अयोध्या के विकास को ऐसे मिलेगी नई गति, पढ़ें पूरी रिपोर्ट 


NP1357 04/12/2019 17:35:29
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पिछली चार शताब्दी से अधिक अवधि में जब-तब पूरे देश के जनमानस को आंदोलित और उद्वेलित करते रहे रामजन्म भूमि के विवाद के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के पांच न्यायाधीशों ने 9 नवंबर, 2019 को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। उनके फैसले के बाद अब अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया है। अब सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं, वरन् देश के करोड़ों लोगों में यह उम्मीद करवट लेने लगी है कि जन-मन के आस्था के प्रमुख केंद्र भगवान श्रीराम अपनी जन्मभूमि पर बनने वाले विशाल मंदिर में भव्यता के साथ सपरिवार विराजमान होंगे। लोगों को यह भी उम्मीद है कि अब रामनगरी अयोध्या के विकास की गति में भी पहले की तुलना में काफी तेजी आएगी। देश के ज्यादातर लोगों को यह भरोसा है कि इस विवाद और उससे उपजे तीखेपन को पीछे छोडक़र अब पूरे देश के सभी धर्मों के लोग शांति को गले लगाएंगे। इसके साथ ही अयोध्या के विकास की संभावनाओं और विविध आयामों को लेकर पूरे देश में वैचारिक विनिमय, बहस, चिंतन और मनन की प्रक्रिया तेज हो गई है। अयोध्या के विकास का लाभ अब आसपास के दूसरों पड़ोसी जिलों को मिलने की संभावना भी प्रबल हो गई है।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में अयोध्या की विवादित भूमि का कब्जा सरकारी ट्रस्ट को राम मंदिर बनाने के लिए दे दिया गया है। इस मामले में वादी भगवान रामचंद्र के बालस्वरूप रामलला को 2.77 एकड़ जमीन का मालिकाना हक दिया गया है। अयोध्या में ही प्रमुख स्थान पर मस्जिद के लिए भी जमीन आवंटित करने को कहा गया है। अयोध्या विवाद पर रामलला के हक में फैसला आने के बाद उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप केंद्र सरकार की ओर से ट्रस्ट के गठन की प्रक्रिया भी अंदरूनी हलकों में शुरू हो गई। ट्रस्ट का स्वरूप कैसा हो, इस बात को लेकर भी अयोध्या ही नहीं अपितु पूरे देश के संत एवं साधु समाज और राजनीतिक दलों में बहस शुरू हो गई। राम जन्मभूमि आंदोलन को लेकर पूरे देश में दशकों तक आंदोलन चलाने वाले श्रीराम जन्म भूमि न्यास और विश्व हिन्दू परिषद के पदाधिकारी भी मर्यादा पुरुषोत्तम की जन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण कराने की संभावित रणनीति पर विचार प्रकट करने लगे हैं। 

मंदिर की नींव में होगा ढाई लाख रामशिलाओं का इस्तेमाल

मीडिया में आ रही रिपोर्ट के अनुसार, श्रीराम जन्मभूमि न्यास और विहिप के साथ विराजमान रामलला के सखा ने तय किया है कि पूर्व में देशवासियों की ओर से पूजी गई ढाई लाख रामशिलाओं का उपयोग मंदिर की नींव का निर्माण करने में किया जाएगा। बता दें कि तमाम सियासी विरोध और प्रशासन के कड़े तेवर के बावजूद श्रीराम जन्मभूमि न्यास और विहिप की ओर से छेड़े गए विशेष आंदोलन के दौरान 9 नवंबर सन् 1989 को श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास किया गया था। इसके ठीक एक दिन पहले विहिप के आह्वान पर देश के विभिन्न राज्यों के गांव-गांव से करीब तीन लाख शिलाओं का पूजन कर उन्हें अयोध्या पहुंचाया गया था। इनमें से लगभग 50 हजार शिलाओं का उपयोग तब के शिलान्यास में किया गया था। शिलान्यास के वक्त अयोध्या में विराजमान रामलला के समीप ही मंदिर के चबूतरे का निर्माण किया गया था। यह चबूतरा आज भी जन्मभूमि पर विद्यमान है। सन् 1989 के उस आंदोलन के दौरान केवल भारत के विविध राज्यों से ही नहीं, बल्कि सूरीनाम, जापान, चीन, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका और बर्मा समेत दुनिया के कई देशों से हिन्दू जनमानस की ओर पूजित शिलाएं अयोध्या लाई गई थीं। उस समय करीब ढाई लाख शिलाएं बच गई थीं, जो आज भी श्रीराम जन्मभूमि कार्यशाला में रखी हुई हैं। 

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ट्रस्ट के लिए कई प्रस्ताव

जानकारों के मुताबिक, श्रीराम जन्म भूमि न्यास और विश्व हिन्दू परिषद के शीर्ष नेतृत्व के साथ विराजमान रामलला के सखा ने यह तय किया है कि केंद्र सरकार की ओर से गठित होने वाले ट्रस्ट के समक्ष दो अहम प्रस्ताव रखे जाएंगे। पहला यह कि न्यास और विहिप के प्रस्तावित मॉडल के अनुसार ही राम मंदिर का निर्माण किया जाए। दूसरा प्रस्ताव यह कि श्रीराम मंदिर के भूतल के लिए तराश कर रखे गए पत्थरों और स्तंभों से ही मंदिर बने। जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, वर्तमान में श्रीराम जन्मभूमि में रामलला से संबंधित सभी संपत्तियां इस नए राम मंदिर ट्रस्ट को हस्तांतरित की जाएंगी। 

रामलला को चढ़ावे के रूप में मिले करीब 10 करोड़ रुपये भी ट्रस्ट के हिस्से में आएंगे। ये रकम अयोध्या के मंडलायुक्त के खाते में जमा है। इस संबंध में केंद्र सरकार को रिपोर्ट भेज दी गई है। पहले रामलला पर चढ़ावे का पूरा हिसाब-किताब मंडलायुक्त के बैंक खाते से ही होता था। अब आगे नई व्यवस्था के अनुसार ट्रस्ट यह जिम्मेदारी निभाएगा। जानकारों के अनुसार, रामलला के मुख्य पुजारी को 13 हजार रुपये हर माह मिलते हैं। वहां तैनात चार अन्य पुजारियों को 8-8 हजार रुपये मासिक मानदेय दिया जाता है। इसके अलावा वहां कार्यरत 4 कर्मचारियों को बतौर मानदेय 6-6 हजार रुपये दिए जाते हैं। वहां राग-भोग के लिए हर महीने करीब 30 हजार रुपये मुहैया कराए जाते हैं। रामलला समेत अन्य विराजमान विग्रहों के वस्त्र आदि के लिए इस बार रामनवमी पर 51 हजार रुपये मिले थे। इसके पहले इस मद में 42 हजार ही मिलते थे।

जानकारों का मानना है कि अयोध्या में रामनवमी अर्थात् दो अप्रैल, 2020 से राम मंदिर का निर्माण कार्य शुरू होगा, जो 2022 तक पूरा हो सकता है। अब इस बात पर भी खूब चर्चा हो रही है कि नया ट्रस्ट बनाया जाए या फिर पुराने रामजन्म भूमि न्यास में ही नए सदस्य शामिल कर लिए जाएं? सूत्रों ने बताया है कि विश्व हिन्दू परिषद (वीएचपी) और बजरंग दल भी राम मंदिर ट्रस्ट का हिस्सा हो सकते हैं। हालांकि सदस्यों को लेकर आखिरी फैसला प्रधानमंत्री कार्यालय ही करेगा। 

जानकार सूत्रों के अनुसार, वीएचपी का मानना है कि राम मंदिर का निर्माण सरकारी पैसे की बजाय जनता के चंदे से होना चाहिए। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कानून, गृह मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय के अधिकारियों से सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अध्ययन करने और प्रस्तावित ट्रस्ट के तौर-तरीकों पर जल्द से जल्द काम करने को कह चुके हैं। इस बीच ट्रस्ट में जगह पाने को लेकर संतों और कई हिंदू संगठनों के बीच होड़ शुरू हो गई है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती ट्रस्ट गठन करने को लेकर है। अयोध्या जमीन अधिग्रहण एक्ट 1993 के तहत ट्रस्ट का गठन होगा। 

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अयोध्या के भावी ट्रस्ट के रूप-रंग के साथ उसके सदस्यों के नामों की चर्चाएं जोरों से होने लगी हैं। इसमें केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मनोनीत लोगों के रहने का अनुमान है। साथ ही धार्मिक नेताओं के शामिल होने की बात को भी खारिज नहीं किया जा सकता है। गैर सरकारी मनोनीत नामों के बारे में कयास लगाने का दौर शुरू हो चुका है। राम मंदिर आंदोलन को इस मुकाम तक लाने में अहम भूमिका निभाने वाले संगठन विश्व हिन्दू परिषद का मानना है कि ट्रस्ट को राम मंदिर के निर्माण में भक्तों की सांकेतिक भागीदारी में मदद करनी चाहिए। परिषद चाहती है कि गृहमंत्री अमित शाह और उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसके सदस्य बनें।

रामजन्मभूमि न्यास के प्रमुख महंत नृत्य गोपालदास का कहना है कि गोरखनाथ मंदिर के महंत की हैसियत से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ट्रस्ट का नेतृत्व करना चाहिए। फैसले के बाद उनका यह बयान भी चर्चा के केंद्र में रहा, जिसमें उन्होंने कहा कि नए ट्रस्ट की कोई जरूरत नहीं है। राम मंदिर के लिए न्यास पहले से ही एक ट्रस्ट के रूप में काम कर रहा है। निर्मोही अखाड़ा सहित अन्य को इसमें शामिल किया जा सकता है। हालांकि अखाड़ा सदस्यों का मत इससे प्रतिकूल है। उनका कहना है कि रामजन्मभूमि न्यास के खिलाफ हम लड़ रहे हैं। उनके ट्रस्ट का सदस्य हम कैसे बन सकते हैं? वे अपने ट्रस्ट को भंग करके हमारे साथ ट्रस्ट में सहभागी बन सकते हैं। 

सोमनाथ की तर्ज पर ट्रस्ट 

इस बात को लेकर भी चर्चा चल रही है कि राम मंदिर ट्रस्ट का स्वरूप देश के किन मंदिरों के ट्रस्ट जैसा हो। इनमें सोमनाथ मंदिर, अमरनाथ श्राइन बोर्ड या माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के ट्रस्ट का उल्लेख भी किया जा रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, राम मंदिर ट्रस्ट का मॉडल सोमनाथ मंदिर के अनुरूप हो सकता है। यदि ऐसा हुआ तो आइए जानते हैं कैसे काम करेगा यह ट्रस्ट? श्री सोमनाथ ट्रस्ट एक धार्मिक चैरिटेबल ट्रस्ट है जिसका पंजीकरण गुजरात पब्लिक ट्रस्ट एक्ट, 1950 के तहत हुआ है। वर्तमान में इसके सात सदस्य हैं। गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल इसके चेयरमैन हैं। 

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पीएम नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और गुजरात के पूर्व प्रमुख सचिव प्रवीण लाहेरी इसके सदस्य हैं। कोलकाता के नेवतिया समूह के चेयरमैन हर्षवर्धन नेवतिया और वेरावल से संस्कृत के सेवानिवृत्त प्रोफेसर जेडी परमार इसके सदस्य हैं। बोर्ड की सदस्यता आजीवन है। केंद्र और राज्य सरकारें प्रत्येक चार-चार सदस्यों को मनोनीत कर सकती हैं। आमतौर पर ट्रस्टी मंडल संभावित उम्मीदवारों की एक सूची तैयार करता है और रिक्तियां इसी सूची से भरी जाती हैं। एक साल में चार बार ट्रस्टी बोर्ड की मीटिंग होती है। 

इस ट्रस्ट को सन् 2018 में 42 करोड़ रुपये चढ़ावे, दान और किराये के रूप में मिले। ट्रस्ट के पास कई गेस्ट हाउस भी हैं। 2017 के दौरान इस मद में ट्रस्ट को 39 करोड़ रुपये की कमाई हुई थी। पिछले दो साल के दौरान गुजरात सरकार ने मंदिर परिसर में सुविधाओं के विकास में 31.47 करोड़ रुपये खर्च किए। ट्रस्ट आंगनवाड़ी बच्चों को पौष्टिïक भोजन मुहैया कराता है, बेरोजगारों को हुनरमंद बनाता है और पांच दिनी कार्तिकी पूनम मेला का आयोजन भी करता है।

जन्मभूमि आंदोलन से बढ़ा भाजपा का जनाधार 
 
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अयोध्या में श्रीराम के जन्म स्थान पर मंदिर निर्माण की मंाग को लेकर देश में विश्व हिंदू परिषद और दूसरे सहयोगी संगठनों ने जो आंदोलन शुरू किया, उसका एक राजनीतिक दल के रूप में भारतीय जनता पार्टी ने खुलकर समर्थन किया। यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं कि पहले भारतीय जनसंघ और बाद में भारतीय पार्टी के जनसमर्थन के विस्तार में श्रीराम जन्मभूमि को लेकर छेड़ा गया आंदोलन एक बड़ा कारण बना। भारतीय जनता पार्टी के कुछ बड़े चेहरों के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। राम जन्मभूमि आंदोलन को पूरे भारत और संसार में विस्तारित और प्रचारित करने वालों में भाजपा के भीष्म पितामह लालकृष्ण आडवाणी सबसे प्रमुख रहे। 

हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी इस आंदोलन को धार दी लेकिन वे भाजपा के नरम चेहरे के रूप में ही जाने गए। शुरुआत में इस आंदोलन में सहभागिता को लेकर उनके मन में कुछ हिचक रही लेकिन लालकृष्ण आडवाणी ने जब सन् 1989 में पूरे देश में रथयात्रा निकाली तो जनता की ओर से मिली प्रतिक्रियाओं ने उनका मानस बदला। उनके अलावा भाजपा के पूर्व अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी, विश्व हिन्दू परिषद के अशोक सिंहल, महंत नृत्य गोपाल दास, भाजपा नेता उमा भारती, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, विनय कटियार, कोठारी बंधु और राम विलास वेदांती सहित अन्य कई लोगों का भी अहम योगदान रहा। 

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पड़ोसी जिलों को भी मिलेगा लाभ

अयोध्या जिले का कुल क्षेत्रफल 2522 वर्ग किमी. है। इसमें 2459.88 वर्ग किमी. में ग्रामीण और 62.12 वर्ग किमी. में नगरीय क्षेत्र है। जिले की कुल जनसंख्या 24,70,996 है। जिले में कुल पांच विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र और एक लोकसभा क्षेत्र है। फैजाबाद लोकसभा सीट और अयोध्या, बीकापुर, गोसाईगंज, मिल्कीपुर और रुदौली विधानसभा क्षेत्र हैं। अयोध्या के विकास कार्यों की चमक से उसके पड़ोसी जिलों बस्ती, गोण्डा, अंबेडकर नगर, सुल्तानपुर, अमेठी और बाराबंकी जिलों के लोगों को भी पूरा लाभ मिलने की संभावना है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अयोध्या के विकास के लिए पहले से एक के बाद एक कई योजनाओं का ऐलान कर रखा है। इनमें सबसे प्रमुख है अंतरराष्टï्रीय हवाई अड्डे का निर्माण। इसके अलावा दुनिया की सबसे ऊंची भगवान श्रीराम की मूर्ति बनाने की योजना भी प्रस्तावित है। 

अयोध्या में भगवान श्रीराम की लगने वाली प्रतिमा की ऊंचाई 251 मीटर तक हो सकती है। सरयू के किनारे 100 हेक्टेयर क्षेत्र में यह प्रतिमा लगाई जाएगी। यह विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा होगी। सरकार की ओर से इस प्रतिमा के साथ-साथ अयोध्या के समग्र विकास के लिए पूरी योजना तैयार की जा रही है। इसमें भगवान श्रीराम पर आधारित डिजिटल म्यूजियम, इंटरप्रेटेशन सेंटर, लाइब्रेरी, पार्किंग, फूड प्लाजा, लैंडस्केपिंग के साथ साथ पर्यटकों के मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था बनाई जानी है। प्रस्तावित म्यूजियम में सप्तपुरियों में अयोध्या का इतिहास, इक्ष्वाकु वंश के इतिहास में राजा मनु से लेकर वर्तमान में श्रीराम जन्मभूमि तक का इतिहास, भगवान विष्णु के समस्त अवतारों का विवरण, भारत के सभी सनातन धर्मों के विषय में आधुनिकतम तकनीक पर प्रदर्शन की व्यवस्था होगी। भगवान राम की विशाल इस प्रतिमा को यहां स्थापित करने के लिए गुजरात से तकनीकी सहायता व मार्गदर्शन लिया जाएगा।

अयोध्या का होगा कायाकल्प

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अयोध्या को त्रेतायुग जैसी भव्यता प्रदान करने की दिशा में ठोस कदमों पर विचार मंथन शुरू कर दिया है। केंद्र की मंशा के अनुसार प्रदेश सरकार नई अयोध्या का सपना साकार करने की तैयारी में जुट गई है। प्रदेश की योगी सरकार ने अब अयोध्या को वैष्णो देवी और तिरुपति बाला से भी ज्यादा आधुनिक व सुविधायुक्त बनाने की दिशा में प्रयास शुरू कर दिए हैं। अयोध्या में प्रस्तावित श्रीराम एयरपोर्ट को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देने के साथ सरयू में क्रूज, आधुनिक बस अड्डा, अंतरराष्ट्रीय स्तर के होटल-रिजॉट्र्स के साथ प्रभु राम से जुड़े स्थलों को वाया प्रयागराज-चित्रकूट से लेकर रामेश्वरम और लंका तक श्रद्धालुओं को दर्शन-पूजन और अध्यात्म से जोडऩे की योजना पर काम शुरू हो रहा है। 

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अयोध्या में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए सबसे पहले रेल मार्ग और सडक़ मार्ग को सुचारु बनानेे की व्यवस्था की जाएगी। अयोध्या में देश का सर्वोत्तम रेलवे स्टेशन बनाए जाने की भी योजना है। राम की नगरी अयोध्या में नगर निगम का विस्तार भी होगा। आसपास के 41 गांवों को भी अयोध्या नगर निगम में शामिल किया जाएगा। इन गांवों को शहर की तमाम सुविधाएं देने के साथ विकास का सिलसिला तेज किया जाएगा। इसके लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया है। प्रस्ताव के मुताबिक, नगर निगम में मेडिकल कॉलेज, अंबेडकर स्टेडियम भी बनाया जाएगा। 

अयोध्या का पडो़सी जिला बस्ती कभी ‘मख क्षेत्र’ के रूप में प्रख्यात रहा। बस्ती जिले के परशुरामपुर ब्लॉक क्षेत्र में मखौड़ाधाम स्थित है। इसी मखौड़ा धाम अथवा मखभूमि में ही राजा दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ का कार्य संपादित किया था। कुलगुरु वशिष्ठ की देखरेख और श्रृंगी ऋषि के निर्देशन में महाराजा दशरथ ने इसी स्थान पर विधि-विधान से यज्ञ कराया था। आज भी यह मंदिर करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। इस अनूठे मंदिर में भगवान राम पूरे परिवार सहित विराजमान हैं। यहां प्रतिवर्ष चैत्र मास की पूर्णिमा पर मेला लगता है।

इस मेले में बस्ती और आसपास ही नहीं, प्रदेश के विभिन्न कोनों से लोग आते हैं। ऐसा कहा जाता है कि ऋषि श्रृंगी के आह्वान पर सरयू नदी की धार भी अपना रास्ता बदलकर वहां आ पहुंचीं। उनके पावन जल से ही पुत्रेष्टिï यज्ञ संपन्न कराया गया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब लोगों में यह भरोसा जगा है कि जब अयोध्या का विकास होगा तो वहां देश और दुनिया से आने वाले पर्यटकों की तादाद भी बढ़ेगी। ऐसे में कारोबार और व्यापार का माहौल भी पहले से बेहतर होगा।

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Web Title: Ayodhya's development will get such new momentum ( Hindi News From Newstimes)


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