राम की वापसी और अयोध्या का पुनर्वास, पढ़ें पूरी स्टोरी


NP1357 03/12/2019 17:22:02
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प्रो. गिरीश्वर मिश्र
शिक्षाविद् 
पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विवि, वर्धा

प्रसिद्ध सूफी संत रूमी ने कहा है -
इल्म रा बर दिल जऩी यारी बुवद।
इल्म रा बर तन जऩी मारी बुवद।।
अर्थात् ज्ञान को यदि हृदय में समाहित करोगे तो वह तुम्हारा मित्र हो जाएगा, लेकिन उसी को यदि केवल शरीर पर चिपका कर रखोगे तो वह किसी साँप की तरह घातक हो जाएगा।  

अयोध्या के पुराने मामले में भारत के उच्चतम न्यायालय का ताजा ऐतिहासिक निर्णय आने के बाद आज जन-जन में और विशेषत: रामभक्तों और संत-समाज में प्रसन्नता व्याप्त है। मंदिर के निर्माण के साथ बहुतों का गहरा लगाव हो चुका है, जो लोक-मानस में ‘अयोध्या’ के साथ भगवान राम के अभिन्न सम्बन्ध के कारण बड़ा ही स्वाभाविक है। हालांकि तथ्य यह भी है कि घट-घट व्यापी और अंतर्यामी हमारे राम निश्चय ही एक मंदिर में नहीं समा सकते, मंदिर चाहे जितना विशाल और भव्य क्यों न हो। अंतिम विश्लेषण में  प्रत्येक मंदिर (या कोई मानव रचना) रहता है तो सिर्फ एक प्रतीक या चिह्न मात्र ही। कोई भी मानवीय रचना स्वभावत: परिसीमित ही होगी, क्योंकि वह तो ठहरी सिर्फ एक मूर्त प्रतीक या संकेत। यह जरूर है कि वह प्रतीक परमात्मा राम की और राम-भाव की अनुभूति का एक सिलसिला शुरू कर सकता है, जिसके सहारे हम खुद को राम जी की याद दिलाते रहते हैं और उनके प्रति अपने को बार-बार समर्पित करते रहते हैं ताकि जीवन में भटकाव न आए। इस अर्थ में मंदिर ही क्यों, पूरी अयोध्या नगरी ही राममय है! रामायण का आख्यान अखिल भारतीय स्तर पर अत्यंत लोकप्रिय है।

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भारत की सभी भाषाओं में मूल या परिवर्तित/संवर्धित रूप में सांवरे सलोने राम की कथा का अनुकीर्तन सदियों से होता चला आ रहा है। इस तरह राम राष्ट्रीय एकता की धुरी जैसे उपस्थित हैं। सदियों से भारतीय समाज की पीढ़ी-दर-पीढ़ी अब तक इसी स्मृति में डुबकियां लगाती रही है कि राम का जन्म अयोध्या में हुआ और बचपन भी यहीं बीता। उनके जीवन से जुड़े बहुत से ठांव-ठिकाने भी हमने बना रखे हैं, जैसे सीता की रसोई, हनुमान गढ़ी, और भी जाने क्या-क्या। पावन सरयू नदी यहीं बहती है। चैत महीने की रामनवमी को हमारे राम प्रति वर्ष जन्म लेते हैं और राम-जन्म की स्मृति फिर-फिर जीवंततर और पहले से और ज्यादा सुदृढ़ होती जाती है। अंतत: स्मृति ही सत्य को प्रमाणित करती है। 

स्मृति के अभाव में उस व्यक्ति (या समाज) के लिए सत्य के होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। आज भी अयोध्या नगरी के पास राम के स्मरण के अनेक प्रयोजन हैं और नाम के साथ रूप का जुड़ जाना प्रतीक को पूरी अर्थवत्ता और समग्रता प्रदान करता है। उल्लेखनीय है कि अयोध्या के पुरातात्विक उत्खनन से प्राप्त अवशेष और जानकारियां न केवल इस क्षेत्र की प्राचीनता पर ही प्रकाश डालती हैं, बल्कि यह भी बताती हैं कि वर्तमान ढांचा गहरे नीचे स्थित प्राचीन मंदिर की वास्तु-रचना को ध्वस्त कर ही बनाया गया था। इन सबसे अयोध्या की प्राचीन भारतीय परम्परा की पुष्टि होती नजर आती है।

मोक्षदायिनी सात नगरियों में अयोध्या भी

वेद, पुराण और रामायण में अयोध्या को पावन नगरी के रूप में कई तरह से स्मरण किया गया है। मोक्षदायिनी सात नगरियों में अयोध्या का नाम सबसे पहले आता है। जैन और बौद्ध सभी मतावलम्बियों के लिए पूजनीय धार्मिक स्थल के रूप में भी अयोध्या की बड़ी लंबी परम्परा के प्रमाण  उपलब्ध हैं। भारत के बाहर थाईलैंड में भी एक ‘अजुध्या’ है। कुछ वर्ष पूर्व जब मेरा इंडोनेशिया जाना हुआ था तो वहां भी योग्यकार्ता नगर और परम्बनम परिसर में रामायण और रम्मलीला की परम्परा जीवित मिली। अयोध्या वहां भी जगी थी। वहां कई इस्लाम मानने वालों के नाम अब भी भारतीय ध्वनि लिये हुए मिलते हैं। भारतीय इतिहास के मर्मज्ञ कोसल जनपद और अयोध्या को स्कंदगुप्त, कनिष्क और जाने किन-किन ग्रीक योद्धाओं और राजाओं से जोड़ते हैं। पुरातात्विक उत्खनन ने भी भूले-बिसरे तमाम अवशेषों और चिह्नों को जुटा कर जो चित्र खीचे हैं, उनसे और उपलब्ध पुराने विवरणों से यही पता चलता है कि यह नगरी सुदीर्घ काल से व्यापार, राजनीति और धर्म की गतिविधियों का एक सक्रिय केंद्र बनी रही।

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सीय राम मय सब जग जानी...

परंतु अयोध्या का सबसे अलग और सबसे प्रखर रूप उस अयोध्या का है, जो मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के नाम और जीवन से जुड़ी है, उनके कार्य से जुड़ी है और पूरे भारत की सामाजिक स्मृति का एक अखंड हिस्सा है। भारत का आम आदमी जिससे लोक का निर्माण होता है , जो ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं है, जिसे नई हवा नहीं लगी है, वह राम को अपने बड़े नजदीक पाता है। तुलसीदास और कम्बन जैसे रामभक्त महाकवियों ने जिस सकल राम को लोक के हृदय में प्रतिष्ठित कर दिया है, वह अपने ही ढंग के धीर, वीर और भक्त-वत्सल हैं। ये राम एक व्यक्ति, विचार और आदर्श के रूप में सब के हृदय में बसे हुए हैं। उनका रामराज्य शासन की उस संकल्पना का खाका पेश करता है, जिसमें दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों तरह के ताप अर्थात् कष्ट नहीं होते हैं। राम को भजना, राममय होना आत्म के विस्तार और समष्टि के लिए समर्पण मांगता है। संत कबीर, गोस्वामी तुलसीदास और महात्मा गांधी जैसे महापुरुष अपने-अपने ढंग से ऐसे ही व्यापक राम की आराधना करते हैं। तभी ‘सीय राम मय सब जग जानी, करहु प्रनाम जोरि जुग पानी’ की कृतार्थता भी सिद्ध होती है। 

कठोर साधनामय जीवन की प्रतीति कराते हैं राम 

अयोध्या के बहाने राम का स्मरण हमें आज के जटिल होते जीवन के ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर बिना घबराए धैर्य के साथ चलने की राह दिखाता है। महानायक रामचंद्र्र जी की जगद्विदित कथा यही बताती है कि विष्णु के इस अवतार ने दिखाया कि मनुष्य जीवन एक सतत् परीक्षा की शृंखला है। लगता है मनुष्य का जन्म संघर्षों से टकराने के लिए ही होता है। रामचंद्र्र जी का तो निर्माण जरूर इसी उद्देश्य से हुआ था। किशोर वय से लेकर जो उनकी परीक्षा शुरू हुई तो बिना रुके वह युवावस्था और प्रौढ़ जीवन में भी अविराम चलती रही। राजघराने का वैभव और सुख से परे जंगलों की खाक छानते फिरना, मायावी असुरों और राक्षसों से लडऩा-भिडऩा कुछ इस तरह चलता रहा कि उनके जीवन का एक बड़ा कालखंड इसी में खप गया। समाज की कसौटी पर खरे उतरने की चुनौती, अपने वचन की रक्षा की प्रतिज्ञा, गुरुजनों की सेवा और प्रजा-वत्सलता आदि सभी दायित्वों के प्रति रामचंद्र जी जीवन भर सतर्क और सक्रिय बने रहे।

इन सब उलझनों की परिणति प्रिय पतिव्रता पत्नी सीता के परित्याग में होती है। वे दंश झेलते हैं। यह पीड़ा भरा दुर्योग भी बना कि उनके जैसे पराक्रमी राजा के दो पुत्र, लव और कुश, जंगल में तृण-मूल की आसन-वसन की व्यवस्था के बीच तपोवन में जन्म लेते हैं। कहने का अभिप्राय यह कि राम एक कठोर साधनामय जीवन की प्रतीति कराते हैं, जिसमें अस्थिरता है और घटनाएं तरह-तरह के मोड़ लेती चलती हैं। ऐसे मोड़ भी जिनके बारे में पहले सोचा भी न गया था। लगता है तपस्वी राम खुद के लिए बने ही नहीं हैं। उनका पूरा का पूरा जीवन जगत के हित के लिए समर्पित हैऔर सबका साथ लेने वाले समष्टि भाव से अनुप्राणित उनकी  यात्रा में नर, वानर, कोल, किरात सभी का उदारतापूर्वक समावेश भी है।

अकारण नहीं है राम की अयोध्या वापसी 

आज रामलला की दिव्य मूर्ति के एक भव्य मंदिर में प्रतिष्ठित होने को लेकर सब में उत्साह है और इसके लिए सबकी सहमति बनती भी दिख रही है। यह निश्चय ही देश के लिए एक शुभ लक्षण है। पूरे माहौल को देख आज आम आदमी को यही लग रहा है कि कलियुग में लम्बे वनवास की अवधि बीतने के बाद अयोध्यापति रामचंद्र जी का अयोध्या में पधारना हो रहा है। सचमुच बड़े पुण्य से आज अयोध्या फिर से पुनर्जीवित हो रही है और इसी के साथ यह आशा भी बलवती हो रही है कि भारत में राम-राज्य की स्थापना की दिशा में हम आगे बढ़ सकेंगे और सुशासन के अच्छे दिन का दौर आ सकेगा। यह भी एक सुखद संयोग ही है कि इस वर्ष जन-हृदय सम्राट महात्मा गांधी की डेढ़ सौंवी जन्मशती मनाई जा रही है, जो जीवन भर लोक और राम दोनों के प्रति समर्पित रहे। अत: राम की अयोध्या वापसी निश्चय ही अकारण नहीं है।

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यह घटना शुद्ध भौतिक घटना मात्र नहीं है। इसमें काल-देवता का संदेश भी निहित है कि राम हमारे पाथेय हैं और उनके मार्ग पर चल कर ही हम आगे बढ़ सकते हैं। राम जो सारे रिश्ते निभाते हैं, पर कभी न्याय-पथ से विचलित नहीं होते। वे कृपा-निधान हैं, दीन-दयाल हैं पर दुष्टों का दलन भी करते हैं। हम सबके लिए अयोध्या में श्रीराम के पधारने का एक ही आशय है - समष्टि चित्त का आदर और लोक-हित की साधना के मार्ग का प्रशस्त होना। आखिर जन-मन के मंदिर में भगवान राम की प्रतिष्ठा तो इसी से हो सकेगी। 

सदियों पुराने वाद के सौहार्दपूर्ण निराकरण के प्रयास से इसकी शुरुआत हो चुकी है। अयोध्या नगरी में पर्यटन की संभावना देखी जा रही है। जरूरी है कि वह विचार और नैतिक मूल्यों के लिए प्रेरणा का केंद्र बने। आशा है हमारे जन प्रतिनिधि निहित स्वार्थों से ऊपर उठकर लोक-संग्रह की ओर ध्यान देंगे, तभी भारत के गौरव की पुनर्स्थापना हो सकेगी।

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Web Title: Return of Ram and rehabilitation of Ayodhya ( Hindi News From Newstimes)


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