पूरा भारत 74वें स्वतंत्रता दिवस समारोह की तैयारी में जुटा है। पर्यटन मंत्रालय ने इसे यादंगार बनाने के लिए 'देखो अपना देश' वेबिनार श्रृंखला तैयार की है।

-- शिव प्रसाद सिंह


पूरा भारत 74वें स्वतंत्रता दिवस समारोह की तैयारी में जुटा है। पर्यटन मंत्रालय ने इसे यादंगार बनाने के लिए 'देखो अपना देश'  वेबिनार श्रृंखला तैयार की है। इसके अंतर्गत, 10 अगस्त को ‘सेलुलर जेल: पत्र, संस्मरण और यादें’ शीर्षक पर एक वेबिनार का आयोजन किया गया। इस 46वें वेबिनार में सेलुलर जेल के गलियारों और सेलों के माध्यम से भारत के स्वतंत्रता संग्राम की यात्रा को प्रदर्शित किया गया। वीर सावरकर, बीके दत्त, फज़ले हक खैराबादी, बरिंद्र कुमार घोष, सुशील दासगुप्ता जैसे कुछ बहुत प्रसिद्ध सेनानियों के जीवन और कहानियों को प्रस्तुत किया गया। इस में भारत की स्वतंत्रता के लिए अंडमान में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के महत्वपूर्ण योगदान का भी उल्लेख किया गया। 

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के पोर्ट ब्लेयर में स्थित सेलुलर जेल में अंग्रेजों ने आजादी के लिए लड़ रहे भारतीयों को बहुत ही अमानवीय परिस्थितियों में कैद कर रखा था। वर्तमान में यह एक राष्ट्रीय स्मारक है।



क्यों कहा गया सेलुलर जेल?

इस जेल का निर्माण एकान्त कारावास के उद्देश्य से केवल व्यक्तिगत सेलों का निर्माण करने के लिए किया गया था। मूल रूप से, इमारत में सात विंग थे, जिसके केंद्र में एक बड़ी घंटी के साथ एक टॉवर बना हुआ था। उसका संचालन गार्ड द्वारा होता था। प्रत्येक विंग में तीन मंजिलें थीं और प्रत्येक एकान्त सेल की लंबाई-चौड़ाई लगभग 15 फीट और 9 फीट थी, जिसमें 9 फीट की ऊंचाई पर एकमात्र खिड़की लगी थी। इन विंगों को एक साइकिल के स्पोक्स जैसा बनाए गया था और एक विंग के सामने दूसरे विंग के पिछले हिस्से को रखा गया था। ऐसे में एक कैदी को दूसरे कैदी के साथ संवाद करने का कोई भी माध्यम उपलब्ध नहीं था।

इसके माध्यम से याद दिलाया गया कि किस प्रकार से 1857 का वर्ष ब्रिटिश वर्चस्व के लिए एक खतरा बन गया था। अंततः 19वीं शताब्दी का मध्य आते आते सेनानियों ने अंग्रेजी साम्राज्य को हिलाकर रख दिया था। 

सेलुलर जेल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

20वीं सदी के राजनीतिक माहौल ने स्वतंत्रता संग्राम के कई चरण देखे हैं, जैसे कि गांधीजी की अहिंसा वाली नीति और सविनय अवज्ञा आंदोलन और कई अन्य अभियान। जेल का निर्माण कार्य 1896 में शुरू होकर 1910 में पूरा हुआ। इसकी मूल इमारत एक गहरे भूरे लाल रंग की ईंटों से बनी हुई थी। इमारत में सात विंग थे, जिसके केंद्र में एक टॉवर की स्थापना चौराहे के रूप में की गई थी और जिसका इस्तेमाल कैदियों पर नजर रखने के लिए गार्डों के द्वारा किया जाता था।

सेलुलर जेल का निर्माण होने से पहले, वह वाइपर द्वीप की जेल थी जिसे ब्रिटिश शासन द्वारा देश की आजादी की लड़ाई लड़ने वालों को प्रताड़ित करने के लिए, अत्याचार और यातना का सबसे बुरा रूप देने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। काल कोठरी वाला सेल, लॉक-अप, स्टॉक और कोड़ों की मार, वाइपर जेल की कुख्याति रही। महिलाओं को भी जेल में रखा गया था। जेल की परिस्थितियां ही कुछ ऐसी थीं कि इस जगह को कुख्यात नाम दिया गया, "वाइपर चेन गैंग जेल।" जिन लोगों ने ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी थी, उन्हें एक साथ जंजीर में जकड़ दिया जाता था और रात में उनके पैरों के इर्द-गिर्द बेड़ियों के माध्यम से चलने वाली श्रृंखला तक सीमित कर दिया जाता था। इस जेल में चेन गैंग के सदस्यों को कठोर श्रम के लिए रखा गया था।

कैसी थी सेलुलर जेल?

सेलुलर जेल की वास्तुकला को 'पेंसिल्वेनिया प्रणाली या एकांत प्रणाली' के सिद्धांत पर आधारित थी। उसमें अन्य कैदियों से पूरी तरह अलग रखने के लिए प्रत्येक कैदी के लिए अलग-अलग कारावास का होना आवश्यक था। एक ही विंग में या अलग विंगों में कैदियों के बीच किसी भी प्रकार का कोई संचार संभव नहीं था।  सेलुलर जेल की हर ईंट प्रतिरोध, कष्ट और बलिदानों की हृदय विदारक कहानियों की गवाह रही हैं। सेलुलर जेल महान देशभक्तों और स्वतंत्रता सेनानियों के अमानवीय कष्टों को देखने वाला एक मूक दर्शक रहा है जो इन काल कोठरियों में कैद थे। यहां तक कि उन्हें अत्याचार के शिकार के रूप में अपने बहुमूल्य जीवन का भी बलिदान करना पड़ा।

असहनीय पीड़ाओं की गवाह है यह जेल

यहां कैदियों को प्रायः अमानवीय सजा दी जानी थी। इसमें पिसाई करने वाली मिल पर अतिरिक्त घंटों का काम करने से लेकर एक सप्ताह तक हथकड़ी पहनकर खड़े रहने, बागवानी, गरी सुखाने, रस्सी बनाने, नारियल की जटा तैयार करने, कालीन बनाने, तौलिया बुनने, छह महीने तक बेड़ियों में जकड़े रहने, एकांत काल कोठरी में कैद रहने, चार दिनों तक भूखा रखने और दस दिनों के लिए सलाखों के पीछे रहने जैसी सजा शामिल थी। एक सजा ऐसी भयावह थी जिसमें पीड़ित को अपने शरीर से पैरों को अलग करने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

 

इन सेनानियों के बलिदानों को याद किया

वीर सावरकर - 1911 में स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर को मार्ले-मिंटो सुधार (भारतीय परिषद अधिनियम 1909) के खिलाफ विद्रोह करने के जुर्म में अंडमान की सेलुलर जेल (जिसे ‘काला पानी’ के नाम से भी जाना जाता है) में 50 साल की सजा सुनाई गई थी। उन्हें 1924 में रिहा कर दिया गया था। वे अपनी बहादुरी के लिए जाने जाते थे और इसलिए उन्हें ' वीर' उपनाम दिया गया था।

बी.के.दत्त – बटुकेश्वर दत्त, जिन्हें बी. के. दत्त के नाम से भी जाना जाता है, एक क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे। वे भगत सिंह के साथ 1929 में सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में किए गए बम विस्फोट मामले में शामिल थे। 20 जुलाई 1965 को 54 वर्ष की उम्र में एक बीमारी के कारण उनका निधन हो गया। सिंह और दत्त दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और उन्हें पोर्ट ब्लेयर की सेलुलर जेल में डाल दिया गया।

फज़ले हक खैराबादी - 1857 के भारतीय विद्रोह की विफलता के बाद, फज़ले हक खैराबादी को माफी के दायरे में रखा गया था लेकिन 30 जनवरी 1859 को ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा हिंसा भड़काने के जुर्म में खैराबाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें 'जिहाद' के लिए भूमिका अदा करने और हत्या को उकसाने का दोषी करार दिया गया। उन्होंने अपना वकील खुद ही बनने का निर्णय लिया और अपना बचाव खुद ही किया। अपनी दलीलें और जिस प्रकार से उन्होंने अपने मामले का बचाव किया, वह इतना प्रभावपूर्ण और विश्वसनीय था कि पीठासीन मजिस्ट्रेट उनको निर्दोष घोषित करने का फैसला लिख ​​रहे थे, तब उन्होंने फतवा जारी करने वाली बात कबूल की और कहा कि वे झूठ नहीं बोल सकते हैं। उन्हें अंडमान द्वीप के कालापानी (सेलुलर जेल) में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और उनकी संपत्ति को अवध अदालत के न्यायिक आयुक्त द्वारा जब्त कर लिया गया।

बरिंद्र कुमार घोष - बरिंद्र कुमार घोष का जन्म 5 जनवरी 1880 को लंदन के निकट क्रॉयडन में हुआ था। 30 अप्रैल 1908 को दो क्रांतिकारियों, खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी द्वारा किंग्सफोर्ड की हत्या के प्रयास के बाद, पुलिस ने अपनी जांच को तेज कर दिया जिसके कारण 2 मई 1908 को बरिंद्र कुमार घोष और अरविंद घोष की गिरफ्तारी हुई, जिसमें उनके कई साथी भी शामिल थे। इस मुकदमे (जिसे अलीपुर बम कांड के नाम से भी जाना जाता है) की शुरुआत में, बरिंद्र कुमार घोष और उल्लासकर दत्ता को मौत की सजा सुनाई गई। हालांकि, इस सजा को कम करके उम्रकैद में तब्दील कर दिया गया, देशबंधु चितरंजन दास और बरिंद्र कुमार घोष को अन्य दोषियों के साथ 1909 में अंडमान की सेलुलर जेल में भेज दिया गया था।

सुशील दासगुप्ता - सुशील कुमार दासगुप्ता (1910-1947) का जन्म बरिशाल में हुआ था, जो अब बांग्लादेश में है। वे बंगाल के क्रांतिकारी, युगंतार दल के सदस्य थे, और 1929 के पुटिया मेल डकैती मामले में उन्हें मेदिनीपुर जेल लाया गया। वहां से, वे अपने साथी क्रांतिकारियों, सचिनकर गुप्ता और दिनेश मजूमदार के साथ फरार हो गए। वे सात महीने तक फरार रहे थे। आखिरकार दिनेश मजूमदार को पकड़ लिया गया और उन्हें फांसी दे दी गई, सुशील दासगुप्ता को पहले सेलुलर जेल भेजा गया, और सचिनकर गुप्ता को पहले मंडलीय जेल और फिर सेलुलर जेल में भेज दिया गया।

1932 से लेकर 1937 के दौरान विशेष रूप से सामूहिक भूख हड़ताल का सहारा लिया गया। अंतिम हड़ताल जुलाई 1937 में शुरू हुई थी और यह 45 दिनों तक जारी रही थी। सरकार ने अंततः दंडात्मक उपनिवेश को बंद करने का फैसला किया और सेलुलर जेल के सभी राजनीतिक कैदियों को जनवरी 1938 तक भारत की मुख्य भूमि पर अपने-अपने राज्यों में वापस भेज दिया गया।

आजाद हिंद फौज का नियंत्रण

29 दिसंबर, 1943 को सुभाष चंद्र बोस के आज़ाद हिंद सरकार द्वारा द्वीपों पर राजनीतिक नियंत्रण करने का मसौदा पारित किया गया। बोस ने भारतीय राष्ट्रीय सेना का तिरंगा झंडा फहराने के लिए पोर्ट ब्लेयर का दौरा किया। अंडमान की उनकी एकमात्र यात्रा  के दौरान,  जापानी अधिकारियों द्वारा उन्हें स्थानीय आबादी से सावधानी के साथ छुपा कर रखा गया था। उन्हें अंडमान के लोगों की पीड़ाओं से अवगत कराने का कई बार प्रयास किया गया। यह तथ्य कि उस समय कई स्थानीय भारतीय राष्ट्रवादी सेल्युलर जेल में यातनाएं झेल रहे थे।

 

द्वीपों के सौंदर्य का भी दर्शन कराया

प्रस्तुतकर्ताओं ने सेलुलर जेल से परे सौंदर्य से भरपूर द्वीपों का भी प्रदर्शन किया। अंडमान द्वीप समूह बंगाल की खाड़ी में स्थित भारतीय द्वीप समूह है। ये लगभग 300 द्वीपों से बना है और अपने पाम-लाइन, सफेद-रेत वाले समुद्र तटों, मैंग्रोव और उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों के लिए जाना जाता है। अंडमान द्वीप समूह के लोग और भी ज्यादा दूरदराज वाले द्वीपों में निवास करते हैं। उनमें से कई तक आगंतुकों को जाने नहीं दिया जाता है।

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