नए साल में यूपी की जनता की ढेरों अपेक्षाएं, सरकार के लिए चुनौतियां, पढ़ें पूरी रिपोर्ट 


NP1357 31/12/2019 15:01:26
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साल अंत आते देख सभी हाथ मलते हुए कहते हैं, अरे! यह साल बीत गया। फिर शुरू हो जाता है पूरे वर्ष की सफलताओं और विफलताओं की समीक्षा का दौर। ऐसे में अतीत के पन्ने पलटने पर ऐसी घटनाओं की टीस उभरती है जिन पर हमारा वश नहीं चलता। इसके बावजूद जीवन की ज्यादातर स्थितियां ऐसी होती हैं, जिन्हें हम आसानी से अपने अनुकूल बना सकते हैं, इसलिए साल के अंत में नववर्ष को खुशहाल बनाने के लिए संभावनाओं, मानकों और चुनौतियों की समीक्षा करते हैं। पुरानी गलतियों को टटोला जाता है और उन्हें न दोहराने का संकल्प लिया जाता है। ...तो नए साल को खुशामदीद करने और बीते साल को अलविदा कहने के साथ प्रदेश सरकार की उपलब्धियों और विफलताओं पर एक नजर डालते हैं। देखते हैं, आखिर बीता साल प्रदेश सरकार के लिए कैसा रहा और आने वाले साल में सरकार से जनता को क्या अपेक्षाएं हैं।

यूपी में कानून-व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती 

उत्तर प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में देखें तो वर्ष 2019 में तमाम मुददे चर्चा में रहे। योगी सरकार नई दिशा-दशा देने के वादे के साथ सत्ता में आई थी। अब उसके कार्यकाल का आधे से कम सफर बचा है। वर्ष 2019 राज्य सरकार की छवि को आघात पहुंचाने वाले ऐसे कई प्रसंग-मुद्दे छोड़ गया है। इनमें कानून व्यवस्था का मुद्दा सबसे ज्यादा छाया रहा है। हालांकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपराध पर लगाम के लिए एनकाउंटर का भय पैदा कर दहशतगर्दी के माहौल पर काफी हद तक काबू पाया है। लगभग तीन हजार अपराधियों के एनकाउंटर के दावे किए जा रहे हैं। इसे सरकार अपनी उपलब्धि बता रही है लेकिन एनकाउंटर को लेकर सरकार को घेरा भी जा रहा है। झांसी और गाजियाबाद एनकाउंटर को लेकर योगी सरकार और पुलिस पर सवाल खड़े किए गए। 

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उधर, हत्या व रेप जैसी कई अन्य सनसनीखेज वारदातों ने भी राज्य सरकार की साफ-सुथरी छवि को नुकसान पहुंचाया है। सहारनपुर और कुशीनगर में अवैध जहरीली शराब से मौतों ने प्रदेश को हिलाकर रख दिया था। इनमें करीब 60 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। ऐसे ही सोनभद्र के जमीन विवाद नरसंहार ने प्रदेश सरकार को मुश्किल में ला दिया था। उन्नाव रेप कांड ने भी काफी किरकिरी कराई। इस मामले में कोर्ट ने भाजपा से निष्कासित विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को उम्रकैद की सजा सुनाई और 25 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।

इस फैसले से पूर्व उन्नाव में ही दो अन्य रेप पीडि़ताओं को दबंगों ने जलाकर मार दिया। इसे लेकर एक बार फिर योगी सरकार की फजीहत हुई। इसी तरह पूर्व केंद्रीय मंत्री चिन्मयानंद के खिलाफ अपने ही कॉलेज की छात्रा से यौन शोषण, हिन्दूवादी नेता कमलेश तिवारी की हत्या जैसे मामले भी खूब उछले। वर्ष 2019 जाते जाते नागरिकता संशोधन बिल और एनआरसी के नाम पर राजधानी लखनऊ, कानपुर, अलीगढ़, मेरठ, मुजफ्फरनगर, संभल सहित कई जनपदों को उग्र प्रदर्शन और हिंसा की आग में झोंक गया। इसमें करीब 20 लोगों की मौत हुई। 

किसानों को नहीं मिला खास फायदा

प्रदेश में किसान और किसानी बड़ा मुद्दा है। योगी सरकार भले ही किसान ऋण माफी के लाख दावे करे, लेकिन ऐसे बहुत किसान मिल जाएंगे जिन्हें लगता है कि उन्हें सरकार की तरफ से कोई फायदा नहीं पहुंचा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में देखा जाए तो गन्ना किसानों का पूरा बकाया अब भी नहीं मिल पाया है। वैसे वे गन्ना का समर्थन मूल्य न बढऩे से भी नाखुश हैं। वहीं, प्रदूषण पर  लगाम के लिए पराली जलाने पर पाबंदी के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू कराने के लिए योगी सरकार की सख्ती से भी किसानों में नाराजगी दिखी थी।

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बारिश और बाढ़ से फसल की बर्बादी की भरपाई के लिए किसानों को 15 दिन के अंदर मुआवजा देने के आदेश भले ही दिए गए हों, लेकिन बीमा कंपनियों और बैंकों से इसे कारगर ढंग से लागू नहीं कराया जा सका। अब रबी का सीजन चल रहा है, लेकिन खरीफ की फसल का मुआवजा अब तक किसानों को नहीं मिल सका है। किसान बैंकों और बीमा कंपनियों का चक्कर लगा कर थक गए। महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना प्रदेश में लागू है। इसमें सबसे बड़ी विडम्बना है, प्रदेश में 2.33 करोड़ से ज्यादा किसान परिवारों में से लगभग 40 लाख के पास ही क्रेडिट कार्ड होने के कारण सिर्फ उनका ही फसल बीमा हो पाया है। स्वेच्छा से बीमा कराने वाले किसानों की संख्या बेहद कम है।

आंकड़े बताते हैं कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत पिछले साल 5.58 लाख किसानों को 419.54 करोड़ रुपए का क्लेम दिया गया, लेकिन इस साल अब तक किसी भी किसान को क्लेम नहीं मिला है। इन विसंगतियों के बीच 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का योगी सरकार वादा कैसे पूरा होगा, यह भी एक चुनौती है। ऐसी अन्य कई चुनौतियां हैं जिनका सामना नए साल में करना होगा। 

प्रदेश में हुए शानदार काम

चुनौतियों और आलोचनाओं के बावजूद वर्ष 2019 ने योगी सरकार के खाते में कई क्षेत्रों में उपलब्धियां भी दी हैं। दुनिया के सबसे बड़े आयोजन कुम्भ मेले की सफलता को पूरे देश ने सराहा। इसके अलावा ऐसी कई ऐसी योजनाओं के मामले में प्रदेश को प्रथम स्थान हासिल हुआ, जिनमें प्रदेश फिसड्डी था। प्रधानमंत्री आवास योजना, गैस कनेक्शन देने की उज्ज्वला योजना और बिजली मुहैया कराने की सौभाग्य योजना की सफलता ने करोड़ों गरीबों के घरों को खुशहाल बनाया है। सरकार ने शहरी इलाकों में 24 घंटे और ग्रामीण क्षेत्रों में 18 घंटे बिजली देने का वादा किया था, उस पर वह कमोवेश खरी उतरी है। इसे योगी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। 

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मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहे वनटांगिया, कोल, मुसहर और थारू जनजातियों के विकास के लिए ठोस कदम उठाए गए हैं। सामूहिक विवाह, सुपोषण से लेकर कन्या सुमंगला जैसी योजनाओं से भी सरकार की लोकप्रियता बढ़ी है। नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना और इंसेफेलाइटिस पर लगाम लगाकर भी सरकार ने सराहना बटोरी। इन्द्रधनुष अभियान और आयुष्मान से छूटे 11 लाख परिवारों के लिए सीएम जन आरोग्य योजना के तहत सुविधा देने की व्यवस्था की गई है। कायाकल्प योजना के जरिए प्रदेश के बेसिक स्कूलों की तस्वीर बदली गई है।

सरकार को नकल विहीन परीक्षा कराने में सफलता मिली है। सरकार ने विकास को चेहरा बनाया तो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का तिलक भी गाढ़ा करती रही। कुंभ से लेकर अयोध्या, मथुरा, काशी तक योजनाओं, आयोजनों और परंपराओं में सरकार यजमान बन शामिल रही। कांवड़ यात्रा पर हेलिकॉप्टर से फूल तक बरसे। एक्सप्रेस-वे एयरपोर्ट से लेकर दूसरे बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट सरकार के टॉप एजेंडे में भी शामिल हैं। इसके अलावा पर्यटन को लेकर भी सरकार ने प्रदेश मं् काफी काम किया।

शिक्षा के क्षेत्र में सरकार ने दिया जोर

योगी सरकार ने 2019-20 के बजट में शिक्षा के क्षेत्र में विशेष जोर दिया था। इसमें २२ हजार करोड़ से ज्यादा खर्च किया है। प्राइमरी एजुकेशन पर 21 हजार 714 करोड़ खर्च किये जाएंगे, जबकि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था के नाम पर कुल 22389 करोड़ खर्च होंगे। बेसिक शिक्षा और माध्यमिक शिक्षा का बजट अलग-अलग तय किया गया है।

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इस बजट में 1200 करोड़ की कन्या सुमंगल योजना की शुरुआत की गई, जिसमें बालिकाओं के स्वास्थ्य एवं शिक्षा के स्तर को ऊपर उठाने की सकारात्मक सोच है। पुष्टाहार कार्यक्रम के लिए 400 करोड़, न्यूट्रीशन के लिए 335 करोड़ और आंगनबाड़ी के लिए 1988 करोड़ रुपये दिए गए हैं। सरकार के प्रयासों और भारी-भरकम बजट के बावजूद प्रदेश में 17,602 सरकारी स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे है। इसके अलावा सरकारी स्कूलों में इसबार पिछले सालों की तुलना में सात लाख बच्चे घट गए। यह नए साल के लिए बड़ी चुनौती है। 

नए साल में सरकार के सामने चुनौतियां

- योगी सरकार ने भ्रष्टाचार और लापरवाह अफसरों के खिलाफ सख्ती दिखाई। भ्रष्ट और लापरवाह  अफसरों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी जा रही है। इस क्रम में पिछले दो वर्ष में 200 से ज्यादा  अफसरों और कर्मचारियों को जबरन रिटायर किया और 400 से ज्यादा अफसरों, कर्मचारियों को निलंबन और डिमोशन जैसे दंड भी दिए गए। लोगों में धारणा है कि सीएम योगी आदित्यनाथ भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने में कामयाब रहे हैं और उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार का कोई दाग नहीं हैं। इस विश्वास को कायम रखना एक चुनौती है। 

- सरकार चाहे जिस दल की हो यूपी में कानून-व्यवस्था की स्थिति नासूर बनाती जा रही है। योगी सरकार भले ही एनकाउंटर के दम पर अपराधियों को दुरुस्त करने का दावा करती हो, लेकिन  अपराधों पर काबू पाना अब भी बड़ी चुनौती है।

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- बेरोजगारी राज्य की सबसे बड़ी समस्या है। युवाओं को नए साल में सरकार से बहुत उम्मीदें हैं। राज्य सरकार उन विभागों में भर्ती के लिए जगहें निकाल रही हैं जिनमें पद खाली पड़े हैं। अब तक डेढ़ लाख नौकरियां सरकार दे चुकी है, लेकिन 69 हजार शिक्षक भर्ती सहित कई और भर्तियां कोर्ट में फंसी हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद रिवर्ट हुए शिक्षामित्रों को राहत भी अब तक लंबित है। कई भर्ती परीक्षाओं में सेंधमारी की घटनाएं सामने आई हैं। 

- योगी सरकार ने गो-संरक्षण के दावों को कानूनी जामा पहनाया, लेकिन अब भी जमीन पर इसका  ठीक से अमल नहीं हो सका है। इस वजह से किसानों के खेत भी बलि चढ़े लेकिन छुट्टा पशुओं की समस्या ज्यों की त्यों बनी है। नए साल में सरकार को गो-संरक्षण को लेकर और सख्ती के साथ काम करना होगा।

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Web Title: Many expectations of the people of UP in the new year, challenges for the government ( Hindi News From Newstimes)


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