भाग-1 : पूरी दुनिया में रही सर्वोच्च न्यायालय के अहम फैसलोंं की गूंज


NP1509 31/12/2019 15:19:03
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New Delhi. साल 2019 सुप्रीम कोर्ट के तमाम ऐतिहासिक फैसलों के लिए भी जाना जाएगा। सर्वोच्च अदालत ने इस साल कई ऐसे फैसले सुनाए, जो इतिहास बन गए। एक तरफ कोर्ट ने दशकों पुराने तथा पूरे देश को आंदोलित करते रहे अयोध्या जमीन विवाद मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मामले का पटाक्षेप किया, तो दूसरी तरफ राफेल डील में भी अहम फैसला सुनाया। कोर्ट का यह फैसला एक तरह से मोदी सरकार के लिए क्लीन चिट जैसा था।

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कुछ मामले ऐसे भी रहे, जिनसे सियासत की दिशा और दशा भी बदली। इनमें महाराष्ट्र का सियासी मामला प्रमुख रहा, जहां पहले नाटकीय घटनाक्रम में भाजपा के देवेन्द्र फडणवीस ने सरकार बना ली थी, लेकिन बाद में उन्हें पद त्यागना पड़ा। आइए एक नजर डालते हैं सुप्रीम कोर्ट द्वारा साल 2019 में सुनाए गए कुछ अहम फैसलों पर -

अयोध्या मामला

सर्वोच्च न्यायालय की पांच जजों की पीठ ने 9 नवंबर, 2019 को वर्षों पुराने अयोध्या मामले पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया। इस फैसले के साथ ही अब इस विवाद का भी पटाक्षेप हो गया। सर्वोच्च न्यायालय का पूरा फैसला 1045 पेज का है। अपने इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने रामलला विराजमान को इस जमीन का मालिक घोषित करते हुए कहा कि एक ट्रस्ट का गठन कर मंदिर बनाने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय ने सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ जमीन मुहैया करवाने का भी आदेश दिया। अदालत ने कहा कि यह जमीन कहां दी जाएगी, इसको उत्तर प्रदेश की सरकार तय करेगी।

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बता दें कि यह पूरा मामला 2.77 एकड़ की विवादित जमीन का था। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने दूसरे पक्ष की भावनाओं का सम्मान करते हुए उन्हें इससे कहीं अधिक बड़ी भूमि मुहैया करवाने का आदेश दिया है। अपने इस ऐतिहासिक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्मोही अखाड़ा और शिया बोर्ड की याचिका खारिज कर दी। निर्मोही अखाड़े ने अपनी याचिका में विवादित जमीन का कब्जा और प्रबंधन का अधिकार मांगा था। हालांकि कोर्ट ने कहा कि मंदिर निर्माण के लिए बनने वाले न्यास में उन्हें शामिल किया जाए। वहीं शिया बोर्ड ने अपनी याचिका में कहा था कि यहां पर स्थित मस्जिद शिया समुदाय ने बनाई थी, लिहाजा इसको सुन्नी बोर्ड को नहीं दिया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला इस लिहाज से भी बेहद खास है, क्योंकि साल 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निर्मोही अखाड़ा को एक तिहाई जमीन का मालिक बनाया था। इतनाा ही नहीं, सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले पर पुनर्विचार के लिए दाखिल सभी 18 याचिकाओं को भी खारिज कर दिया है।

दिल्ली के प्रदूषण पर तल्ख टिप्पणी

दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण पर भी सर्वोच्च न्यायालय ने चिंता जताते हुए सरकार पर तल्ख टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दमघोंटू हवा में सांस लेने से बेहतर है कि एक बार में विस्फोट से जनता को मार दिया जाए। इस दौरान अदालत ने यहां तक कहा कि दिल्ली सरकार को सत्ता में रहने का कोई अधिकार नहीं है। इस तरह की तल्ख टिप्पणी पहली बार सर्वोच्च न्यायालय की तरफ से किसी सरकार के खिलाफ की गई।

दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई नवंबर के पहले हफ्ते में शुरू हुई। केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दायर कर वायु प्रदूषण का डेटा दिया। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि इस समय दिल्ली में प्रदूषण का स्तर 600 को पार कर गया है। घर के कमरों में भी ऐसी ही स्थिति है। वायु प्रदूषण से हर कोई प्रभावित हो रहा है। केंद्र सरकार ने कहा कि वायु प्रदूषण को लेकर एक साल की स्टडी की जरूरत पड़ेगी। इस पर अदालत ने केंद्र को समय दिया।

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वहीं दिल्ली सरकार ने कहा कि प्रदूषण का मुख्य कारण पराली जलाना है। इस पर सर्वोच्च अदालत ने नवंबर 2019 में ही आदेश दिया कि किसानों को पराली के निस्तारण के लिए 100 रुपये प्रति कुंतल के हिसाब से इंसेन्टिव या प्रोत्साहन राशि का भुगतान सरकार की ओर से किया जाए। पराली के निस्तारण के लिए यह भुगतान तीन राज्यों पंजाब, हरियाणा और यूपी के किसानों को किया जाएगा। इतना ही नहीं, कोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकार को बिना कोई फीस वसूले छोटे और सीमांत किसानों को पराली के निस्तारण के लिए मशीनें उपलब्ध कराने के लिए भी कहा है।

अदालत ने सरकारों को फटकार लगाते हुए यह भी कहा कि पैसों की कमी किसी सरकार के लिए अपने कर्तव्य न निभाने का बहाना नहीं हो सकती है। कृषि भारत की रीढ़ की हड्डी है, इसलिए देश के छोटे और सीमांत किसानों के हितों की रक्षा होनी चाहिए। ऐसे में पर्याप्त फंड न होने को उन पर ध्यान न देने की वजह नहीं बनाया जाना चाहिए। सर्वोच्च अदालत ने यह भी कहा कि किसानों को दंडित किया जाना अंतिम उपाय नहीं है। इसकी बजाय उन्हें इसके निस्तारण के लिए इंसेन्टिव यानी प्रोत्साहन राशि, मशीनें और उपकरण दिए जाने चाहिए। ऐसा नहीं किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह करोड़ों लोगों की जिंदगी और मौत का सवाल है। वे इसके चलते अस्थमा और कैंसर जैसी बीमारियों से पीडि़त हो रहे हैं। हम पूरी तरह से किसी भी विशेष परिस्थिति में पराली जलाने की छूट देने के सुझाव को खारिज करते हैं।

निर्भया केस के आरोपियों को फांसी का रास्ता साफ

देश की राजधानी में 16 दिसम्बर, 2012 को आधी रात में निर्भया के साथ हुई गैंगरेप की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। दिल्ली के सडक़ों पर दौड़ती बस ने न सिर्फ निर्भया की आत्मा को रौंदा, बल्कि देश की गरिमा पर भी सवाल खड़ा कर गया। निर्भया गैंगरेप और हत्या के केस में दोषी अक्षय की पुनर्विचार याचिका अब सुप्रीम कोर्ट से खारिज हो गई है।

इसके बाद अब चारों दोषियों को फांसी देने का रास्ता करीब-करीब साफ हो गया है। 18 दिसम्बर, 2019 को अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि इस मामले में दोषी के वकील को पूरा मौका दिया गया लेकिन दोषी के वकील ने कोई नई बात नहीं की है। फैसला सुनाते हुए जस्टिस भानुमति ने कहा कि ट्रायल और जांच सही हुई है और उसमें कोई खामी नहीं है। मृत्युदंड का सवाल है तो उसमें कोर्ट ने बचाव का पूरा मौका दिया है।

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जस्टिस भानुमति ने आगे कहा कि हमें याचिका में कोई ग्राउंड नहीं मिला है। इसके बाद अब अक्षय की मौत की सजा बरकरार रहेगी। निर्भया मामले में दोषी अक्षय कुमार सिंह की पुनर्विचार याचिका पर जस्टिस आर. भानुमति, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस ए. एस. बोपन्ना की पीठ ने सुनवाई की। कोर्ट ने कहा पुनर्विचार के लिए कोई आधार नहीं है।

साथ ही कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही सही फैसला दिया है। इसके बाद अदालत ने तिहाड़ जेल को निर्देश दिए कि वे दोषियों को नोटिस जारी करदया याचिका दाखिल करने के लिए कहें। हालांकि अक्षय के वकील एपी सिंह ने दया याचिका से पहले क्यूरेटिव पिटीशन फाइल करने की बात कही है। आगे की खबर पढ़ने के लिए पार्ट-2 पढ़ें, जिसका लिंक नीचे दिया गया है- 

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Web Title: Important decisions of the Supreme Court in the last year ( Hindi News From Newstimes)


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