जीत के लिए अरविन्द केजरीवाल ने बदल ली थी अपनी रणनीति, पढ़ें पूरी रिपोर्ट


NP1509 18/02/2020 12:32:19
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Lucknow. दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों पर हुए चुनाव में एक बार फिर आम आदमी पार्टी (आप) ने ‘झाड़ू मार’ दिया। लगातार दूसरी बार स्पष्ट बहुमत के साथ अरविन्द केजरीवाल को मुख्यमंत्री पद की हैट्रिक लगाने का मौका मिला। चुनाव-प्रक्रिया शुरू होने के बाद एग्जिट पोल के अनुमानों, सभी दलों की रणनीति और चुनाव के ट्रेंड्स पर गौर किया जाए तो दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम अप्रत्याशित नहीं थे। भाजपा को भी बहुत पहले इसका अंदाजा हो गया था। यही वजह थी कि अमित शाह ने शुरुआती प्रचार के बाद एक रणनीति के तहत मोदी की छवि की ‘चमक’ बचाए रखने के लिए उन्हेंं प्रचार-कार्य से दूर रखकर खुद ही चुनाव प्रचार का ‘केंद्र’ बन गए ...ताकि पराजय की स्थिति में उन्हें ही इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाए। मतदान के बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव के सभी सातों एग्जिट पोल के अनुमानों में भी ‘आप’ को स्पष्टï बहुमत मिलना दिखाया गया था, जबकि सभी दलों की रणनीति पर गौर किया जाए तो इस बार अरविन्द केजरीवाल ने अपनी रणनीति थोड़ी बदल ली थी, जो उनके पक्ष में रही। इसके तहत उन्होंने इस बार के चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी पर आक्रामक होने की बजाय यह साबित करने की कोशिश की कि उनका कोई विकल्प नहीं है।

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दरअसल, भाजपा ने 2019 का लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी के ही चेहरे पर लड़ा और उसे 303 सीटें मिलीं। तब भाजपा ने प्रचारित किया था कि मोदी के सिवा देश में कोई विकल्प नहीं है। ‘आप’ ने इसी से सबक लेकर दिल्ली विधानसभा के इस चुनाव में यह प्रचारित किया कि केजरीवाल का कोई विकल्प नहीं है। यही ‘टीना’ यानी ‘देयर इज नो अल्टरनेटिव’ फैक्टर है। आप ने अपना प्रचार इसी पर केंद्रित करते हुए 39 स्टार प्रचारक उतारे। तीन बड़े रोड-शो किए और छोटी-छोटी जनसभाएं कीं, जबकि भाजपा ने धुआंधार प्रचार किया। अधिसूचना जारी होने के बाद 23 दिनों के भीतर भाजपा ने लगभग 100 नेता चुनाव प्रचार में उतार दिए। शाह-मोदी समेत 40 स्टार प्रचारकों ने प्रचार किया। लगभग 4500 नुक्कड़ सभाएं की गईं। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने सभी 70 सीटों को कवर किया। शाह ने तो गलियों में पर्चे तक बांटे। एक मौका ऐसा आया, जब आप के हाथों से चुनाव निकलता दिख रहा था, लेकिन तभी भाजपा ने अति उत्साह और अति आत्मविश्वास में दो ऐसी गलतियां कर दीं, जो उस पर भारी पड़ गईं। पहली गलती यह कि केजरीवाल को उसने आतंकवादी बता दिया और दूसरी, उन्हें एंटी हिन्दू बताने की कोशिश भी की। इसके जवाब में केजरीवाल बोले, ‘मैं दिल्ली का बेटा हूं’। भाजपा के जिन दो प्रत्याशियों तेजिंदरपाल सिंह बग्गा और कपिल मिश्रा ने केजरीवाल को अतंकी कहा था, उनकी करारी हार हुई, जबकि जिस तीसरे नेता प्रवेश वर्मा ने यह गलती की थी, उनके लोकसभा क्षेत्र में पार्टी का खाता तक नहीं खुला।

केजरीवाल ने बदला रवैया

वर्ष 2015 में आप 70 में 67 सीटें जीतने में सफल हुई थी। तब केजरीवाल प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ खूब मुखर थे। जब उनके दफ्तर पर सीबीआई ने छापा मारा, तो केजरीवाल ने कहा था, ‘मोदी राजनीतिक तौर पर मेरा सामना नहीं कर सकते, इसलिए इस तरह की कायरता दिखा रहे हैं।’ इसके बाद वर्ष 2017 में हुए एमसीडी के चुनाव में दिल्ली की तीनों एमसीडी मिलाकर 272 सीटों में भाजपा ने 181 सीटें जीत ली थीं। आप को तीनों एमसीडी में सिर्फ 49 सीटें ही मिल पाई थीं। यह आप के लिए ‘टर्निंग प्वॉइंट’ था। इससे सबक लेते हुए केजरीवाल ने रणनीति बदली और मोदी पर हमले कम कर दिए। इसी के मद्देनजर केजरीवाल ने 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी पर निजी हमले करने की गलतियां नहीं दोहराईं। यहां तक कि जब पाकिस्तान के मंत्री फवाद हुसैन ने कहा कि देश के लोगों को मोदी को शिकस्त देनी चाहिए, तब केजरीवाल ने जवाब दिया कि मोदी जी मेरे भी प्रधानमंत्री हैं। हमें अपने आंतरिक मसलों में आतंकवाद के सबसे बड़े प्रायोजकों का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं है।

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अंतत: जिस तरह लोकसभा चुनाव में मोदी को आगे रखते हुए भाजपा ने राष्ट्रवाद का मुद्दा उठाया था, उसी तरह आप ने दिल्ली के चुनाव में केजरीवाल का चेहरा आगे रखते हुए विकास के एजेंडे पर फोकस किया और स्थानीय मुद्दों को लेकर किए गए काम और फ्री योजनाओं का खूब प्रचार किया। इसके तहत आप ने निजी स्कूलों को मनमानी फीस बढ़ाने से रोकने और सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने, मोहल्ला क्लीनिक खुलवाने, हर महीने 20 हजार लीटर मुफ्त पानी, हर महीने 200 यूनिट बिजली मुफ्त देने और डीटीसी बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा और बुजुर्गों के लिए तीर्थयात्रा जैसी योजनाओं को खूब भुनाया। आप के दावे के मुताबिक इन योजनाओं के चलते दिल्ली के जिन 80 फीसदी लोगों को फायदा हुआ, उनमें बड़ा तबका गरीब और निम्न मध्यवर्गीय है, जो आप का वोट बैंक है।

सीएम चेहरा न होने से भी भाजपा को नुकसान

भाजपा की इस बार कोई सीएम कैंडिडेट घोषित न करने की रणनीति भी उस पर भारी पड़ी, जबकि सन् 2015 के चुनाव में भाजपा ने किरण बेदी को सीएम कैंडिडेट बनाया था। ऐसे में आप के प्रचार में बार-बार यह सवाल उठाया जाता रहा कि भाजपा का सीएम कैंडिडेट कौन है। दूसरी तरफ भाजपा ने प्रचार की शुरुआत ही 1800 अवैध कॉलोनियों को नियमित बनाने के मुद्दे से की थी। फिर, शाहीन बाग में सीएए के विरोध में प्रदर्शन जैसे मुद्दे पर आप को घेरने में थोड़ी सफल भी हुई थी। हालांकि इसका उसे कोई खास फायदा नहीं मिला, क्योंकि केजरीवाल इस पर सीधे-सीधे कुछ बोलने से बचते रहे। यही नहीं, भाजपा ने पहला चुनाव वर्ष 1984 में लड़ा था। तब जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 हटाने का वादा किया था। पांच साल बाद 1989 में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और यूनिफॉर्म सिविल कोड भी भाजपा के वादों की सूची में जुड़ गया। भाजपा दोनों वादे पूरे भी कर चुकी है। फिर भी, इसके बाद हुए चार में तीन विधानसभा चुनावों में वह हार गई। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा सीटें हासिल करने के बावजूद विपक्ष में बैठी। हरियाणा में जजपा की मदद से सरकार बनानी पड़ी। अंतत: झारखंड में भी हार गई। अब दिल्ली का सपना भी पूरा नहीं हो सका।

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ट्रेंड्स भी बता रहे थे होगी ‘आप’ की जीत

दिल्ली विधानसभा के लिए जब भी वोटिंग कम होती है, तो सरकार नहीं बदलती है। वर्ष 2003 में 53 फीसदी मतदान हुआ था और 2008 में 58 प्रतिशत वोटिंग हुई थी। इन दोनों चुनावों में सरकार नहीं बदली थी। जबकि वर्ष 2013 में दिल्ली के लोगों ने उस वक्त तक की सबसे ज्यादा 65.63 प्रतिशत मतदान किया था और जब नतीजे आए थे, तो 15 साल से सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार की विदाई हो गई। यही नहीं सन् 2015 के चुनाव में अब तक का सबसे ज्यादा 67.12 फीसदी मतदान हुआ था। इसका परिणाम आया तो 70 में 67 सीटें आम आदमी पार्टी ने जीत ली थीं। यह ट्रेंड एक बार फिर खरा उतरा। दिल्ली विधानसभा चुनाव-2020 में 62.59 फीसदी ही मतदान हुआ था, जो पिछले चुनाव के मुकाबले लगभग पांच प्रतिशत कम हैं। इन टे्रंड्स के आधार पर इस बार भी आप की सरकार बननी तय थी।

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 कांग्रेस के मुकाबले से बाहर होने से भी ‘आप’ को मिली ताकत

आप के लिए एक और बात लाभदायक साबित हुई कि कांग्रेस के मुकाबले से बाहर होने की वजह से चुनाव त्रिकोणीय नहीं बना। कांग्रेस सन् 2015 की तरह इस बार भी शून्य पर ठहर गई। कांग्रेस के प्रदर्शन से उपजी निराशा कुछेक पार्टी नेताओं में स्पष्ट दिखाई भी देती है। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित ने कहा, मुझे यकीन था कि कांग्रेस बदतर प्रदर्शन करेगी। दिल्ली कांग्रेस और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के दो-तीन नेता इस बर्बादी के लिए जिम्मेदार है, जबकि चुनाव नतीजों पर कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा, लोगों ने मन बना लिया था कि वे आप या भाजपा को वोट देंगे। यह चुनाव विकास के मुद्दे पर हुआ। प्रधानमंत्री से लेकर कार्यकर्ताओं तक पूरी सरकार चुनाव में झोंक दी गई थी। बावजूद इसके वह आप का रास्ता नहीं रोक सकी।

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‘आप’ से मात्र पांच सीटें छीन पाई भाजपा

दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम के मुताबिक पांच सीटों के नुकसान के साथ आम आदमी पार्टी की 62 सीटों पर जीत हुई, जबकि भाजपा 5 सीटों के फायदे के साथ 8 सीटें जीतने में सफल रही। वहीं, कांग्रेस खाता भी नहीं खोल पाई। आप को महज एक प्रतिशत के नुकसान के साथ 54 फीसदी वोट मिले, जबकि भाजपा को 8 प्रतिशत फायदे के साथ 40 फीसदी वोट मिले। वहीं, कांग्रेस को 6 फीसदी नुकसान के साथ मात्र 4 प्रतिशत वोट मिले। अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, गोपाल राय, सत्येंद्र जैन, इमरान हुसैन, कैलाश गहलोत व राजेंद्र पाल गौतम, रामनिवास गोयल, राखी बिड़ला, राघव चड्ढा, आतिशी, दिलीप पांडेय, सौरभ भारद्वाज सहित आप के सभी दिग्गज चुनाव जीत गए हैं। आप ने मौजूदा 46 विधायकों को मैदान में उतारा था, जिनमें से दो को छोड़ सभी जीत गए। इस चुनाव में सबसे रोचक पटपडग़ंज सीट से मनीष सिसौदिया का जीतना रहा। वह 12 राउंड की गिनती तक पीछे थे, 13वें राउंड में आगे निकले।

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इस जीत के साथ ही अरविन्द केजरीवाल को सरकार बनाने की हैट्रिक लगाने का मौका मिला है। वह पहली बार 2013 में 48 दिन मुख्यमंत्री रहे, फिर इस्तीफा दे दिया था। दूसरी बार 14 फरवरी, 2015 को सत्ता संभाली थी। ऐसे में भाजपा 22 साल और कांग्रेस 7 साल से दिल्ली के ‘सिंहासन’ से दूर है। इस बार दिल्ली विधानसभा चुनाव में 70 सीटों के लिए 8 फरवरी को 62.59 फीसदी वोट डाले गए थे। हालांकि 11 फरवरी को मतगणना शुरू होने के मात्र 15 मिनट के रुझानों में ही केजरीवाल को बहुमत मिल गया था और 21 मिनट में सभी 70 सीटों के रुझान आने के साथ ही आप ने 50 से अधिक सीटों पर लीड ले ली थी। इस दौरान भाजपा 18 सीटों पर पहुंच गई, जबकि कांग्रेस एक सीट पर बनी रही। डेढ़ घंटे में इस इकलौती सीट पर भी कांग्रेस जीरो पर पहुंच गई। हालांकि पहले मिनट में आया पहला रुझान भाजपा के पक्ष में रहा, लेकिन बाद में सूरज के चढऩे के साथ आप का ग्राफ भी चढ़ता गया।

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Web Title: Arvind Kejriwal changed his strategy to win ( Hindi News From Newstimes)


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