही पर्यावरण सुधार की दिशा में सही कदम होगा। ऐसा होने पर ही प्लास्टिक से पर्यावरण पर हो रहे हानिकारक प्रभाव को कम किया जा सकेगा और ‘कचरे से उत्तम’ (वेस्ट टू बेस्ट) की धारणा साकार होगी।

कैसे कम करें उपयोग?

  • स्ट्रा, पॉलीथिन बैग, पानी की डिस्पोजेबल बोतल, ग्लास, प्लेट, थर्मोकोल की डिस्पोजेबल थालियां, पैकिंग मैटीरियल, दूध आदि के पॉलीपैक आदि पर रोक और इसे कचरे में न डालें।
  • प्लास्टिक कचरे की रिसाइकिलिंग
  • प्लास्टिक कचरे का उपयोग ईंधन व सडक़ बनाने में
  • पैकेजिंग में कार्डबोर्ड व पुआल का प्रयोग
  • बाजार से सामान लाने के लिए कपड़े या जूट के थैलों का इस्तेमाल
  • पानी पीने व चाय आदि के उपयोग के लिये मिट्टी के पात्र व कुल्हड़
  • प्लास्टिक के गमलों के स्थान पर मिट्टी व गोबर मिश्रित गमलों का प्रयोग
  • प्लास्टिक को न जलाएं क्योंकि इसको 600 डिग्री सेंटीग्रेट से कम पर जलाने पर डायऑक्सिन, फ्यूरान मीथेन गैस निकलती है, जो पर्यावरण को प्रदूषित करती है।
  • प्लास्टिक जो कचरे के रूप में है, उसका प्रयोग सीमेंट फैक्ट्री मे हो सकता है, जहां 800 सेंटीग्रेड तापमान की आवश्यकता होती है। इससे 1 कि.ग्रा. प्लास्टिक से 3 कि.ग्रा. कोयले की बचत होगी।
Web Title: Death of cattle due to polythene newstimes special story ( Hindi News From Newstimes)


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