भविष्य के लिए एक सही कदम रोजगार उन्मुख शिक्षा प्रणाली


NAZO ALI SHEIKH 19/01/2020 15:14:12
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युवाओं के मामले में हम दुनिया में सबसे समृद्ध देश हैं, यानी दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा युवा हमारे देश में हैं। भारत सरकार (Indian government) की ‘यूथ इन इंडिया-2017’ (Youth in India-20170) की रिपोर्ट के अनुसार, देश में 1971 से 2011 के बीच युवाओं की आबादी में 34.8 फीसदी की वृद्धि हुई है। इस रिपोर्ट में 15 से 33 वर्ष तक के लोगों को युवा माना गया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2030 तक एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (Economy) वाले देश चीन (China) में युवाओं की संख्या जहां कुल आबादी की 22.31 प्रतिशत होगी और जापान में यह 20.10 प्रतिशत होगी, तब भारत में यह आंकड़ा सबसे अधिक 32.26 फीसदी होगा।

भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) पिछले कुछ वर्षों में शहर की चर्चा में है, लेकिन भारत ने जो देर से वादा किया था उसके लिए तीक्ष्ण अभियान शायद थोड़ा शांत हो गया, क्योंकि उसके समर्थकों ने महसूस किया है कि जनसांख्यिकीय लाभांश एक खोखला शब्द हो सकता है, क्योंकि देश के शिक्षित युवाओं का एक बड़ा हिस्सा बेरोजगार (unemployed) है। जब हम बात करते हैं कि हमारे युवा देश को बदल सकते हैं तो क्या हम यह भी सोचते हैं कि वे कौन सा युवा हैं, जो देश को बदलेंगे? वे युवा, जो रोजगार के लिए दर-दर भटक रहे हैं? वे युवा जिसके हाथों में डिग्रियां तो हैं, लेकिन विषय से संबंधित व्यावहारिक ज्ञान का सर्वथा अभाव है? वे युवा, जो साक्षर तो हैं लेकिन शिक्षित नहीं?

एक नई रिपोर्ट ‘द पियर्सन वॉयस ऑफ टीचर सर्वे’ (The Pearson Voice of Teacher Survey ') के अनुसार, देश में 57 प्रतिशत छात्र शिक्षित हैं, लेकिन रोजगार के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं हैं। सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि 75 फीसदी शिक्षकों ने उद्योग के सहयोग से पाठ्यक्रम के पुनर्गठन का आह्वान किया है और उन्होंने महसूस किया कि देश के शिक्षा मूल्यांकन (Education Assessment)ढांचे में समग्र शिक्षा को सक्षम करने के लिए शिक्षकों और अभिभावकों के लिए विशिष्ट कार्रवाई बिंदुओं का अभाव है।

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अधिकांश शिक्षकों ने शिक्षण में सहायता के लिए कंप्यूटर और इंटरनेट कनेक्शन के लिए भी कहा है। स्थिति वास्तव में गंभीर है। वर्ष 2030 तक भारत दुनिया के सबसे कम उम्र के देशों में से एक होगा और कॉलेज जाने वाले आयु वर्ग में लगभग 140 मिलियन लोगों के साथ, दुनिया के हर चार स्नातकों में से एक भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली का एक उत्पाद होगा।

यह सुनिश्चित करने के लिए कि भारतीय छात्रों के कौशल को बाजार की मांगों के अनुरूप बनाया गया है, इसके लिए पाठ्यक्रम और शिक्षकों के बीच तालमेल होना चाहिए। इसके अतिरिक्त, सरकार को प्रशिक्षण नीतियों और उसके प्रदाताओं, भावी श्रम-शक्ति और नियोक्ताओं को मार्गदर्शन करने के लिए श्रम बाजार में आपूर्ति-मांग की स्थिति के संदर्भ में श्रम बाजार की जानकारी प्रदान करने के लिए एक संगठित व्यवस्था करनी चाहिए।

हालांकि, जितना हम भारत में कौशल विकास कार्यक्रम और छात्रों को कौशल से लैस करने की आवश्यकता के बारे में बात करते हैं, इस कौशल की कमी के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण बुनियादी शिक्षा प्रणाली की कमजोरी और उन गुरुओं की कमी है, जो माध्यमिक शिक्षा छोडऩे पर छात्रों का मार्गदर्शन कर सकते हैं। स्कूल के घाटे का मतलब है कि कई छात्र गलत पाठ्यक्रमों में या बाजार या रोजगार की कोई प्रासंगिकता नहीं रखते हैं।

कार्ल मार्क्स ने कहा था - ‘एक आदमी को पकड़ो मछली के साथ और आप उसे बेच सकते हैं। एक आदमी को मछली पकडऩा सिखाना और आप एक अद्भुत व्यापार अवसर को बर्बाद करते हैं।’ शिक्षा का सबसे बड़ा लक्ष्य यह होना चाहिए कि किसी व्यक्ति को अवसर पैदा करने, अनदेखे पहलुओं का पता लगाने, समस्याओं को हल करने और अपनी स्वयं की पहचान खोजने के लिए एक शक्तिशाली माध्यम के रूप में कार्य करना चाहिए।

A right step for future employment oriented education system

अगर यह यूटोपियन मॉडल सफल होता है तो यह एक अंतर्निहित मुद्दा है, परन्तु सेवा करने (सर्विस सेक्टर) के लिए, बड़े श्रम बल की नकल करने वालों और उत्पाद बनाने वालों का उद्योग मॉडल बुरी तरह से ध्वस्त हो जाएगा। उदाहरण के लिए, यदि मेरे पास एक मोबाइल एप्लिकेशन डेवलपमेंट कंपनी है, तो कई कर्मचारियों के साथ, मैं उन मोबाइल एप्लिकेशन का उत्पादन करता हूं जिनकी बाजार को जरूरत है। लेकिन अगर मैं बताता हूं कि मैं इन ऐप्स का उत्पादन कैसे करता हूं, तो बाजार को अब मेरी जरूरत नहीं है। वास्तव में, बाजार में कई लोग अब मेरी प्रतियोगिता में हैं।

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भारतीय स्नातक कॉलेजों को उद्योग केंद्रित या नौकरी केंद्रित पाठ्यक्रम की कमी के लिए कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा है। भले ही भारत में बहुत सारे कॉलेज किसी विशिष्ट विशेषज्ञता वाले क्षेत्र के गहन ज्ञान पर ध्यान केंद्रित करते हैं और विभिन्न विषयों की व्यापक समझ नहीं रखते हैं, फिर भी यह उद्योग की मांग का उद्देश्य नहीं है। सबसे आम शिकायत उन छात्रों में गुणवत्ता की कमी है, जो प्लेसमेंट सेवाओं के लिए दिखाई देते हैं।

यदि वर्तमान स्नातक पाठ्यक्रम को नौकरी आधारित शिक्षा पर ध्यान देने के साथ संशोधित किया जाता है, तो यह पूरे उद्देश्य को हरा देता है। ऐसा लगता है कि किसी भी नौकरी की भूमिका के लिए विशिष्ट कौशल महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इन कौशल को शिक्षा के साथ हासिल किया जा सकता है, लेकिन शिक्षा का उद्देश्य सही कौशल सेट प्राप्त करने से परे है। अत: हमें परंपरागत रूप से दी जा रही शिक्षा का चेहरे को बदलने की आवश्यकता है, जिसे हम आज के परिदृश्य में रोजगारपरक कह सकते हैं।

  रोजगार परक शिक्षा के लिए कुछ सुझाव

आज की आवश्यकता है कि छात्रों को स्कूली शिक्षा से रोजगारपरक शिक्षा की तरफ शिफ्ट करने की कोशिश की जाए। अत: हुनर सम्बंधी तकनीकी शिक्षा जैसे कौशल विकास, आईटीआई तथा ग्रामीण परिवेश में आवश्यकताओं को ध्यान मे रखकर ही तकनीकी शिक्षा में बदलाव की आवश्यकता है, जिससे हमारी जनसंख्या का अधिकतम भाग जो ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहा है, अधिक लाभान्वित हो।

A right step for future employment oriented education system

यह भी आवश्यक है कि हम भविष्य में आने वाली आवश्यकताओं को परखें और रोजगारपरक अथवा व्यावसायिक शिक्षा को विश्व स्तर पर दी जाने वाली तकनीकों के लिए अभी से उस दिशा में बढ़ावा देना शुरू करें। आवश्यकता पर मनन कर उसे लागू करने हेतु शिक्षा को सुदृढ़ करें।

आज विश्व में अक्षय ऊर्जा, रोबोटिक्स, स्पेस इंजीनियरिंग, बायोटक्नोलॉजी, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, वर्चुअल व न्यूअरल नेटवर्क आदि पर विशेष ध्यान देना होगा, जिससे भविष्य की शिक्षा राष्ट्रहित में सामाजिक व आर्थिक विकास में अधिक कारगर हो।

Web Title: A right step for future employment oriented education system ( Hindi News From Newstimes)


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