'जनता कर्फ्यू एक अभिनव शब्द या प्रयोग'


Rajnish Verma 24/03/2020 11:31:45
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प्रो. नन्द लाल वर्मा

कोरोना जैसे वायरस से उत्पन्न संकट की घड़ी में "जनता कर्फ्यू" एक अभिनव व अदभुत प्रयोग सिद्ध होता नजर आया। देश के प्रधानमंत्री द्वारा 22 मार्च को एक दिन स्वयं द्वारा घोषित कर्फ्यू में देशवासियों से घर से बाहर न निकलने की अपील की गई थी और शाम को पांच बजे घरों की छतों/बालकनी/दरवाजों पर घर में सहज रूप से उपलब्ध घंटा/ घड़ियाल/लोटा/बाल्टी परात, कनात, कनस्तर मजीरा आदि और यदि इनमें से कुछ न मिल सके तो तालियां ही बजाकर प्रशासनिक, सुरक्षा, पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के उन कर्मचारियों और अधिकारियों के प्रति कृतज्ञता और धन्यवाद ज्ञापित कर उनकी हौसला अफजाई करें जो विगत कई दिनों से दिन रात मेहनत कर अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन करते आ रहे हैं।

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देश के प्रधानमंत्री की अपील को जनता ने अपने अपने ठंग से समझा और अपने हिसाब से उसका पालन कर इस राष्ट्रीय धर्म निभाने में कोई विलंब और कोर-कसर नहीं छोड़ी। देश की सरकार के जिम्मेदार और संवेदनशील लोगों की जिम्मेदार जनता ने भी उसी भाव से बखूबी पारस्परिक सहयोग और उत्तरदायित्व का निर्वहन करते हुए करोना जैसे भयंकर वायरस को चंद मिनटों की मेहनत के बल पर उल्टे पांव भागने पर मजबूर कर और उसे ठिकाने लगाने पर विजय प्राप्त करते हुए, जो आत्मसंतोष व संतुष्टि महसूस की होगी, उसकी शब्दों में अभिव्यक्ति संभव नहीं है।

शाम पांच बजते ही घर में सहज रूप से उपलब्ध घरेलू वाद्ययंत्रों की विभिन्न प्रकार की ध्वनि प्रतिध्वनियों से हमारे मोहल्ले के कुछ लोगों ने पीएम के वास्तविक मंतव्य के हिसाब से और अधिकांश लोगों इसे करोना भगाने या उसका दुष्प्रभाव कम करने का महामंत्र समझकर साथ में करोना भगाने या भाग जाने के स्वरों के साथ आरती रूपी गायन के साथ माहौल धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से रोमांचित और रोमांटिक भी बनते दिखा। लोग दस-पन्द्रह मिनट तक वातावरण को तालियों की गड़गड़ाहट और वाद्ययंत्रों से निकलती नाना प्रकार की ध्वनियों और प्रतिध्वनियों से गुंजायमान करते रहे। नेताओं से लेकर अभिनेताओं और देश के हर नागरिक, यहां तक कि हर घर के छोटे छोटे बच्चे भी अपने कर्ण प्रिय शोर से इस उत्सव को नवीन उचाईयों तक पहुंचाने में मसगूल दिखे।

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मेरी पत्नी ने भी उसी भीड़-चाल का अनुसरण करते हुए घर में गणेश परिक्रमा जैसी कर पहले घंटी बजाई, फिर थाली से चम्मच का जोरदार मिलन कराया और उसके बाद तालियां बजाकर भी धर्म निभाने में न तो कोई विलंब होता हुआ और न ही कोई चूक होती दिखी। पत्नी के इस उपक्रम में मोहल्ले के अन्य लोगों जैसी ही धार्मिकता और आध्यात्मिकता का पुट/भाव ज्यादा और वैज्ञानिकता का तत्व/भाव दूर-दूर तक नहीं दिख रहा था। यह सब देखकर मैं भौचक और हतप्रभ था और आधुनिक विज्ञान के इस युग में लोगों की...पर हंसी और गुस्सा भी आ रहा था। 

सबसे क्लासिक घटना: इस शोर-शराबे को गली में खड़ी एक कार के नीचे बैठे मानव जाति का सबसे नजदीकी और वफादार जानवर ने मानव जाति के ऊपर छाए किसी संकट का आभास करते हुए और वफादारी का धर्म निभाने की नीयत से अपनी "भों...भोंं...ओं...ओं...ओं...ओं" की आवाज निकालते हुए जैसे ही मानव जाति के उपजे संकट निवारण में स्वर में स्वर मिलाने का प्रयास करते हुए साथ देना शुरू किया तो पड़ोसी को कुछ अपशकुन होने की आशंका का पूर्वाभास और अदृश्य डर ने तुरंत हाथ में एक मोटा-लंबा डंडा लेने में मजबूर करते देर नहीं लगी। उसके बाद क्या हुआ होगा, उसे आप अच्छी तरह समझ सकते हैं। इस सम्पूर्ण घटनाक्रम को देखकर नब्बे के दशक में गणेश जी द्वारा दूध पीने की हुई ऐतिहासिक घटना का याद आ जाना भी स्वाभाविक और सहज था और जनता की अज्ञानता और अंधविश्वास की पुष्टि होती हुई भी एक बार फिर दिखी। धार्मिक स्थलों में घंटों की आवाज पर प्रतिबंध लगाकर हर घर में घंटियां बजवाने का यह अनूठा व अद्वितीय प्रयोग की अपार सफलता को क्या नाम दिया जाना चाहिए?

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इस शोर में व्याप्त जनता की भावुकता, युद्ध जैसा जोश, ललकार प्रेरित और प्रभावित करने जैसा नजर आने पर कथित कुछ राष्ट्र भक्तों ने इसे "राष्ट्रव्यापी हांका/पुकार" की संज्ञा देते हुए इसे देश की जनता की राष्ट्रीय नेतृत्व के प्रति अगाध एकता, विश्वसनीयता और एकजुटता तक बताया जा रहा है। ऐसे राष्ट्रभक्त इसे "एक राष्ट्र, एक धर्म, एक स्वर, लय, ताल और....... के रूप में व्याख्या करने से बाज नहीं आ रहे हैं। घरों और धर्मस्थलों से निकले इन विभिन्न ध्वनियों का ब्रम्हांड तक जाने की बात तक बताई जा रही है। इस सम्पूर्ण उपक्रम के कारण को एक विशेष वर्ग के कुछ राजनीतिक लोग इस तरह बताते हैं कि "आज जब देश की राजनीति की ओवरडोज मोबाईल से होकर जनता के दिमाग में घुसकर अपनी विश्वसनीयता खो रही है, देश का सोशल मीडिया जब सामाजिक और राजनैतिक कड़वाहट का टेंडर उठाने पर तुली है, ऐसे में एक दिन पीएम का टीवी पर आवाह्न होता है। उनका भाषण समाप्त होते ही राजनीति की चुस्कियां लेने वालों के बीच उसके पक्ष-विपक्ष पर चर्चाएं होने लगती हैं।

मोदी विरोध में सत्य-असत्य और अच्छे-बुरे का भेद खो चुके लोग, इस घातक बीमारी से लड़ाई की मानवीय पुकार में भी बुराई ढूंढने बैठ जाते हैं। देश उनकी नहीं सुनता और चुपचाप तय कर लेता हैं कि उसे आगामी रविवार को क्या करना है। तीन दिनों तक जनता कर्फ्यू की बहस में लगी रहती है और रविवार का दिन आते ही सड़कों पर ऐसा सन्नाटा पसरा दिखाई देता है, जैसा कभी दंगों के समय भी न देखा गया और न ही सुना गया था। वह इसे लिखते हैं कि जनता को पीएम के भाषण में ईमानदारी, एक अभिभावक की पीड़ा और मरहम दिखाई देता है और जनता उनके साथ इस संकल्प के साथ हो लेती है कि "करोना को हराना है"।

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करोना जैसे दुश्मन वायरस के अदृश्य खौफ, भय या डर से जनता की इस ख़ामोश जंग से यह तो सिद्ध हो जाता है कि हमारे देश के लोग किसी भी महामारी से जंग लेने के लिए हर मोर्चे पर पूरी तरह से मुस्तैद है। सरकार ने निर्णय लिया है कि देश के कर्मचारी और अधिकारी, यहां तक कि सरकार भी "होम क्वारांटाइन" मोड में कार्य करेंगी। दहशत को हावी होने देने की बजाय "हौसले और आत्मविश्वास" का एंटीवायरस हमारे जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

सरकार की अपील पर जनता कर्फ्यू की अपार सफलता का श्रेय लेने के चक्कर या सरकार की "गुड बुक" में बने रहने की नीयत से कुछ जिलों के आला अधिकारियों ने शाम होते ही मिली सफलता से अभिभूत प्रशासनिक अमले ने इसे विजय जुलूस की शक्ल में बदलते हुए सड़क पर भीड़ के साथ उतरने और उसे सोशल मीडिया में वायरल करने में देर लगाना उचित नहीं समझा। कुछ जिलों के अधिकारियों को इस असंवेदनशीलता और "सोशल डिस्टेंस" के भावार्थ की अज्ञानता से सरकार द्वारा की गई निलंबन की कार्रवाई का शिकार भी होना पड़ा है।

अगले दिन मीडिया जगत में इस व्यापक घटनाक्रम को अपने ढंग,प्रकृति और विचारधारा के हिसाब से परिभाषित और विश्लेषित कर जनता के सामने परोसा गया।विभिन्न अखबारों में मोटी-मोटी हेडिंग जैसे" जनता कर्फ्यू का कन्या कुमारी से कश्मीर तक जबरदस्त प्रभाव, कोरोना वायरस के विरुद्ध देश की जनता की युद्ध स्तरीय तैयारी, चीन के कोरोना वायरस के विरुद्ध एकजुट दिखा देश, जनता की एकजुटता के सामने घुटने टेकते नजर आया कोरोना, उल्टे और दबे पांव भागने पर मजबूर हुआ कोरोना, सामूहिक संकल्प शक्ति की अद्भुत मिसाल, हिंदुस्तान के लोगों से थर-थर कांपा कोरोना, बाजा बजाकर कोरोना का बाजा बजाया जनता ने आदि से छपे समाचार दिखाई दिए।

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सड़कों, गालियों, हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों, सार्वजनिक व धार्मिक स्थलों पर पसरे सन्नाटे, सार्वजनिक आयोजन, परिवहन और अन्य सेवाओं के अर्थात सड़क से लेकर संसद तक ठप रहने की फोटो छापते हुए मीडिया के विभिन्न तंत्रों ने "जनता कर्फ्यू" के "रविवार" की सफलता को अद्वितीय, अभूतपूर्व, अनूठा और अजूबा सन्डे की संज्ञा से नवाजने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। देश के विभिन्न क्षेत्रों की नामी-गिरामी हस्तियों के फोटो, संदेश और वक्तव्यों को छापकर इस कर्फ्यू की सफलता की संवेदनशीलता, उत्कृष्टता और टीआरपी बढ़ाने में भी कोई कमी नहीं छोड़ी। सरकार और मीडिया जगत की ओर से खड़े लोग भावी खतरों के विरुद्ध खड़ी देश की साहसी योद्धा जनता की राष्ट्र के प्रति एकजुटता और प्रतिबद्धता को युद्ध जैसी तैयारी के रूप में उल्लिखित और परिभाषित कर उसके प्रति धन्यवाद भी ज्ञापित करते दिखे। 

मीडिया के कुछ लोगों ने तो इसे एक सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक और यहां तक कि उसे आध्यात्मिक रंग देते हुए परोसने में कोई संकोच नहीं किया। गोदी मीडिया ने तो देश के केंद्रीय नेतृत्व की तुलना सादगी की प्रतिमूर्ति भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री से तक कर डाली और जनता को भरोसा भी दिया कि "रविवार" का दिन किंवदंतियों, किस्सों, कथा - कहानियों, इतिहास, नेतृत्व और सामाजिक मनोविज्ञान जैसे विषयों के अध्ययन की खुराक बन चुका है। एक लेखक ने पाठकों को सम्बोधित करते लिखा है "आप गर्व कीजिए कि आपको "सद्भाव और सहिष्णुता" के "वैश्विक प्रतीक" भारत में जन्म मिला है"। आगे और लिखते हैं कि यह रविवार आने वाली पीढ़ी को इतिहास के रूप में याद कराया जाएगा। केंद्रीय नेतृत्व के कसीदे गढ़ते हुए लिखते हैं कि "प्रधान मंत्री जी की एक आवाज पर "सारा देश" उनके पीछे ठीक उसी प्रकार चल पड़ा, जैसे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देश की जनता महात्मा गांधी जी के पीछे चल पड़ी थी"।

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मीडिया ने यह भी लिखा है कि हम भारतीयों ने वह कर दिखाया जो किसी भी व्यक्ति, समूह या देश को "अमरत्व" की ओर ले जाता है। मेरे विचार से आज आध्यात्मिकता का इससे उत्कृष्ट और अनूठा/नवीन प्रयोग तथा उदाहरण और क्या हो सकता हैं! घंटा, शंख, ताली आदि बजाकर सेवाकर्मियों के प्रति कृतज्ञता और धन्यवाद ज्ञापित करने के बजाय देश की अधिकांश जनता ने इसे कोरोना के इलाज का उपाय या उसे भगाने का मंत्र समझकर इसे सामाजिक और सामूहिक शोर में तब्दील करती नजर आती दिखी।शाम के पांच बजते ही हाथ में घंटा घड़ियाल लेकर जनता ने सड़क पर जुलूस निकालकर महामारी के प्रति बरती जाने वाली सावधानियों का खूब मजाक और मखौल उड़ाते देर नहीं लगाई और हद तो तब हो गई जब स्थानीय जिला प्रशासन के कुछ आला अधिकारी भी "जनता कर्फ्यू" की सफलता की वाहवाही लूटने और शासन की नजरों में अच्छी इमेज के चक्कर में घोर असंवेदनशीलता का परिचय देते हुए जुलूस का नेतृत्व करते दिखाई दिए। मजाकियों और मदारियों से भरे देश की लालची, खुदगर्ज और नासमझ जनता और कुछ अधिकारियों के ऐसे कृत्य से यह आभास होता है कि यह देश को भविष्य की चुनौतियों से कम, मूर्खो की मूर्खता और अंधभक्ति से ज्यादा जूझना पड़ेगा।

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सामाजिक स्तर पर सफलता और सार्थकता पर मीडिया के अधिकांश लोगों ने "इस एक दिनी आयोजन को जाति के सारे बंधन तोड़ने, धार्मिक दीवारें ढहाने, व्याप्त वर्गीय अहंकार तोड़कर दुम दबाकर भागने के रूप में महिमामंडित किया है और इस "जनता कर्फ्यू" को एक अनुष्ठान बताते हुए इसे"राष्ट्र सुरक्षा के संकल्प और सौगंध" के रूप में लिए जाने के आवाह्न के साथ इसे सेवाव्रतियों के सम्मान में किए गए महायज्ञ में जनता के घरों में बन्द"एकांतवास और सामूहिक सौगंध" की पड़ी आहुति के रूप में महिमा मंडित किया जा रहा है।एक अंधभक्त ने यहां तक कह डाला है कि"इस समय देश को ऐसा प्रधान मंत्री मिला है जिसने खौफ के माहौल में भी त्यौहार जैसी स्थिति पैदा कर, दिल को खुश कर दिया"।

अधिकांश खबरों और लेखों की भाषा शैली एक बार फिर गोदी मीडिया के जिंदा रहने का अहसास करा गई। इसी दौरान संत परम्परा से गेरुआ वस्त्र धारण किए चक्रपाणि महाराज कोरोना की शांति के लिए फोटो पर खीर, हलवा, पूरी और प्रसाद चढ़ाते हुए "करोना शांत हो!" का धार्मिक जाप करते हुए दिखाई दिए। कोरोना फैलाने की आशंका के आरोप में सरकार द्वारा सीएए का विरोध कर रहे लोगों के खिलाफ करोना महामारी कानून के तहत एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई करने के भी समाचार मिल रहे हैं।

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काल्पनिक कथा-कहानियों के संसार में देश की भावी पीढ़ी के लिए एक और कहानी सुनाने के लिए जुड़ गई है। जीवन में शासन और प्रशासन द्वारा समय समय लगाए गए "कर्फ्यू" का अर्थ और उसका अहसास था, लेकिन जीवन में पहली बार "जनता कर्फ्यू" नाम की नई शब्दावली सुनी, उसके प्रत्यक्ष प्रभाव को देखा और अनुभव भी हुआ। इस महामारी से लड़ने के लिए एक दिन के लिए घर से बाहर न निकलने अर्थात घर में ही रहने की अपील के अनुपालन को कर्फ्यू शब्द से परिभाषित किया जाना भाषा विज्ञान के हिसाब से कितना उचित और उपयुक्त प्रतीत होता है?

जनता कर्फ़्यू पर सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्रों में वैचारिक भिन्नता दिखना बहुत स्वाभाविक सा है। पक्ष और विपक्ष अपने-अपने हिसाब से इस घटना का अवलोकन और अनुमान लगाने में जुट गए हैं। क्या यह जनता में पॉप्युलैरिटी के उद्देश्य से राजनैतिक प्रबंधन शास्त्र में नवीन अत्याधुनिक तकनीक से निकला कोई नया सामाजिक राजनीति के तापमान मापने का अभिनव प्रयोगवादी यंत्र तो नहीं है? राजनीतिक परिवेश में इस महामारी की आशंका के डर के विरुद्ध जन प्रतिक्रिया और सहयोग की डिग्री नापने के साथ उसके अंधविश्वास, मूर्खता और नेतृत्व की सामाजिक कसौटी के लिए उठाया गया राजनैतिक कदम के रूप में भी देखने और विश्लेषण करने के प्रयास किए जाना भी वर्तमान राजनीति में एक अभिन्न अंग सा बन चुका है।

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सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक आधार पर हो रहे विश्लेषण को छोड़कर यदि एक संवेदनशील नागरिक की हैसियत से यदि कोरोना वायरस से उपजी आशंकाओं और संक्रमण की भयावहता और सरकार द्वारा उठाए गए कदमों को दृष्टिगत रखते हुए यह निष्कर्ष जरूर निकलता है कि महामारी से निपटने के लिए सरकार का अप्रत्याशित अतिरिक्त खर्च का भार और लंबे समय तक लॉक डाउन होने की स्थिति से मंदी और बेरोज़गारी से त्रस्त देश की अर्थव्यवस्था को एक और बड़ा झटका लगने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।

लंबे समय तक लॉक डाउन से वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में अप्रत्याशित कमी और व्यापारिक गतिविधियां बंद होने की मार सरकार और आम जनता को लंबे समय तक झेलनी पड़ सकती है। आगामी निकट भविष्य में जीडीपी उस न्यूनतम स्तर पर जाने की संभावना व्यक्त की जा रही है, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। शेयर बाजार में आई अभूतपूर्व और अप्रत्याशित गिरावट इसका एक भयंकर लक्षण प्रकट हो चुका है। बैंकों की आर्थिक सेहत की बुरी खबरों और इस महामारी की आशंका से उत्पन्न विभिन्न संकटों विशेष रूप से आर्थिक संकट से निपटने के लिए सरकार, पूंजीपतियों और जनता को सामूहिक रूप से युद्ध स्तर पर तैयारी कर लंबी और कठिन लड़ाई लड़ने के लिए तैयार रहना होगा।

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स्थानीय लॉक डाउन की समयावधि के हिसाब से अचानक उपजी क्राइसिस से आम जनता या उपभोक्ता वर्ग पर सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव पड़ने की संभावना दिखती है। लॉक डाउन उठने के बाद ही नेचुरल क्राइसिस और आर्टिफिशियल क्राइसिस से उपजा वास्तविक संकट आम जनता को महसूस होगा। "रोज कमाना, रोज खाना" जीवन पद्धति पर निर्भर अनियमित, अनिश्चित और निम्न आय वर्ग के उपभोक्ताओं पर महामारी के संकट और उससे उपजे अभाव का सबसे अधिक दुष्प्रभाव पड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। लॉक डाउन रहते और उसके उठने के बाद संभावित अफरा तफरी से भरे माहौल और परिस्थितियों से निपटना राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभर सकती है।

ये लेखक के निजी विचार हैं।

नन्द लाल वर्मा, एसोसिएट प्रोफेसर
वाई.डी. पीजी कॉलेज लखीमपुर- खीरी।
(9415461224)

Web Title: Public curfew is an innovative word or usage ( Hindi News From Newstimes)


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