हाल ही में किए गए एक शोध में खुलासा हुआ है कि डायबिटीज की दवा लेने वाली महिलाओं में कोरोना वायरस के संक्रमण का खतरा कम होता है
डायबिटीज की दवा से महिलाओं में कोविड-19 का खतरा कम

धर्मेन्‍द्र त्रिपाठी

हाल ही में किए गए एक शोध में खुलासा हुआ है कि डायबिटीज की दवा लेने वाली महिलाओं में कोरोना वायरस के संक्रमण का खतरा कम होता है। यह शोध अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा के शोधकर्ताओं ने किया है।  

इस शोध में शामिल मिनेसोटा यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता कैरोलिन ब्रमांटे का कहना है कि अध्‍ययन के दौरान पाया गया कि डायबिटीज के लिए दी जाने वाली दवा ‘मेटफॉरमिन’ का महिलाओं और पुरुषों पर अलग-अलग प्रकार से असर होता है। डायबिटीज की रोकथाम में यह दवा पुरुषों की तुलना में महिलाओं पर दोगुना ज्यादा असर करती है। कैरोलिन का कहना है कि यह दवा शरीर में मौजूद एक प्रोटीन ‘टीएनएफ-अल्फा’ की मात्रा को भी घटाती है। हाल ही में हुए एक शोध में यह सामने आया है कि इस प्रोटीन का स्तर बढ़ने से कोविड-19 के लक्षणों में बढ़ोतरी होती है।  

 

वैसे तो ‘मेटफॉरमिन’ को लेकर प्रयोगशाला में नर और मादा चूहों पर टेस्ट होते रहे हैं, इसलिए यह जानकारी पहले से मौजूद है, लेकिन इंसानों पर ऐसे टेस्ट अभी नहीं हुए हैं। कैरोलिन ब्रमांटे के अनुसार, ‘मेटफॉरमिन’ आसानी से मिलने वाली दवा है जिसका सेवन सुरक्षित भी है और सस्ता भी। ऐसे में इसे कोविड-19 के इलाज के विकल्प के रूप में देखा जा सकता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा के शोधकताओं ने इंसानों पर ‘मेटफॉरमिन’ के असर को देखने के लिए अमेरिका में 6,200 ऐसे महिला और पुरुषों का डाटा जमा किया, जो मधुमेह और मोटापे के शिकार थे। ये सभी लोग कोविड-19 से ग्रसित थे और इन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों ने शोध के दौरान पाया कि जिन महिलाओं ने ‘मेटफॉरमिन’ का 90 दिन का कोर्स पूरा किया था, उनमें से बहुत कम महिलाओं की मृत्‍यु हुई, जबकि इस दवा को न लेने वालों में मृत्यु दर काफी ज्यादा थी।

डॉक्टरों ने इन सभी लोगों की सेहत से जुड़े अन्य पहलुओं पर भी नजर डाली और इस बात पर भी ध्यान दिया कि उनकी जान को और किस-किस बीमारी से खतरा था या स्वास्थ्य के लिहाज से वे कितने फिट और कितने कमजोर थे। इस तरह से अन्य सभी रिस्क फैक्टर हटाने के बाद उन्होंने पाया कि ‘मेटफॉरमिन’ दवा लेने वालों में जान जाने का खतरा 21 से 24 फीसदी तक कम था। हालांकि इसी अध्ययन के दौरान पुरुषों में ऐसा कोई असर देखने को नहीं मिला।

इन दिनों कोरोना महामारी (coronavirus pandemic) के बीच दुनिया भर में कई तरह के शोध (research) हो रहे हैं और उनके नतीजे भी प्रकाशित किए जा रहे हैं। हालांकि आम तौर पर विज्ञान जगत में ऐसा नहीं होता है। किसी भी शोध को पुख्‍ता साबित करने के लिए उस पर काफी सारा डाटा (data) जमा किया जाता है और फिर अन्य वैज्ञानिक उसकी समीक्षा भी करते हैं।

 इसमें काफी समय लगता है। इसके बाद शोध का नतीजा प्रकाशित किया जाता है। हालांकि मौजूदा हालात में ऐसा नहीं हो रहा है। शायद इसकी वजह विशेषज्ञों को यह उम्मीद है कि एक शोध शायद किसी दूसरे शोध में मदद दे सके। ऐसे में रिसर्च पेपर (research paper) होने के बाद भी ऐसा नहीं है कि डॉक्टर फौरन ही मरीजों को डायबिटीज (diabetes) की यह दवा देने लगेंगे। इस पर आगे अभी और अध्‍ययन की आवश्‍यकता होगी।