#NewstimesTrending : शिक्षा नीति - दावे और चुनौतियां


NP863 27/01/2020 14:35:22
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नई शिक्षा नीति का इंतजार अब खत्म होने वाला है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इसे लेकर तैयारी लगभग पूरी कर ली है। इसे अब सिर्फ कैबिनेट से मंजूरी मिलना बाकी है। इसी महीने नई शिक्षा नीति जारी होने की उम्मीद है। जानकारों का कहना है कि शुरुआती ड्राफ्ट की तुलना में इसमें काफी बदलाव देखने को मिलेंगे। इसके अमल को लेकर राज्यों को पूरी स्वायत्तता दी जा सकती है। नई शिक्षा नीति की आवश्यकता इसलिए पड़ी, क्योंकि वर्तमान शिक्षा नीति 1986 में लागू हुई थी, जिसे 1992 में संशोधित किया था, वह हमारे बच्चों को 21वीं सदी की चुनौतियों के लिए तैयार कर पाने में सक्षम सिद्ध नहीं हो रही थी।

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नई शिक्षा नीति, जिसको इसरो के सेवानिवृत्त अध्यक्ष डॉ. कृष्णस्वामी कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में ड्राफ्ट किया गया है, वर्तमान शिक्षा प्रणाली की कमियों को शिद्दत से दूर करने की कोशिश करती दिखती है। विगत चार-पांच सालों से नई शिक्षा नीति का इंतजार सभी को बेसब्री से है। हालांकि अब यह इंतजार खत्म होता दिखाई दे रहा है। वैसे तो मंत्रालय ने इस पूरी नीति को लागू करने की समयबद्ध योजना तैयार कर रखी है, जिसमें अगले पांच सालों में नई शिक्षा नीति को पूरी तरह से लागू करना शामिल है।
 नई शिक्षा नीति की प्रस्तावित बातें विद्यार्थी के सीखने पर जोर देती हैं। इसी के साथ इसमें सीखने की प्रक्रिया पर विशेष बल दिया गया है, जिससे उनमें अपने आसपास या जीवन में होने वाली सामान्य-आसामान्य घटनाओं से भी कुछ नया सीखने की क्षमता विकसित हो। नीति के तहत शिक्षा के द्वारा ही प्रोफेशनल स्किल्स के साथ-साथ तर्कशक्ति, चिंतन, समस्या-समाधान आदि सिखाने को बढ़ावा देना है। चूंकि इस लक्ष्य को बिना ढांचागत बदलाव किए नहीं पाया जा सकता, इसलिए प्रारम्भिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक बदलाव की बयार है।  
शिक्षकों के प्रशिक्षण पर दिया गया है जोर
नई शिक्षा नीति में स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा के इंफ्रास्ट्रक्चर को मजूबत बनाने और शिक्षकों के प्रशिक्षण पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया है। शिक्षक तैयारी कार्यक्रम कठोर होने के साथ ही जीवंत, बहुविषयक उच्च शिक्षा संस्थाओं में होंगे। शिक्षकों को प्रशिक्षण सिर्फ बहु विषयक संस्थाओं द्वारा ही प्रदान किया जाएगा और घटिया बदहाल शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों को बंद किया जाएगा। अनुसंधान और प्रौद्योगिकी के उपयोग का समर्थन करने के लिए एजुकेशनल टेक्नोलॉजी में उत्कृष्टता केंद्र भी स्थापित किए जाएंग। वहीं निजी स्कूलों से ‘पब्लिक’ शब्द को हटाने की सिफारिश को यथावत रखा है, यानी निजी स्कूलों को अब अपने नाम से ‘पब्लिक’ शब्द को हटाना ही होगा।
 नई शिक्षा नीति मसौदे के मुख्य बिंदु
नई शिक्षा नीति-2019 के प्रारूप में शिक्षण व्यवस्था को मुख्य रूप से 4 भागों में बांटा गया है। इसके पहले भाग में विद्यालय शिक्षा, दूसरे भाग में उच्च शिक्षा, तीसरे भाग में प्रौद्योगिकी, व्यावसायिक और वयस्क शिक्षा को रखा गया है, जबकि चौथे भाग में राष्ट्रीय शिक्षा आयोग के जरिए शिक्षा में बदलाव की बात रखी गई है।
विद्यालयीय शिक्षा  
बचपन की देखभाल और शिक्षा : मसौदे में वर्ष 2025 तक 3-6 वर्ष तक के सभी बच्चों को नि:शुल्क गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और उपयुक्त देखरेख मुहैया करवाने का लक्ष्य है। यह सब स्कूल और आंगनबाड़ी जैसे संस्थानों के माध्यम से किया जाएगा। इन संस्थानों पर ही बच्चों के समग्र कल्याण, स्वास्थ्य और शिक्षा की जिम्मेदारी होगी।
मूलभूत साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान : वर्ष 2025 तक ग्रेड-5 तक के बच्चे अपनी आयु के अनुसार साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान प्राप्त कर लें, इसका विस्तृत खाका भी तैयार है। इसका उद्देश्य बच्चों को पढऩे, लिखने और प्राथमिक गणित को हल करने में योग्यता प्रदान करना रहेगा। दरअसल कई सर्वे में यह तथ्य सामने आए हैं कि वर्तमान में प्राथमिक स्कूल और ज्यादातर विद्यार्थी अपनी ही कक्षा की पुस्तकों को पढऩे और गणित के प्रश्नों को हल करने में ही सक्षम नहीं है। इसके बाद नई शिक्षा नीति में इसका खास ख्याल रखा गया है।
सभी तक शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित करना : नई शिक्षा नीति का मुख्य उद्देश्य वर्ष 2030 तक 3 से 18 वर्ष तक की आयु के बच्चों को नि:शुल्क और अनिवार्य गुणवत्तापरक स्कूली शिक्षा मुहैया करवाना है। इसके साथ ही सरकार का जोर इस ओर भी है कि बच्चे स्कूल आना जारी रखें और पढ़ाई को बीच में ही न छोड़ें।
समग्र विकास के लिए पाठ्यक्रम और शिक्षण पद्धति में बदलाव : बच्चों में रटने की आदत को कम करने और उनके समग्र विकास के लिए नई शिक्षा नीति के तहत पाठ्यक्रम और शिक्षण के तरीकों में बदलाव किया जाएगा। इसके साथ ही ध्यान रखा जाएगा कि विद्यार्थी के भीतर गहन सोच, रचनात्मकता, वैज्ञानिक मनोवृत्ति, संचार सहयोग, नैतिकता, डिजिटल साक्षरता और 21वीं सदी के कौशल का विकास भी हो। इसके लिए क्लासरूम को आकर्षक और मजेदार बनाया जाएगा, जिससे बच्चे पढ़ाई के प्रति उत्साहित हों। पाठ्यक्रम में सामग्री कम की जाएगी। बच्चों की समझ को ध्यान में रखते हुए ग्रेड पांच तक उन्हें मातृभाषा में पढऩे की सुविधा उपलब्ध कराने की भी बात कही गई है।
शिक्षकों की नियुक्ति : नई नीति में यह भी सुनिश्चित करना होगा कि स्कूली शिक्षा के सभी स्तरों में पढ़ाने वाले शिक्षक जिज्ञासु, उच्च शिक्षित और बच्चों का सर्वांगीण विकास करने वाले हों। इसके लिए 2030 तक शिक्षण के लिए न्यूनतम योग्यता चार वर्षीय लिबरल इंटेग्रेडेट बीएड डिग्री होगी। शिक्षण क्षेत्र में आने को प्रोत्साहित करने के लिए हाईस्कूल से बेहतर प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को माध्यमिक स्कूल से ग्रेजुएशन तक और कॉलेजों में चार वर्षीय इंटीग्रेटेड बीएड प्रोग्राम करवाने के लिए स्कॉलरशिप देने की शुरुआत की जाएगी। साथ ही शिक्षकों की चयन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाएगा। टेट का दायरा बढ़ेगा और प्रीपरेटरी, मिडिल और सेकेंडरी स्कूल एजुकेशन के शिक्षकों की पात्रता की जांच भी अब टेट के माध्यम से किए जाने की तैयारी है।
उच्च शिक्षा
गुणवत्ता आधारित विवि और कॉलेज : उच्च शिक्षा तंत्र में सुधार को लेकर नई शिक्षा नीति में देशभर में विश्वस्तरीय और विविध विषयों पर आधारित उच्च शैक्षणिक संस्थानों का निर्माण कराया जाना है। वर्ष 2035 तक सकल नामांकन अनुपात को न्यूनतम 50 फीसदी तक बढ़ाने का लक्ष्य भी रखा गया है। नई नीति के तहत सभी उच्च शिक्षण बहुविषयक संस्थानों में होंगे, जिससे संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल से सभी विषयों और क्षेत्रों के अध्ययन को सुविधाजनक बनाया जा सके।
अधिक उदार शिक्षा की ओर : छात्रों के बहुमुखी विकास के लिए कल्पनाशील और व्यापक तौर पर उदार शिक्षण व्यवस्था बनाने की पहल होगी, जिसके तहत चुने गए विषय और क्षेत्र में विशेषज्ञता पर जोर दिया जाएगा। चार वर्षीय बैचलर ऑफ लिबरल ऑट्र्स/एजुकेशन विषय के विविध पक्षों पर केंद्रित होगा, जबकि तीन वर्षीय प्रोग्राम बैचलर डिग्री पर आधारित होगा।
वोकेशनल एजुकेशन कोर्स और प्रोग्राम : सभी उच्चतर शिक्षण संस्थान नई शिक्षा नीति के तहत वोकेशनल एजुकेशन कोर्स और प्रोग्राम संचालित करेंगे। इसके साथ प्रौढ़ शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम फ्रेमवर्क तैयार किया जाएगा। इसमें पांच प्रमुख क्षेत्रों को शामिल किया जाएगा, जिसमें मूलभूत साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान, महत्वपूर्ण जीवन कौशल, व्यावसायिक कौशल, आधारभूत शिक्षा और वयस्क शिक्षा शामिल होगी।  


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शिक्षा नीति में मील के पत्थर
वर्ष 1948 : डॉ. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग का गठन
वर्ष 1952 :लक्ष्मणस्वामी मुदलियार की अगुआई में माध्यमिक शिक्षा आयोग बना
वर्ष 1964 : दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में शिक्षा आयोग
वर्ष 1968 : कोठारी आयोग के सुझावों पर शिक्षा नीति का प्रस्ताव
वर्ष 1986 :नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू
वर्ष 1990 : आचार्य राममूर्ति की अध्यक्षता में एक समीक्षा समिति बनी
वर्ष 1993 : प्रो. यशपाल के नेतृत्व में समीक्षा समिति का गठन
वर्ष 2017 :नई शिक्षा नीति का प्रारूप बनाने के लिए कस्तूरीरंगन समिति का गठन

 


नई नीति लागू करने में यहां आएंगी चुनौतियां
नई शिक्षा नीति की राह आसान नहीं है। लक्ष्य भले ही असंभव न हो, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों के अनुसार मुश्किलों को हल होने में समय तो अवश्य लगेगा। आइए जानते हैं, नई  शिक्षा नीति को लागू करने में कौन सी चुनौतियां सामने आ सकती हैं -
शिक्षा के अधिकार अधिनियम का विस्तार करते हुए इसमें प्री-स्कूल के बच्चों को शामिल करने की बात कही गई है। संरचनागत व्यवस्था और शिक्षकों की रिक्तियों को देखते हुए इसे लागू करने में समय लगेगा।
प्रधानमंत्री के नेतृत्व में राष्ट्रीय शिक्षा आयोग के गठन का विचार दिया गया है। विभिन्न विभागों और कार्यक्रमों में एमएचआरडी के तहत यह आयोग कैसे काम करेगा, यह स्पष्ट नहीं है।
वर्तमान संसाधनों के साथ नई शिक्षा नीति को चरितार्थ करना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा।

प्रशासनिक स्तर की चुनौतियों के अलावा मेडिकल, एग्रीकल्चर और लीगल एजुकेशन के लिए एक साथ व्यवस्था दे पाना एक कठिन कार्य होगा।
आमतौर पर मुद्दों को समझे बगैर ही प्रदर्शन शुरू हो जाते हैं। भाषा जैसे भावनात्मक मुद्दे पर राजनीतिकरण को रोकना होगा।

Web Title: nai siksha neeti daave or hakikat ( Hindi News From Newstimes)


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