भाग-3 : पूरी दुनिया में रही सर्वोच्च न्यायालय के अहम फैसलोंं की गूंज


NP1509 31/12/2019 16:04:41
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अब आरटीआई के दायरे में सीजेआई दफ्तर भी

अयोध्या फैसले के ठीक चार दिन बाद 13 नवम्बर को सर्वोच्च न्यायालय के पांच जजों की संविधान पीठ ने एक और ऐतिहासिक फैसला सुनाया। संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे सीजेआई रंजन गोगोई ने सीजेआई दफ्तर को सार्वजनिक संस्था माना और फैसला दिया कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया का दफ्तर भी अब सूचना के अधिकार के दायरे में आएगा। इस फैसले के बाद देश में सूचना का अधिकार लागू होने के 14 साल बाद सर्वोच्च न्यायालय से सवाल पूछने का हक मिला है। हालांकि सीजेआई कार्यालय को आरटीआई के दायरे में लाने का आदेश देते वक्त संविधान पीठ ने कहा कि निजता और गोपनीयता का अधिकार एक अहम चीज है। चीफ जस्टिस के दफ्तर से सूचना देते वक्त वह संतुलित होनी चाहिए। बेंच में शामिल जस्टिस रमन्ना ने अलग से अपने मत में कहा कि आरटीआई को न्यायाधीशों की निगरानी के लिए उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।

इस ऐतिहासिक फैसले को आप चार सवालों के आधार पर समझ सकते हैं। पहला सवाल यह कि अब सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी किस तरह की जानकारियां मिल पाएंगी? इसका उत्तर है कि अब ज०जों की संपत्तियों का ब्योरा, कॉलेजियम के निर्णय और प्रशासनिक कार्रवाई की जानकारी मिल पाएगी, लेकिन इन्हें आरटीआई के प्रावधानों के तहत ही दिया जाएगा। न्याय से जुड़े मामले, उनके पीछे के तर्क-वितर्क इसमें शामिल नहीं होंगे। दूसरा सवाल यह कि सुप्रीम कोर्ट इसके दायरे में है, तो क्या हाईकोर्ट और निचली अदालतें भी इसके दायरे में आएंगी? उत्तर है हां, बिल्कुल आएंगी।

सुप्रीम कोर्ट के अधीनस्थ सभी प्रकार की अदालतें अब स्वत: ही आरटीआई के दायरे में आ गई हैं। हालांकि, यहां भी उपरोक्त शर्तें शामिल हैं। तीसरा अहम सवाल यह कि अब देश में ऐसे कौन-कौन से दफ्तर हैं, जो आरटीआई से बाहर हैं? इसका उत्तर यह है कि अभी सभी राजनीतिक दल आरटीआई से बाहर हैं। इंटेलीजेंस और सिक्योरिटी से जुड़ी एजेंसियां भी इसके दायरे में नही हैं। राष्ट्रपति भवन और पीएमओ आते हैं। चौथा सवाल यह कि क्या सुप्रीम कोर्ट दफ्तर पर भी सूचना न देने पर जुर्माना लगेगा? इसका उत्तर है हां। सूचना न देने पर अफसरों पर जुर्माने का जो प्रावधान है, वहीं सीजेआई दफ्तर पर भी लागू होगा। आरटीआई एक्टिविस्ट सुभाष चंद्र अग्रवाल ने यह लड़ाई लड़ी। अग्रवाल सन् 2015 तक 6,000 से ज्यादा बार आरटीआई आवेदन लगा चुके थे। इसके जरिए उन्होंने कई घोटालों को उजागर किया।

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दरअसल, वर्ष 2010 में दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया का कार्यालय भी सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत आता है। ऐसे में इससे संबंधित व्यक्तियों की सूचना भी आरटीआई के तहत देनी होगी। हाईकोर्ट ने कहा था कि न्यायिक स्वतंत्रता न्यायाधीश का विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि उस पर एक जिम्मेदारी है। इस आदेश के विरुद्ध सेक्रेटरी जनरल ऑफ सुप्रीम कोर्ट और सेंट्रल पब्लिक इंफोर्समेंट ऑफिसर ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। वर्ष 2010 में दो जजों की बेंच के जज (अब सेवानिवृत्त) न्यायमूर्ति सुदर्शन रेड्डी ने पाया कि इसमें संविधान के महत्व का प्रश्न उठाया गया है।

उन्होंने इसे तीन सदस्यीय बेंच के पास भेज दिया। संविधान के आर्टिकल 145(3) के तहत यहां से यह मामला पांच सदस्यीय बेंच तक पहुंच गया, जिसने यह फैसला दिया। सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने चीफ जस्टिस के ऑफिस को भी आरटीआई के दायरे में रखने का फैसला सुनाते हुए यह साफ कर दिया कि जनता के प्रति उसकी जवाबदेही को नकारा नहीं जा सकता है। हालांकि कोर्ट ने यह भी माना कि आरटीआई के माध्यम से कुछ भी जानकारी नहीं दी जा सकेगी। पीठ का कहना था कि आरटीआई दायर करते हुए न्यायपालिका की स्वतंत्रता का ध्यान रखना होगा। सीजेआई का कहना था कि पारदर्शिता के नाम पर एक संस्था को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए।

7 जजों की संविधान पीठ सुनेगी सबरीमाला प्रकरण

सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश देने का मामला लटक गया है। सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने अपने फैसले पर पुनर्विचार याचिकाओं को बड़ी बेंच को भेज दिया। तीन जजों ने बहुमत से मामले को 7 जजों की संविधान पीठ को रेफर किया, जबकि दो जजों - जस्टिस नरीमन और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने इसके खिलाफ अपना निर्णय दिया। सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर ही नहीं, मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश तथा दाऊदी बोहरा समाज में स्त्रियों के खतना सहित विभिन्न धार्मिक मुद्दे नए सिरे से विचार के लिए 7 सदस्यीय संविधान पीठ को सौंपा है। सीजेआई रंजन गोगोई ने कहा कि धार्मिक प्रथाओं को सार्वजनिक आदेश, नैतिकता और भाग-3 के अन्य प्रावधानों के खिलाफ नहीं होना चाहिए। चीफ जस्टिस गोगोई ने कहा कि याचिकाकर्ता इस बहस को पुनर्जीवित करना चाहता है कि धर्म का अभिन्न अंग क्या है? सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पूजा स्थलों में महिलाओं का प्रवेश सिर्फ मंदिर तक सीमित नहीं है।

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मस्जिदों में भी महिलाओं का प्रवेश शामिल है। अब 7 जजों की संविधान पीठ मामले की सुनवाई करेगी। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी साफ किया कि महिलाओं के प्रवेश का पिछला फैसला फिलहाल बरकरार रहेगा। केरल सरकार को कहा गया है कि वह इसे लागू करने पर फैसला ले। इस मामले को महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के तौर पर देखा जा रहा है। पहले भी सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला देते हुए 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी को लिंग आधारित भेदभाव माना था और इसे पक्षपातपूर्ण करार देते हुए 28 सितंबर, 2018 को तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से सभी महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दे दी थी। इस पीठ की एकमात्र महिला सदस्य जस्टिस इन्दु मल्होत्रा ने अल्पमत का फैसला सुनाया था।

हालांकि केरल में इस फैसले को लेकर बड़े पैमाने पर हिंसक विरोध हुए। इसको लेकर दायर याचिकाओं पर संविधान पीठ ने खुली अदालत में सुनवाई की। याचिका दायर करनेवालों में नायर सर्विस सोसायटी, मंदिर के तंत्री, त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड और राज्य सरकार भी शामिल थी। सबरीमाला मंदिर की व्यवस्था देखने वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने अपने रुख से पलटते हुए मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने की कोर्ट की व्यवस्था का समर्थन किया था। बोर्ड ने केरल सरकार के साथ मिलकर संविधान पीठ के इस फैसले पर पुनर्विचार का विरोध किया था। बोर्ड ने बाद में सफाई दी थी कि उसके दृष्टिकोण में बदलाव किसी राजनीतिक दबाव की वजह से नहीं आया है। कुछ दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि बोर्ड ने केरल में सत्तारूढ़ वाममोर्चा सरकार के दबाव में न्यायालय में अपना रुख बदला है। इस मसले पर केरल सरकार ने भी पुनर्विचार याचिकाओं को अस्वीकार करने का अनुरोध किया। केरल सरकार ने महिलाओं के प्रवेश के मामले में विरोधाभासी रुख अपनाया था।

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कर्नाटक के अयोग्य विधायकों पर अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने इस साल कर्नाटक में अयोग्य ठहराए गए 17 बागी विधायकों के मामले में भी अहम फैसला सुनाया। एक तरफ, सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा स्पीकर द्वारा विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने के फैसले को सही ठहराया, वहीं दूसरी तरफ कोर्ट ने कहा कि सभी 17 बागी विधायक उपचुनाव में हिस्सा ले सकते हैं। कोर्ट ने विधायकों को वर्ष 2023 तक अयोग्य ठहराए जाने के फैसले को भी रद्द कर दिया। बता दें, इन विधायकों के बागी हो जाने के बाद जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन की सरकार गिर गई थी और बाद में बीजेपी ने बीएस येदियुरप्पा की अगुवाई में राज्य में सरकार बनाई थी। इसी साल जुलाई में कर्नाटक विधानसभा के स्पीकर ने दल-बदल कानून के तहत इन 17 विधायकों को अयोग्य घोषित किया था।

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Web Title: Important decisions of the Supreme Court in the last year part 3 ( Hindi News From Newstimes)


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