बुन्देलखंड में स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल: एक करोड़ लोगों के लिए तीन मेडिकल कॉलेज, दो की मान्यता पर रोक


NP1357 19/01/2020 14:11:10
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विकास की दृष्टि से बेहद पिछड़े और बीते कुछ दशकों में प्राकृतिक आपदाओं के शिकार होकर गरीबी और भुखमरी का दंश झेल रहे बुन्देलखंड में स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सुविधाओं का बुरा हाल है। बुन्देलखंड में स्वास्थ्य सेवाएं बेहद खस्ता हालत में हैं। विभिन्न बीमारियों के इलाज की व्यवस्था तो दूर, उनकी जांच के भी पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, यहां इलाज न मिल पाने के कारण प्रतिवर्ष लगभग 13 हजार मरीज मौत का शिकार बन जाते हैं। बड़ी संख्या में क्षेत्र की आबादी धनाभाव के कारण महानगरों में उपलब्ध अत्यन्त महंगी निजी चिकित्सा सेवाएं हासिल कर पाने में असमर्थ होती है।

बुन्देलखण्ड में कुल 7 जिले झाँसी, जालौन, ललितपुर, बांदा, चित्रकूट, महोबा और हमीरपुर हैं, जबकि चित्रकूट और झाँसी 2 मण्डल हैं। बुन्देलखण्ड की आबादी लगभग 1 करोड़ है। इस बुन्देलखण्ड क्षेत्र में मरीजों के उपचार के लिए शासन ने 3 मेडिकल कॉलेजों की स्थापना की है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वर्ष 2019 में जनपद ललितपुर में एक जनसभा में इस जिले में चौथा मेडिकल कॉलेज खोलने की घोषणा की है। उधर, दूसरी तरफ एमसीआई ने मानक पूरे न होने पर राजकीय मेडिकल कॉलेज, बांदा और राजकीय मेडिकल कॉलेज, उरई की मान्यता पर फिलहाल रोक लगा दी है। 

झांसी मेडिकल कॉलेज बना  रेफरल सेंटर  

झांसी के रानी लक्ष्मी बाई मेडिकल कॉलेज को एम्स का दर्जा देने की कवायद पिछली यूपीए सरकार में शुरू हुई थी, लेकिन यह कोशिश राजनीतिक दांव-पेंच में फंसकर दम तोड़ गई। इसके बाद इसे एम्स की तर्ज पर विकसित किए जाने की कोशिश शुरू हुई और मेडिकल कॉलेज को विकसित करने के नाम पर नए भवनों का निर्माण कर लिया गया, लेकिन लोगों को मिलने वाली सुविधाओं में किसी तरह की बढ़ोतरी नहीं हुई है। झांसी के मेडिकल कॉलेज को बुंदेलखंड के लोगों के लिए इलाज का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है, लेकिन सुविधाओं के अभाव में यह केवल रेफरल सेंटर बनकर रह गया है। मेडिकल कॉलेज में दवाओं से लेकर जांच सुविधाओं तक का टोटा है।

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महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज झांसी सबसे पुराना मेडिकल कॉलेज है। इसकी स्थापन लगभग 52 वर्ष पूर्व 17 दिसम्बर, 1967 को हुई थी। यह 380 एकड़ में फैला हुआ है। इस मेडिकल कॉलेज में प्रतिदिन ओपीडी में लगभग 4,000 मरीज देखे जाते हैं। इस मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस छात्रों के बैच की संख्या प्रतिवर्ष 100 है। झांसी मेडिकल कॉलेज के बाहर भी लगभग सौ से अधिक डॉक्टरों के अपने हास्पिटल और नर्सिंग होम हैं, जिनमें से अधिकांश मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर और शिक्षक हैं। इसका सबसे बुरा असर मेडिकल कॉलेज के छात्र-छात्राओं पर पड़ता है। इस दौरान छात्र-छात्राओं को अपने प्रोफेसर और शिक्षकों के साथ जो ज्यादा से ज्यादा प्रैक्टिकल के रूप में सीखने को मिलना चाहिए, वह डॉक्टरों के निजी प्रैक्टिस में व्यस्त होने की वजह से नहीं मिल पाता है। यही नहीं, इसकी वजह से मरीजों को भी ओपीडी में दिखाने के बाद डॉक्टरों के नर्सिंग होम में जाकर इलाज कराने को मजबूर होना पड़ता है। 

बुन्देलखण्ड के झांसी मेडिकल कॉलेज में मरीजों को असाध्य रोगों के इलाज की भी सुविधा उपलब्ध कराई गई है। इस मेडिकल कॉलेज में 60 प्रतिशत स्टाफ के पद रिक्त पड़े हुए हैं, जबकि 40 प्रतिशत स्टाफ आउटसोर्सिंग के माध्यम से भरा गया है। मेडिकल कॉलेज की प्रधानाचार्य डॉ. साधना कौशिक बताती हैं कि विशेषज्ञ डॉक्टरों और स्टाफ के खाली पदों के लिए शासन को पत्र लिखे गए हैं। इसके कारण सरकार का गरीब मरीजों को मुफ्त इलाज देने का सपना पूरी तरह से सार्थक नहीं हो पाता है। 

14 साल बाद भी बिल्डिंग हैंडओवर नहीं

जालौन जनपद के मुख्यालय उरई में राजकीय मेडिकल कॉलेज की स्थापना 2006 में प्रदेश शासन द्वारा की गई थी। लगभग 117 एकड़ में फैले इस राजकीय मेडिकल कॉलेज में सभी विभागों की बिल्डिंगें हैं। इस मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. दुजेन्द्र नाथ बताते हैं कि इस मेडिकल कॉलेज परिसर में ड्रेनेज और कुछ बिल्डिंगों में पेयजल की समस्या को ठीक करने का कार्य निर्माण निगम द्वारा अभी तक किया जा रहा है। इसके कारण मेडिकल कॉलेज की यह बिल्डिंग 14 वर्ष बाद भी निर्माण निगम द्वारा अभी तक मेडिकल कॉलेज प्रशासन को हैंडओवर नहीं की गई है। वे बताते हैं कि इस मेडिकल कॉलेज को हरजन कम्पोनेन्ट के बजट से बनाया गया है। यहां एमबीबीएस छात्रों की कुल 100 सीटें हैं। वर्ष 2013 का एक बैच एमबीबीएस पास करके निकल चुका है, जबकि एमसीआई ने निरीक्षण में मानकों की कमी के आधार पर वर्ष 2019 के बैच पर रोक लगा दी है। 

प्रधानाचार्य दुजेन्द्र नाथ का कहना है कि शीघ्र ही नेशनल मेडिकल एसोसिएशन की टीम निरीक्षण करेगी और मानकों का फिर एक बार परीक्षण करेगी, जिससे उम्मीद है कि कॉलेज को मान्यता मिल जाये। डॉ. दुजेन्द्र नाथ, सीएमएस डॉ. संजीव गुप्ता और डॉ. मनोज वर्मा बताते हैं कि यहां प्रतिदिन 2500 मरीज ओपीडी में देखे जाते हैं। पूछे जाने पर वे बताते हैं कि यहां पर कार्डियोलॉजी और न्यूरोलॉजी विभाग के डॉक्टरों की नियुक्ति होना अभी बाकी है, जबकि नर्सिंग स्टाफ में कुल 174 पदों में से 106 पद ही भरे हैं। इसी तरह टेक्नीशियन के 20 पद खाली पड़े हैं। वे बताते हैं कि आउटसोर्सिंग के माध्यम से डॉक्टरों के पद भरे गए हैं, जिसके चलते प्रतिदिन 2500 मरीजों का इलाज किया जाता है। प्रधानाचार्य डॉ. दुजेन्द्र नाथ बताते हैं कि मरीजों को अच्छा इलाज मिल जाए, इसके लिए वे अपने डॉक्टरों और स्टाफ के साथ प्रयत्नशील रहते हैं। 

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बांदा मेडिकल कॉलेज का भी बुरा हाल

इसी प्रकार बांदा मेडिकल कॉलेज की स्थापना वर्ष 2016 में हुई थी। यह कॉलेज 104 एकड़ में फैला हुआ है और इसमें 50 से ज्यादा विभागों की बिल्डिंगें हैं। यहां एमबीबीएस छात्रों की संख्या 100 है। बांदा मेडिकल कॉलेज में प्रतिदिन 2500 से 3000 मरीज ओपीडी में देखे जाते हैं। एमसीआई ने अपने निरीक्षण में मानकों में कमी पाए जाने पर पिछले साल 10 अगस्त, 2019 को सुरक्षा मानकों की कमी के चलते इस मेडिकल कॉलेज की मान्यता पर रोक लगा दी है। मेडिकल कॉलेज प्रशासन को पुन: निरीक्षण के बाद मान्यता मिलने की उम्मीद है। इसी तरह वर्ष 2019 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जनपद ललितपुर में 200 बेड वाला नया मेडिकल कॉलेज खोले जाने की घोषणा की है। इसको मिलाकर बुन्देलखण्ड में कुल 4 मेडिकल कॉलेज हो जाएंगे। 

सवाल यह है कि मेडिकल कॉलेजों में शासन स्तर से डॉक्टरों और स्टाफ के पद जब तक नहीं भरे जाते और डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर ठीक ढंग से रोक नहीं लगाई जाती, तब तक प्रदेश सरकार द्वारा बुन्देलखण्ड क्षेत्र की एक करोड़ आबादी के लिए जो स्वास्थ्य सुविधाएं शुरू की गई हैं, वे व्यावहारिक रूप से कारगर कैसे हों सकेंगी। सरकार को इसके लिए उचित रणनीति बनानी होगी। उरई राजकीय मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. दुजेन्द्र नाथ का कहना बिल्कुल सही है कि एमबीबीएस और मेडिकल स्टाफ को जब तक उनकी पढ़ाई में ‘शिक्षार्थ आइए और सेवार्थ जाइए’ के साथ-साथ मानव होने के कारण मानवता की सेवा का प्रशिक्षण और पाठ्यक्रम में इसे जब तक नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक हम ऐसे डॉक्टर और स्टाफ नहीं बना पाएंगे, जो भौतिक सुख के साथ मानव सेवा को प्राथमिकता दें।

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Web Title: Health services in Bundelkhand bad Three medical colleges for one crore people ban on recognition of two ( Hindi News From Newstimes)


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